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क्षमा करो तुम मेरे प्रभुजी भजन इन हिंदी

135 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"क्षमा करो तुम मेरे प्रभुजी" एक अत्यंत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी भजन है, जो जीवात्मा की परमात्मा के प्रति पूर्ण शरणागति और पश्चाताप की भावना को व्यक्त करता है। भक्ति मार्ग में 'विनय' और 'दैन्य' भाव का विशेष महत्व है, जहाँ भक्त अपने अहंकार को त्यागकर प्रभु के सम्मुख अपनी त्रुटियों को स्वीकार करता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत करता है और उसे सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर ईश्वर की असीम अनुकंपा का अनुभव कराने में सहायक होता है। सनातन धर्म की समृद्ध भजन परंपरा में ऐसे गीतों का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि ये न केवल ईश्वर की स्तुति करते हैं, बल्कि मनुष्य को आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार की प्रेरणा भी देते हैं। इस लेख में हम इस पावन भजन के लिरिक्स, गहरे आध्यात्मिक अर्थ, और इसके गायन से होने वाले मानसिक एवं आध्यात्मिक लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

(मुखड़ा)
क्षमा करो तुम मेरे प्रभुजी, अपराध हमारे भूलों तुम।
हम तो हैं बालक अज्ञानी, शरण तुम्हारी आए हम॥
क्षमा करो तुम मेरे प्रभुजी...

(अंतरा - 1)
माया के बंधन में फंसकर, तुमको हम बिसरा बैठे।
झूठे जग के नाते-रिश्ते, मन में हम तो बसा बैठे।
भूल हुई जो हमसे स्वामी, दया दृष्टि अब डालो तुम॥
क्षमा करो तुम मेरे प्रभुजी...

(अंतरा - 2)
काम क्रोध और लोभ मोह ने, बुद्धि हमारी हर ली है।
विषय वासना की अग्नि में, जीवन की सुध खो दी है।
अधम नीच हम पापी भारी, चरणों में अब ले लो तुम॥
क्षमा करो तुम मेरे प्रभुजी...

(अंतरा - 3)
तुम हो दयालु दीनबंधु प्रभु, पतित पावन कहलाते हो।
जो भी आए द्वार तुम्हारे, उसको गले लगाते हो।
'भक्त' खड़ा है द्वार पे तेरे, अपनी भक्ति दे दो तुम॥
क्षमा करो तुम मेरे प्रभुजी, अपराध हमारे भूलों तुम।
हम तो हैं बालक अज्ञानी, शरण तुम्हारी आए हम॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन भक्त की उस पुकार का प्रतिनिधित्व करता है, जब वह संसार की निस्सारता को समझकर ईश्वर की शरण में आता है। इसका भावार्थ अत्यंत गहरा है:

समर्पण और क्षमा की याचना: भजन की शुरुआत में ही भक्त स्वीकार करता है कि वह अज्ञानी है। 'अज्ञानी बालक' का रूपक यहाँ इसलिए उपयोग किया गया है क्योंकि जिस प्रकार एक छोटा बच्चा अनजाने में गलतियाँ करता है और माता-पिता उसे क्षमा कर देते हैं, उसी प्रकार भक्त ईश्वर से अपने अनंत अपराधों के लिए क्षमा मांग रहा है।

माया का प्रभाव: प्रथम अंतरे में भक्त अपनी विवशता प्रकट करता है कि वह माया के वशीभूत होकर अपने वास्तविक स्वरूप और परमात्मा को भूल गया। उसने संसार के नश्वर संबंधों को ही सत्य मान लिया। यह संसार 'मृग-मरीचिका' के समान है, जहाँ सुख की तलाश में जीव भटकता रहता है। भक्त प्रार्थना करता है कि प्रभु अपनी दया दृष्टि से इस अज्ञान के अंधकार को दूर करें।

षडरिपुओं का जाल: दूसरे अंतरे में काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे आंतरिक शत्रुओं का वर्णन है। भक्त स्वीकार करता है कि इन विकारों ने उसकी विवेक बुद्धि को नष्ट कर दिया है। वह स्वयं को 'अधम' और 'पापी' कहकर अपनी लघुता स्वीकार करता है, जो कि सच्ची भक्ति की पहली सीढ़ी है। जब तक मनुष्य अपने दोषों को स्वीकार नहीं करता, तब तक सुधार और ईश्वर की कृपा संभव नहीं है।

ईश्वर की महिमा: अंतिम भाग में प्रभु के 'दीनबंधु' और 'पतित पावन' स्वरूप का गुणगान है। भक्त को पूर्ण विश्वास है कि प्रभु का स्वभाव ही क्षमा करना है। वह केवल क्षमा ही नहीं मांगता, बल्कि अंत में 'भक्ति' का दान मांगता है, जो कि जीवन का परम लक्ष्य है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • दैन्य भाव: यह भजन 'दैन्य भाव' की पराकाष्ठा है, जो भक्त को अहंकार मुक्त करने में सहायक है।
  • आत्म-साक्षात्कार: इसके शब्द साधक को अपनी गलतियों पर विचार करने और उन्हें सुधारने की प्रेरणा देते हैं।
  • मानसिक शांति: पश्चाताप की अग्नि में तपकर जब जीव क्षमा मांगता है, तो उसे अपार मानसिक शांति का अनुभव होता है।
  • सार्वभौमिकता: यह भजन किसी विशेष संप्रदाय तक सीमित नहीं है; यह हर उस व्यक्ति के लिए है जो ईश्वर से जुड़ना चाहता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का गायन किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु कुछ विशेष अवसर इसके प्रभाव को बढ़ा देते हैं:

  • प्रातः काल: दिन की शुरुआत ईश्वर से क्षमा और मार्गदर्शन मांगकर करना सर्वोत्तम माना जाता है।
  • संध्या वंदना: दिन भर के कार्यों के दौरान हुई अनजानी भूलों के लिए शाम को यह भजन गाना मन को हल्का करता है।
  • एकांत साधना: जब आप अकेले बैठकर ध्यान करना चाहते हैं, तब यह भजन मन को एकाग्र करने में मदद करता है।
  • मंदिर या सत्संग: सामूहिक रूप से इस भजन का गायन वातावरण में करुणा और भक्ति का संचार करता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यद्यपि यह भजन किसी एक विशिष्ट देवता का नाम नहीं लेता, लेकिन 'प्रभुजी' शब्द निराकार ईश्वर या सगुण रूप में भगवान विष्णु, श्री कृष्ण या श्री राम के लिए प्रयुक्त होता है। भारतीय संत परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास और मीराबाई ने भी इसी प्रकार के 'विनय के पद' लिखे हैं। यह भजन उसी परंपरा का एक आधुनिक और सरल रूप है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल और सुबोध हिंदी है, जिसमें कुछ तत्सम शब्दों (जैसे- अपराध, अज्ञानी, दीनबंधु) का प्रयोग किया गया है। इसकी शैली 'प्रार्थना' और 'विनय' प्रधान है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सहज प्रयोग मिलता है, जो इसे गेय (गाने योग्य) और प्रभावशाली बनाता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द सरल अर्थ संदर्भ
अपराध गलती या पाप जीवात्मा द्वारा किए गए सांसारिक दोष।
अज्ञानी ज्ञान रहित ईश्वर के वास्तविक स्वरूप से अनभिज्ञ।
बिसरा भूल जाना संसार की चकाचौंध में प्रभु को भूलना।
अधम नीच या गिरा हुआ स्वयं की लघुता और दोषों की स्वीकृति।
पतित पावन पापियों को पवित्र करने वाला ईश्वर का वह स्वरूप जो सबको तार देता है।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"क्षमा करो तुम मेरे प्रभुजी, अपराध हमारे भूलों तुम" - हे ईश्वर, मेरे द्वारा किए गए समस्त ज्ञात-अज्ञात पापों को क्षमा कर दें और उन्हें विस्मृत कर दें।

"हम तो हैं बालक अज्ञानी, शरण तुम्हारी आए हम" - हम सांसारिक जीव आध्यात्मिक रूप से अबोध बालक के समान हैं, हमें सही मार्ग नहीं पता, इसलिए हम आपकी शरण में आए हैं।

"माया के बंधन में फंसकर, तुमको हम बिसरा बैठे" - इस संसार की माया (धन, पद, प्रतिष्ठा) ने हमें ऐसा जकड़ा कि हम आपके अस्तित्व को ही भूल गए।

"काम क्रोध और लोभ मोह ने, बुद्धि हमारी हर ली है" - काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे विकारों ने हमारे विवेक को नष्ट कर दिया है, जिससे हम उचित-अनुचित का भेद नहीं कर पा रहे।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भावों की पुष्टि शास्त्रों के इन श्लोकों से होती है:

अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर॥

(अर्थ: हे परमेश्वर, मेरे द्वारा दिन-रात हजारों अपराध होते हैं। मुझे अपना दास समझकर क्षमा करें।)

इसी प्रकार देव्यपराध क्षमापन स्तोत्र में भी भक्त अपनी भूलों के लिए माँ जगदम्बा से क्षमा मांगता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम क्षमा करो तुम मेरे प्रभुजी
मुख्य विषय क्षमा प्रार्थना और शरणागति
देवता परमात्मा (विष्णु/राम/कृष्ण/निराकार)
भाषा हिंदी
भक्ति भाव दैन्य और विनय भाव
उपयुक्त अवसर दैनिक पूजा, सत्संग, पश्चाताप के क्षण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इसका मुख्य उद्देश्य भक्त के अहंकार को मिटाना और उसे अपनी गलतियों को स्वीकार कर ईश्वर की शरण में ले जाना है।

नहीं, यह एक सार्वकालिक भजन है जिसे किसी भी दिन या समय गाया जा सकता है, विशेषकर जब मन अशांत हो।

इससे मानसिक शांति मिलती है, अपराध बोध कम होता है और ईश्वर के प्रति विश्वास बढ़ता है।

'पतित' का अर्थ है गिरा हुआ या पापी, और 'पावन' का अर्थ है पवित्र करने वाला। अर्थात जो पापियों का उद्धार करे।

हाँ, यह बच्चों में विनम्रता और नैतिक मूल्यों का विकास करने के लिए बहुत उपयोगी है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री भक्ति और दर्शन के विशेषज्ञों द्वारा संकलित की गई है। "क्षमा करो तुम मेरे प्रभुजी" भजन सनातन धर्म की उस उदार परंपरा का हिस्सा है जहाँ ईश्वर को एक दंड देने वाले न्यायाधीश के रूप में नहीं, बल्कि एक करुणामयी पिता या माता के रूप में देखा जाता है। यह भजन श्रीमद्भगवद्गीता के शरणागति योग के सिद्धांतों के अनुरूप है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग)
  • विनय पत्रिका - गोस्वामी तुलसीदास
  • भजन संग्रह - पारंपरिक भक्ति साहित्य
  • भक्तिलोक आध्यात्मिक शोध टीम

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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