Shri Hanumant Stuti

शिव स्तुति: आशुतोष शशाँक शेखर (Shiv Stuti: Ashutosh Shashank Shekhar in Hindi ) - Bhakti lok

85 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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हिंदू धर्म में भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है। वे देवों के देव महादेव हैं, जो अत्यंत भोले और शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं। "शिव स्तुति: आशुतोष शशाँक शेखर" (Shiv Stuti: Ashutosh Shashank Shekhar) एक अत्यंत मधुर, भावपूर्ण और शक्तिशाली स्तुति है, जो भगवान शिव के दिव्य स्वरूप, उनकी असीम कृपा और उनके कल्याणकारी चरित्र का वर्णन करती है। इस स्तुति का गान करने से साधक के मन को असीम शांति मिलती है और जीवन के सभी संताप, पाप व कष्ट दूर हो जाते हैं। यह स्तुति शिव भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है, क्योंकि इसमें भगवान शिव के विभिन्न नामों जैसे आशुतोष, चंद्रशेखर, चिदंबर और दिगंबर का स्मरण करते हुए उनके प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्त किया गया है। आइए, इस पावन स्तुति के संपूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और साधना विधि को विस्तार से समझें।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ शिव स्तुति: आशुतोष शशाँक शेखर ॥


आशुतोष शशाँक शेखर चन्द्र मौली चिदंबरा
कोटि कोटि प्रणाम शम्भू कोटि नमन दिगम्बरा ॥

निर्विकार ओमकार अविनाशी तुम्ही देवाधि देव
जगत सर्जक प्रलय करता शिवम सत्यम सुंदरा ॥

निरंकार स्वरूप कालेश्वर महा योगीश्वरा
दयानिधि दानिश्वर जय जटाधार अभयंकरा ॥

शूल पानी त्रिशूल धारी औगड़ी बाघम्बरी
जय महेश त्रिलोचनाय विश्वनाथ विशम्भरा ॥

नाथ नागेश्वर हरो हर पाप साप अभिशाप तम
महादेव महान भोले सदा शिव शिव संकरा ॥

जगत पति अनुरकती भक्ति सदैव तेरे चरण हो
क्षमा हो अपराध सब जय जयति जगदीश्वरा ॥

जनम जीवन जगत का संताप ताप मिटे सभी
ओम नमः शिवाय मन जपता रहे पञ्चाक्षरा ॥

आशुतोष शशाँक शेखर चन्द्र मौली चिदंबरा
कोटि कोटि प्रणाम शम्भू कोटि नमन दिगम्बरा ॥

कोटि नमन दिगम्बरा.. कोटि नमन दिगम्बरा.. कोटि नमन दिगम्बरा..

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह शिव स्तुति भगवान शिव के सगुण और निर्गुण दोनों रूपों की वंदना करती है। इसका मुख्य भाव पूर्ण आत्मसमर्पण और श्रद्धा है। स्तुति की शुरुआत महादेव के अत्यंत कृपालु रूप 'आशुतोष' (जो शीघ्र प्रसन्न होते हैं) से होती है। उनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है (शशाँक शेखर, चंद्रमौली) और वे चिदंबर (चेतना रूपी आकाश) तथा दिगंबर (दिशाएं ही जिनका वस्त्र हैं) हैं। ऐसे परमेश्वर शंभू को कोटि-कोटि प्रणाम किया गया है।

इस स्तुति में शिव को सृष्टि के रचयिता (सर्जक) और संहारक (प्रलयकर्ता) के रूप में स्वीकार किया गया है। वे निर्विकार हैं, जिनमें कोई दोष या परिवर्तन नहीं होता, और वे ही अविनाशी ओंकार स्वरूप हैं। वे सत्य, शिव और सुंदर हैं। वे महायोगीश्वर हैं, जो जटा धारण करते हैं और अपने भक्तों को अभय प्रदान करते हैं (अभयंकर)। वे त्रिशूल धारण करने वाले, बाघ की छाल पहनने वाले और तीनों लोकों के स्वामी (त्रिलोचन) हैं।

