भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी की आराधना को समर्पित अत्यंत मधुर और हृदयस्पर्शी भजन "है राम तुम्हारे चरणों में (Hey Ram Tumare Charno Me)" सनातन धर्म के भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। यह भजन पूर्ण शरणागति, अगाध श्रद्धा और परम भक्ति का एक अनुपम उदाहरण है। जब कोई साधक सांसारिक मोह-माया, द्वंद्व और कष्टों से थककर भगवान राम के चरणों में आश्रय लेता है, तो उसके अंतःकरण में जिस परम शांति और आनंद का उदय होता है, वही इस भजन का मूल स्वर है। गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस के सिद्धांतों के अनुसार, राम का नाम और उनके चरणों की धूलि पतितों का उद्धार करने वाली है। इस भजन का नियमित गायन और श्रवण भक्त को साकेत धाम की पावन चेतना से जोड़ता है और जीवन के समस्त विकारों का शमन करता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ है राम तुम्हारे चरणों में ॥
(स्थायी)
है राम तुम्हारे चरणों में, जीवन ये समर्पित करता हूँ।
अर्पित मैं अपना जीवन करता हूँ, चरणों में समर्पण करता हूँ॥
है राम तुम्हारे चरणों में...
(अंतरा - १)
तुम ही हो मेरे माता-पिता, तुम ही हो मेरे बंधु-सखा।
तुम ही हो मेरे पालनहारे, तुम ही हो मेरे भाग्यविधाता॥
है राम तुम्हारे चरणों में...
(अंतरा - २)
भवसागर की इस नैया को, तुम ही पार लगाते हो।
जब-जब भी पुकारे भक्त तुम्हें, तुम दौड़े-दौड़े आते हो॥
है राम तुम्हारे चरणों में...
(अंतरा - ३)
मन मंदिर में तुम वास करो, अज्ञान का नाश करो प्रभुवर।
भक्ति का दीप जलाकर के, जीवन में प्रकाश करो प्रभुवर॥
है राम तुम्हारे चरणों में, जीवन ये समर्पित करता हूँ।
अर्पित मैं अपना जीवन करता हूँ, चरणों में समर्पण करता हूँ॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस पावन भजन का मुख्य भाव 'प्रपत्ति' यानी पूर्ण शरणागति का है। हिंदू दर्शन और भक्ति परंपरा में शरणागति को मोक्ष का सबसे सुलभ मार्ग माना गया है। इस भजन के माध्यम से भक्त अपने अहंकार, कर्म और अस्तित्व को भगवान श्री राम के चरणों में सौंप देता है।
भजन की शुरुआत में ही भक्त कहता है कि हे प्रभु राम! मैं अपना यह संपूर्ण जीवन आपके श्रीचरणों में अर्पित करता हूँ। यहाँ 'अर्पित' करने का अर्थ केवल पूजा की सामग्री चढ़ाना नहीं है, बल्कि अपने सुख-दुख, आशा-निराशा, और भूत-भविष्य को ईश्वर की इच्छा पर छोड़ देना है। जब जीव ऐसा करता है, तो वह कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
आगे भक्त भगवान को अपने समस्त सांसारिक और पारलौकिक संबंधों के रूप में देखता है। वह उन्हें माता, पिता, भाई, मित्र और भाग्यविधाता मानता है। यह भाव श्रीमद्भगवद्गीता के अनन्य भक्ति के सिद्धांत से मेल खाता है। जब भगवान ही हमारे सब कुछ बन जाते हैं, तो संसार का कोई भी भय हमें विचलित नहीं कर सकता। भवसागर रूपी इस संसार से पार उतरने के लिए भगवान राम का नाम ही एकमात्र सहारा है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- पूर्ण शरणागति का संदेश: यह भजन जीव को सिखाता है कि अहंकार का त्याग करके ईश्वर के चरणों में समर्पित होना ही सच्ची शांति का मार्ग है।
- मर्यादा पुरुषोत्तम का स्मरण: भगवान राम का चरित्र मर्यादा, धर्म और सत्य का प्रतीक है। इस भजन के माध्यम से उनके पावन स्वरूप का ध्यान धरने से मन में धर्म के प्रति निष्ठा जागृत होती है।
