🕉️ उत्तर काण्ड · सर्ग 44

अगस्त्य द्वारा अपनी कथा जारी रखना

अगस्त्य ऋषि राम से कहते हैं कि रावण विष्णु को पहचानने के बाद भी उनसे युद्ध करने का साहस नहीं कर पाया और लंका लौट गया।

0 सम्पूर्ण श्लोक
44 सर्ग संख्या
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मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

अगस्त्य ऋषि राम से कहते हैं कि रावण विष्णु को पहचानने के बाद भी उनसे युद्ध करने का साहस नहीं कर पाया और लंका लौट गया।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

नारद मुनि के उपदेश के बाद रावण को भगवान विष्णु का वास्तविक स्वरूप कुछ-कुछ समझ में आया। उसने देखा कि विष्णु के रोम-रोम से असंख्य ब्रह्मांड प्रकट हो रहे हैं और उनमें असंख्य राम, कृष्ण आदि अवतार लिए हुए हैं। यह दिव्य दृश्य देखकर रावण भयभीत हो गया और उसका अहंकार चूर-चूर हो गया। उसने समझ लिया कि विष्णु से युद्ध करना उसके बस की बात नहीं है। वह वहाँ से प्रस्थान कर लंका लौट आया। अगस्त्य ऋषि राम को इस घटना का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि कैसे रावण को अपनी सीमाओं का बोध हुआ।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४४

(अगस्त्य द्वारा अपनी कथा जारी रखना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : नारद के समझाने पर रावण ने विष्णु के दिव्य स्वरूप के दर्शन किए। अब अगस्त्य ऋषि बताते हैं कि उसके बाद क्या हुआ।

✨ विष्णु का दिव्य स्वरूप (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्य उवाच – नारदेनैवमुक्तस्तु रावणो राक्षसाधिपः।
ददर्श विष्णुं देवेशं योगनिद्रासमन्वितम्॥
तस्य रोमसु रोमेषु ब्रह्माण्डान्यखिलानि च।
ददर्श स महातेजा विस्मितो राक्षसेश्वरः॥
तेषु ब्रह्माण्डकोटीषु रामाः कृष्णाश्च कोटिशः।
अवताराश्च विष्णोश्च दृश्यन्ते बहुरूपिणः॥
दृष्ट्वा तदद्भुतं रूपं भयमाप दशाननः।
नूनमेष महादेवो न मया योद्धुमर्हति॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने कहा – “नारद के ऐसा कहने पर राक्षसराज रावण ने योगनिद्रा में लीन देवेश विष्णु के दर्शन किए। उसने देखा कि उनके रोम-रोम में समस्त ब्रह्माण्ड स्थित हैं। उन ब्रह्माण्डों के भीतर कोटि-कोटि राम, कृष्ण और विष्णु के अनेक अवतार दिखाई दे रहे थे। यह अद्भुत रूप देखकर दशानन भयभीत हो गया। उसने सोचा – ‘निश्चय ही यह महादेव हैं, इनसे युद्ध करना मेरे लिए उचित नहीं है।’” रावण ने पहली बार अपने से अधिक शक्तिशाली के दर्शन किए। उसका अहंकार चूर-चूर हो गया और वह समझ गया कि उसकी शक्तियाँ इस दिव्य पुरुष के सामने कुछ भी नहीं हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌌 विराट स्वरूप के दर्शन

रावण को विष्णु का विराट स्वरूप देखने का सौभाग्य मिला, जिसमें उसने अनंत ब्रह्मांड और अवतार देखे। यह उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी, किन्तु अहंकार के कारण वह इससे लाभान्वित नहीं हो सका।

😨 अहंकार का क्षणिक पतन

इस घटना में रावण का अहंकार क्षण भर के लिए टूटता है, किन्तु वह पूरी तरह से बदल नहीं पाता। यह बताता है कि केवल एक दिव्य अनुभव से अहंकार समाप्त नहीं होता, उसके लिए सतत साधना और विनम्रता आवश्यक है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि ईश्वर के दर्शन मात्र से अहंकार नष्ट नहीं होता। उसके लिए हृदय को शुद्ध और विनम्र बनाना आवश्यक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।