स्तुति के अंतिम भाग में भक्त भगवान शिव से प्रार्थना करता है कि उसके जीवन के सभी पाप, शाप और अज्ञान रूपी अंधकार दूर हो जाएं। भक्त अपने सभी अपराधों के लिए क्षमा मांगता है और प्रार्थना करता है कि उसका मन निरंतर भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र "ओम नमः शिवाय" का जप करता रहे, जिससे जीवन के सभी त्रिताप (दैहिक, दैविक, भौतिक कष्ट) समाप्त हो जाएं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस शिव स्तुति का आध्यात्मिक और मानसिक स्तर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • शीघ्र प्रसन्नता का भाव: 'आशुतोष' शब्द का अर्थ ही है जो बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाएं। यह स्तुति भक्तों में यह विश्वास जगाती है कि महादेव उनकी पुकार अवश्य सुनेंगे।
  • शिव के विविध रूपों का समन्वय: इसमें शिव के शांत, वैरागी, संहारक, रक्षक और दयालु रूपों का एक साथ सुंदर चित्रण किया गया है।
  • पंचाक्षरी मंत्र की महिमा: स्तुति के अंत में "ओम नमः शिवाय" मंत्र के निरंतर जप पर बल दिया गया है, जो मन को एकाग्र करने में सहायक है।
  • पाप और संताप से मुक्ति: यह स्तुति केवल स्तुति नहीं, बल्कि एक प्रार्थना है जो मनुष्य के भीतर के भय, अज्ञान और पापों का नाश करती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान शिव की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, लेकिन इस स्तुति के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष समय और नियम अत्यंत फलदायी माने गए हैं:

  • शुभ समय: इस स्तुति का पाठ सुबह ब्रह्ममुहूर्त में या शाम को प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) करना सर्वोत्तम माना जाता है।
  • विशेष अवसर: महाशिवरात्रि, सावन के सोमवार, प्रदोष व्रत और शिवरात्रि के दिन इस स्तुति का पाठ करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • गायन की विधि: शांत चित्त होकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। सामने भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग स्थापित करें। धूप-दीप जलाकर पूरी श्रद्धा और शुद्ध उच्चारण के साथ इस स्तुति का गायन करें।
  • मानसिक जप: स्तुति पूर्ण होने के बाद कुछ मिनट शांत बैठकर "ओम नमः शिवाय" का मानसिक जप करें।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह स्तुति देवों के देव महादेव, भगवान शिव को समर्पित है। शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव ही परम ब्रह्म हैं। वे ही सृष्टि के आदि और अंत हैं। इस स्तुति में उनके साथ माता पार्वती (शक्ति) का परोक्ष रूप से स्मरण होता है, क्योंकि शिव शक्ति के बिना अपूर्ण हैं। यह स्तुति किसी एक विशिष्ट प्राचीन संत द्वारा रचित न होकर, आधुनिक काल के महान शिव भक्तों और संगीतकारों द्वारा पारंपरिक शिव स्रोतों के आधार पर संकलित और लोकप्रिय बनाई गई है। इसके सरल शब्द और शास्त्रीय पुट इसे हर वर्ग के साधक के लिए सुगम बनाते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

"आशुतोष शशाँक शेखर" स्तुति की पृष्ठभूमि अत्यंत प्राचीन शिव स्तोत्रों जैसे शिव तांडव स्तोत्र और शिव पंचाक्षर स्तोत्र से प्रेरित है। इसकी रचना में प्रयुक्त शब्द संस्कृत के तत्सम शब्द हैं, जो इसे अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र ध्वनि तरंगों (Vibrations) से युक्त बनाते हैं। जब इस स्तुति का सस्वर पाठ किया जाता है, तो इसके अक्षरों के कंपन से आसपास का वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस स्तुति की भाषा संस्कृतनिष्ठ हिंदी है। इसमें तत्सम शब्दों की प्रधानता है, जो इसे एक शास्त्रीय गरिमा प्रदान करते हैं। इसकी काव्य शैली गेय (गाने योग्य) है, जिसमें लय और ताल का अद्भुत समन्वय है। प्रत्येक पंक्ति के अंत में आने वाले शब्द (जैसे चिदंबरा, दिगंबरा, सुंदरा, अभयंकरा) एक सुंदर अनुप्रास अलंकार की सृष्टि करते हैं, जिससे यह सुनने में अत्यंत कर्णप्रिय और हृदयस्पर्शी लगती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह स्तुति हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संदेश देती है:

  1. वैराग्य और अनासक्ति: 'दिगंबर' और 'बाघंबरी' रूप हमें सिखाते हैं कि भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति ही दुखों का कारण है। जीवन में सादगी और वैराग्य का होना आवश्यक है।
  2. समर्पण की शक्ति: "क्षमा हो अपराध सब" कहकर भक्त अपने अहंकार को त्याग देता है। जब तक मनुष्य के भीतर अहंकार रहता है, तब तक उसे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती।
  3. सत्य की खोज: "शिवम सत्यम सुंदरा" का संदेश है कि जो शिव (कल्याणकारी) है, वही सत्य है और वही सबसे सुंदर है। हमें अपने जीवन में सत्य और कल्याण के मार्ग पर चलना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
आशुतोष जो बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाएं भगवान शिव का अत्यंत दयालु और कृपालु स्वभाव।
शशाँक शेखर जिनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है शिव का वह रूप जो शीतलता और शांति प्रदान करता है।
चिदंबरा चेतना रूपी आकाश वाले जो संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना में व्याप्त हैं।
दिगम्बरा दिशाएं ही जिनका वस्त्र हैं जो सांसारिक बंधनों और वस्त्रों से परे, पूर्णतः मुक्त हैं।
निर्विकार जिसमें कोई विकार या परिवर्तन न हो जो समय और परिस्थितियों से परे, सदैव एक समान रहते हैं।
शूल पानी हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले जो तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) का नाश करते हैं।
बाघम्बरी बाघ की छाल धारण करने वाले जो परम वैरागी और तपस्वी हैं।
पञ्चाक्षरा पांच अक्षरों वाला मंत्र (नमः शिवाय) शिव की आराधना का सबसे शक्तिशाली और सिद्ध मंत्र।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति 1-2: "आशुतोष शशाँक शेखर चन्द्र मौली चिदंबरा, कोटि कोटि प्रणाम शम्भू कोटि नमन दिगम्बरा ॥"
भावार्थ: हे शीघ्र प्रसन्न होने वाले, मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले, चेतना रूपी आकाश वाले भगवान शिव! हे दिशाओं को ही वस्त्र के रूप में धारण करने वाले शंभू! आपको मेरा कोटि-कोटि प्रणाम और नमन है।

पंक्ति 3-4: "निर्विकार ओमकार अविनाशी तुम्ही देवाधि देव, जगत सर्जक प्रलय करता शिवम सत्यम सुंदरा ॥"
भावार्थ: आप विकारों से रहित, अविनाशी और प्रणव स्वरूप (ओंकार) हैं। आप ही देवों के देव महादेव हैं, जो इस जगत की रचना भी करते हैं और इसका प्रलय (संहार) भी करते हैं। आप ही परम कल्याणकारी, परम सत्य और परम सुंदर हैं।

पंक्ति 5-6: "निरंकार स्वरूप कालेश्वर महा योगीश्वरा, दयानिधि दानिश्वर जय जटाधार अभयंकरा ॥"
भावार्थ: आप निराकार हैं, काल के भी स्वामी (कालेश्वर) हैं और महान योगियों के भी ईश्वर हैं। आप दया के सागर और परम दानी हैं। जटा धारण करने वाले और भक्तों को अभय देने वाले आपकी जय हो।

पंक्ति 7-8: "शूल पानी त्रिशूल धारी औगड़ी बाघम्बरी, जय महेश त्रिलोचनाय विश्वनाथ विशम्भरा ॥"
भावार्थ: आपके हाथ में त्रिशूल सुशोभित है, आप औघड़ दानी हैं और बाघ की छाल धारण करते हैं। हे तीन नेत्रों वाले महेश, संपूर्ण विश्व के स्वामी और पालनकर्ता! आपकी जय हो।

पंक्ति 9-10: "नाथ नागेश्वर हरो हर पाप साप अभिशाप तम, महादेव महान भोले सदा शिव शिव संकरा ॥"
भावार्थ: हे नागों के स्वामी नागेश्वर! आप हमारे सभी पापों, कष्टों, शापों और अज्ञान रूपी अंधकार को हर लीजिए। हे महान और अत्यंत भोले महादेव, आप सदैव हमारा कल्याण करने वाले सदाशिव हैं।

पंक्ति 11-12: "जगत पति अनुरकती भक्ति सदैव तेरे चरण हो, क्षमा हो अपराध सब जय जयति जगदीश्वरा ॥"
भावार्थ: हे जगत के स्वामी! मेरी आपके चरणों में सदैव अनन्य भक्ति बनी रहे। मेरे सभी ज्ञात-अज्ञात अपराधों को क्षमा करें। हे संपूर्ण जगत के ईश्वर, आपकी सदा जय हो।

पंक्ति 13-14: "जनम जीवन जगत का संताप ताप मिटे सभी, ओम नमः शिवाय मन जपता रहे पञ्चाक्षरा ॥"
भावार्थ: इस जन्म और जीवन के सभी सांसारिक संताप और कष्ट मिट जाएं, और मेरा मन निरंतर आपके पावन पंचाक्षरी मंत्र "ओम नमः शिवाय" का जप करता रहे।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस स्तुति के साथ भगवान शिव के निम्नलिखित मंत्रों का जप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:

महामृत्युंजय मंत्र:

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

यह मंत्र अकाल मृत्यु से रक्षा करता है और आरोग्य प्रदान करता है। इसके साथ ही आप श्री शिव चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं जो अत्यंत फलदायी है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम शिव स्तुति: आशुतोष शशाँक शेखर
आराध्य देव भगवान शिव (महादेव)
मुख्य विषय शिव महिमा, आत्मसमर्पण, क्षमा प्रार्थना
भाषा संस्कृतनिष्ठ हिंदी (तत्सम प्रधान)
मुख्य मंत्र ओम नमः शिवाय (पंचाक्षरी मंत्र)
उपयुक्त अवसर महाशिवरात्रि, सावन सोमवार, प्रदोष व्रत, दैनिक संध्या आरती
साधना का फल मानसिक शांति, पापों का नाश, भय से मुक्ति

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस स्तुति का मुख्य संदेश भगवान शिव के प्रति पूर्ण समर्पण, अहंकार का त्याग और उनके कल्याणकारी स्वरूप पर ध्यान केंद्रित करना है। यह हमें सिखाती है कि ईश्वर की शरण में जाने से सभी सांसारिक कष्ट दूर हो जाते हैं।

'आशुतोष' दो शब्दों से मिलकर बना है - 'आशु' (शीघ्र) और 'तोष' (संतुष्ट या प्रसन्न होना)। अर्थात, जो अपने भक्तों की थोड़ी सी भक्ति या पुकार से बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं, उन्हें आशुतोष कहा जाता है। यह भगवान शिव का एक अत्यंत प्रिय नाम है।

इस स्तुति का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम की पूजा के समय किया जा सकता है। विशेष रूप से सोमवार, प्रदोष व्रत और महाशिवरात्रि के दिन इसका पाठ करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

हां, इस स्तुति के मधुर और लयबद्ध उच्चारण से मन शांत होता है। इसके शब्दों में निहित सकारात्मक ऊर्जा मस्तिष्क को शांति प्रदान करती है, जिससे तनाव और चिंता का निवारण होता है।

'दिगंबर' का अर्थ है 'दिक् ही है अंबर (वस्त्र) जिनका', अर्थात दिशाएं ही जिनका वस्त्र हैं। यह भगवान शिव के पूर्ण वैरागी, अनासक्त और सांसारिक मोह-माया से परे स्वरूप को दर्शाता है।

"पंचाक्षरा" का अर्थ है पांच अक्षरों वाला महामंत्र - "नमः शिवाय"। स्तुति में प्रार्थना की गई है कि हमारा मन निरंतर इस दिव्य मंत्र का जप करता रहे, क्योंकि यह मंत्र आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम है।

हां, बच्चे भी इस स्तुति का पाठ कर सकते हैं। इसके शुद्ध उच्चारण से बच्चों की वाणी स्पष्ट होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है और उनमें अच्छे संस्कार व एकाग्रता का विकास होता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा या स्तुति करते समय साधक का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। यह दिशाएं सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह के लिए सर्वोत्तम मानी जाती हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" श्रेणी के अंतर्गत आती है। इस स्तुति के पाठ और अर्थ को विभिन्न प्रामाणिक शिव पुराणों, पारंपरिक भजनों और विद्वानों की व्याख्याओं के आधार पर संकलित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को भगवान शिव की आराधना के लिए एक शुद्ध, त्रुटिहीन और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध स्रोत प्रदान करना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • शिव पुराण: भगवान शिव के विभिन्न नामों और उनके आध्यात्मिक अर्थों का संदर्भ।
  • पारंपरिक भजन संग्रह: "आशुतोष शशाँक शेखर" के प्रामाणिक और प्रचलित लिरिक्स।
  • श्रीमद्भगवद्गीता व उपनिषद: 'शिवम सत्यम सुंदरा' और 'निर्विकार' जैसे दार्शनिक सिद्धांतों का आधार।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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