- मानसिक शांति और सकारात्मकता: इस भजन की सरल और सुमधुर लय मस्तिष्क को शांत करती है और नकारात्मक विचारों को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
- भक्ति रस की प्रधानता: इसमें शांत और दास्य रस का अद्भुत समन्वय है, जो भक्त को ईश्वर के अत्यंत निकट होने का अनुभव कराता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि भगवान के नाम संकीर्तन के लिए कोई भी समय वर्जित नहीं है, फिर भी इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधि अत्यंत फलदायी मानी गई है:
- प्रातः काल की पूजा: सुबह सूर्योदय के समय स्नान आदि से निवृत्त होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान राम के चित्र या विग्रह के समक्ष धूप-दीप जलाकर इस भजन का गायन करें।
- संध्या आरती के समय: शाम के समय परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर सामूहिक रूप से इस भजन को गाने से घर का वातावरण शुद्ध और पवित्र होता है।
- विशेष अवसर: राम नवमी, दशहरा, सुंदरकांड पाठ, हनुमान जयंती और प्रत्येक मंगलवार व शनिवार को इस भजन का कीर्तन करना विशेष रूप से कल्याणकारी माना जाता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान विष्णु के सातवें अवतार, अयोध्यापति श्री रामचंद्र जी को समर्पित है। भगवान राम शील, शक्ति और सौंदर्य के भंडार हैं। उनके साथ ही उनके परम भक्त श्री हनुमान जी का भी स्मरण इस भजन के माध्यम से स्वतः ही हो जाता है, क्योंकि हनुमान जी की कृपा के बिना राम भक्ति की प्राप्ति असंभव है।
भक्ति काल के महान संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है कि राम के चरणों की प्रीति ही जीव का परम पुरुषार्थ है। यह भजन उसी संत परंपरा और भक्ति आंदोलन की समृद्ध विरासत को आधुनिक युग में सरल शब्दों के माध्यम से हम तक पहुँचाता है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह भजन पारंपरिक भक्ति गीतों की श्रेणी में आता है, जिसे विभिन्न कलाकारों द्वारा समय-समय पर गाया गया है। "श्रद्धा भक्ति सागर" जैसे प्रतिष्ठित मंचों ने इस भजन को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसकी पृष्ठभूमि भारतीय लोक-चेतना और रामकथा के प्रति अगाध श्रद्धा पर आधारित है। सदियों से भारत में राम नाम की महिमा गाई जाती रही है, और यह भजन उसी अटूट श्रृंखला की एक सुंदर कड़ी है जो आधुनिक पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखती है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों (जैसे- समर्पित, भवसागर, अज्ञान, प्रकाश) का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया गया है। इसकी काव्य शैली गेय (गाने योग्य) है। इसमें प्रयुक्त रूपक अलंकार, जैसे "भवसागर की नैया" और "मन मंदिर", काव्य की सुंदरता को बढ़ाते हैं और गूढ़ आध्यात्मिक सत्यों को बहुत ही आसान तरीके से समझाते हैं।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण कला सिखाता है:
- अहंकार का विसर्जन: जब हम कहते हैं "जीवन ये समर्पित करता हूँ", तो हम अपने अहंकार को विसर्जित करते हैं, जो सभी दुखों की जड़ है।
- ईश्वर पर अटूट विश्वास: "तुम ही हो मेरे पालनहारे" की भावना हमें यह सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी हमें घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि हमारा रक्षक स्वयं ईश्वर है।
- ज्ञान की प्रार्थना: भजन का अंतिम भाग हमें अज्ञान के अंधकार से निकलकर ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| समर्पित / समर्पण | पूरी तरह सौंप देना | अपने अहंकार और कर्मों को भगवान के चरणों में अर्पित करना। |
| पालनहारे | रक्षा और भरण-पोषण करने वाले | ईश्वर जो संपूर्ण सृष्टि का संचालक और पोषक है। |
| भवसागर | संसार रूपी समुद्र | जन्म और मृत्यु का चक्र जिससे जीव को मुक्त होना है। |
| नैया | नाव | मनुष्य का जीवन जो इस संसार रूपी समुद्र में तैर रहा है। |
| मन मंदिर | हृदय रूपी देवालय | वह पवित्र स्थान जहाँ भगवान का वास होना चाहिए। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"है राम तुम्हारे चरणों में, जीवन ये समर्पित करता हूँ।"
हे प्रभु श्री राम! मैं अपने इस नश्वर शरीर, मन और बुद्धि को आपके पावन चरणों में अर्पित करता हूँ। अब मेरा अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, मैं पूरी तरह आपकी शरण में हूँ।
"तुम ही हो मेरे माता-पिता, तुम ही हो मेरे बंधु-सखा।"
संसार के सभी रिश्ते झूठे और क्षणभंगुर हैं। आप ही मेरे सच्चे माता, पिता, भाई और मित्र हैं। आपके साथ मेरा संबंध शाश्वत और अटूट है।
"भवसागर की इस नैया को, तुम ही पार लगाते हो।"
यह संसार दुखों और कठिनाइयों का एक विशाल महासागर है। मेरी जीवन रूपी नाव को इस सागर से सुरक्षित पार ले जाने वाले खेवनहार केवल आप ही हैं।
"मन मंदिर में तुम वास करो, अज्ञान का नाश करो प्रभुवर।"
हे दयालु देव! मेरे हृदय में जो अज्ञान और अंधकार व्याप्त है, उसे दूर कर दीजिए और मेरे मन रूपी मंदिर में सदैव के लिए निवास कीजिए ताकि वहाँ केवल आपकी भक्ति का प्रकाश रहे।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के गायन के साथ भगवान राम के निम्नलिखित सिद्ध मंत्रों और श्लोकों का संपुट लगाने से साधना और भी अधिक प्रभावशाली हो जाती है:
॥ राम रक्षा मंत्र ॥
"राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥"
॥ शरणागति श्लोक ॥
"आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥"
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | है राम तुम्हारे चरणों में (Hey Ram Tumare Charno Me) |
| आराध्य देव | मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी |
| भक्ति भाव | शरणागति, दास्य भाव, अनन्य प्रेम |
| भाषा | सरल हिंदी (खड़ी बोली) |
| मुख्य विषय | जीवन समर्पण, भवसागर से मुक्ति, ज्ञान की याचना |
| उपयुक्त अवसर | राम नवमी, दैनिक संध्या आरती, सुंदरकांड पाठ, सत्संग |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री — इस लेख का संपादन और संकलन भक्तिलोक के विद्वान शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। भजन के पाठ और उसके भावार्थ को प्रामाणिक स्रोतों, रामचरितमानस और पारंपरिक वैष्णव दर्शन के आलोक में तैयार किया गया है ताकि पाठकों को शुद्ध और ज्ञानवर्धक जानकारी प्राप्त हो सके।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण: भगवान राम के दिव्य गुणों और शरणागति के प्रसंग।
- श्रीरामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास): अरण्यकांड और उत्तरकांड में वर्णित भक्ति के लक्षण।
- वैष्णव भक्ति परंपरा: प्रपत्ति (पूर्ण शरणागति) के शास्त्रीय सिद्धांत।
- श्रद्धा भक्ति सागर: पारंपरिक भजन संग्रह और लोक प्रस्तुतियां।
संबंधित भजन एवं लेख
भगवान राम और हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित पावन भजनों और स्तोत्रों को भी अवश्य पढ़ें:
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें