देवादिदेव महादेव और जगतजननी मां पार्वती के प्रेम, नोकझोक, समर्पण और गृहस्थ जीवन की सुंदरता को समर्पित यह अत्यंत लोकप्रिय भजन "गोरा इतना रोब दिखावे ना | Gora Itna Rob Dikhawe Naa | Shiv Parvati Bhajan" भगवान शिव की अलौकिक जीवनशैली और माता पार्वती के स्वाभाविक कोप-मान का जीवंत चित्रण प्रस्तुत करता है। हिंदू सनातन परंपरा में शिव और पार्वती का संबंध केवल पति-पत्नी का नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की प्रलय और स्थिति, वैराग्य और गृहस्थी, तथा चेतना और प्रकृति का परम समन्वय है। इस भजन के माध्यम से लोक-संस्कृति की सरल भाषा में उस परमेश्वर की सहजता को दर्शाया गया है जो समस्त संसार के स्वामी होकर भी एक योगी का जीवन जीते हैं और जिन्हें रिझाने के लिए किसी बड़े आडंबर की नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम और भाव की आवश्यकता होती है। सावन मास, शिवरात्रि, मंगला गौरी व्रत तथा विभिन्न धार्मिक उत्सवों के पावन अवसरों पर इस भजन का संकीर्तन भक्तों के हृदय में शिव-भक्ति का संचार कर देता है और साधक को सांसारिक मोह-माया से परे भगवान शिव के चरणों में अटूट विश्वास रखने की प्रेरणा देता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
गोरा इतना रोब दिखावे ना | Gora Itna Rob Dikhawe Naa | Shiv Parvati Bhajan
स्थाई (मुखड़ा):
गोरा इतना रोब दिखावे ना, मेरे भोले पे रोब चलावे ना!
अरे भोले हैं भंडारी, इनपे गुस्सा तू दिखाए ना!
गोरा इतना रोब दिखावे ना...
अंतरा 1:
तू बैठी महलों में रानी, भोले कैलाश पे रहते हैं!
भंग पियाले पीकर भोले, बाबा बम-बम कहते हैं!
इनका भोलापन दुनिया में, दूजा कोई पावे ना!
गोरा इतना रोब दिखावे ना, मेरे भोले पे रोब चलावे ना!
अंतरा 2:
गले में इनके नाग विराजे, तन पे भस्म रमावे हैं!
मुण्डो की माला ये पहने, और मृगचर्म ओढ़ावे हैं!
इनके जैसी जोगनूरत, कोई जग में सजावे ना!
गोरा इतना रोब दिखावे ना, मेरे भोले पे रोब चलावे ना!
अंतरा 3:
तू मांगे गहने सोने के, भोले को फिकर न काई की!
डम-डम डमरو बजावे डमरू, मस्ती है भोले भाई की!
इनकी मर्जी बिन पत्ता भी, जग में कोई हिलावे ना!
गोरा इतना रोब दिखावे ना, मेरे भोले पे रोब चलावे ना!
अंतरा 4:
नंदी पे चढ़कर आवै जब, देव सब दर्शन पावैं हैं!
तीनों लोक के स्वामी ये, डमरू ताल बजावैं हैं!
इनसे रूठ के मैया तू, ज्यादा देर रह पावे ना!
गोरा इतना रोब दिखावे ना, मेरे भोले पे रोब चलावे ना!
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन माता पार्वती (गोरा) और भगवान शिव के बीच के उस प्रेमपूर्ण और पारिवारिक संवाद को अत्यंत सहजता से प्रस्तुत करता है, जो भारतीय लोक-संस्कृति में अत्यंत लोकप्रिय है। भजन के भावार्थ के अनुसार, जब सांसारिक ऐश्वर्य और महलों की रानी मां पार्वती अपने स्वामी देवादिदेव महादेव के अड़ंगे, वैराग्य और फक्कड़ स्वभाव को देखकर थोड़ा सा रोब दिखाने का प्रयास करती हैं, तो भक्त या लोक-गायक उन्हें समझाते हैं कि भोलेनाथ का स्वभाव अति सरल और निष्कलंक है। उन पर किसी भी प्रकार का अधिकार या क्रोध जताना उचित नहीं है, क्योंकि वे संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनहार होते हुए भी अलौकिक वैराग्य में लीन रहते हैं।
भजन की पंक्तियों में बताया गया है कि मां पार्वती का निवास भले ही सुसज्जित महलों में है, परंतु भगवान शिव का दरबार कैलाश पर्वत की कंदराओं और बर्फीली वादियों में सजता है। शिवजी को किसी प्रकार के भौतिक सुखों की लालसा नहीं है; वे तो केवल अपनी मस्ती में मग्न रहते हैं। उनके गले में नागों का हार, शरीर पर श्मशान की भस्म और बाघ की खाल उनका आभूषण है। यह इस बात का प्रतीक है कि भगवान शिव मृत्यु और जीवन के बंधनों से मुक्त परम ब्रह्म हैं। भजन यह संदेश देता है कि भगवान शिव का यह रूप हमें बाह्य दिखावे और भौतिक वस्तुओं से ऊपर उठकर आंतरिक पवित्रता और संतोष का पाठ पढ़ाता है। मां पार्वती और शिव का यह प्रसंग यह भी दर्शाता है कि विपरीत स्वभाव होने पर भी प्रेम और समर्पण से संसार का संचालन कैसे होता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लोक-शैली और अत्यंत सरल भाषा है, जो सीधे श्रोता के हृदय को स्पर्श करती है। शिव-पार्वती के पारिवारिक जीवन और उनके अनोखे स्वरूप को जिस मनोरम शैली में इस भजन में पिरोया गया है, वह बच्चों से लेकर वृद्धों तक सभी को आकर्षित करता है। इस भजन का आध्यात्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह साधक को भगवान शिव के सरल, निष्कपट और 'आशुतोष' (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) स्वभाव से परिचित कराता है। इसे गाने और सुनने से मन का अहंकार और भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति समाप्त होती है।
- लोक-साहित्य का अद्भुत समन्वय: भजन में शास्त्रीय जटिलताओं के स्थान पर लोक-राग और ठेठ ग्रामीण-शहरी बोलचाल की मिठास है।
- शिव का वैराग्य दर्शन: महादेव के अकिंचन स्वरूप (भस्म, नाग, मृगचर्म) को बहुत सुंदर ढंग से रेखांकित किया गया है।
- पारिवारिक सामंजस्य: शिव और पार्वती के माध्यम से गृहस्थ जीवन में प्रेम और वैराग्य के संतुलन का संदेश दिया गया है।
- मानसिक शांति और आनंद: इसके संकीर्तन से मानसिक तनाव दूर होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
शिव भजनों के संकीर्तन के लिए प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या संध्या बेला को अत्यंत उत्तम माना गया है। इसके अतिरिक्त, निम्नलिखित अवसरों पर इस भजन को गाने से विशेष आध्यात्मिक लाभ मिलता है:
- सावन मास और प्रदोष व्रत: सावन के पवित्र सोमवार या प्रत्येक मास के प्रदोष व्रत के दिन शिव मंदिर में इस भजन का गायन अत्यंत फलदायी होता है।
- महाशिवरात्रि उत्सव: महाशिवरात्रि की रात्रि के चारों प्रहर की पूजा और जागरण के दौरान यह भजन भक्तों में ऊर्जा भर देता है।
- पारिवारिक सत्संग और अनुष्ठान: घर में होने वाले रुद्राभिषेक, सत्यनारायण कथा या शिव विवाह की वर्षगांठ पर इस भजन को विशेष रूप से गाया जाता है।
गायन विधि: भजन की शुरुआत दीप प्रज्वलित करके, भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए करनी चाहिए। ढोलक, मंजीरे या हारमोनियम की थाप के साथ समूह में इस भजन को गाने से सामूहिक चेतना जागृत होती है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन प्रमुख रूप से देवादिदेव महादेव (भगवान शिव) और जगतजननी आदिशक्ति मां पार्वती (गोरा) को समर्पित है। भगवान शिव को संहार के देवता और योगियों के आदिगुरु के रूप में पूजा जाता है, जबकि मां पार्वती को प्रकृति, ऊर्जा और चेतना का स्वरूप माना जाता है। सनातन धर्म में इन दोनों की संयुक्त आराधना के बिना साधना अधूरी मानी जाती है। इसी संदर्भ में आप शिव तांडव स्तोत्र का अध्ययन कर सकते हैं, जो शिव के प्रचंड और कलात्मक रूप का वर्णन करता है। साथ ही, माता शक्ति की आराधना के लिए श्री दुर्गा चालीसा का पाठ भी अत्यंत फलदायी माना गया है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की रचना पारंपरिक लोक-साहित्य और निर्गुण-सगुण भक्ति धाराओं के प्रभाव से हुई है। भारतीय लोक-संस्कृति में शिव और पार्वती के विवाह और उनके घरेलू जीवन को अत्यंत आत्मीयता के साथ देखा जाता है। लोक-गायकों और संतों ने भगवान के अलौकिक स्वरूप को आम जनमानस के करीब लाने के लिए ऐसी रचनाओं का सृजन किया है। इसमें किसी एक विशेष रचनाकार के स्थान पर लोक-परंपरा की सामूहिक अभिव्यक्ति दिखाई देती है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक और संगीत के माध्यम से आगे बढ़ती रही है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल हिंदी, हरियाणवी और राजस्थानी लोक-बोलियों के संमिश्रण से युक्त ठेठ लोक-भाषा है। इसमें अलंकारों के जटिल प्रयोग के बजाय सीधे और स्पष्ट शब्दों का चयन किया गया है, ताकि हर कोई इसके भाव को आसानी से समझ सके।
- काव्य रूप: यह एक पारंपरिक लोक-भजन है जिसमें स्थाई और अंतरा शैली का प्रयोग किया गया है।
- लय एवं ताल: इसे कहहरवा या दादरा ताल में आसानी से गाया जा सकता है।
- बिम्ब योजना: भजन में 'कैलाश', 'भंग पियाले', 'भस्म', 'नाग' और 'डमरू' जैसे बिम्ब शिव के वैराग्य को जीवंत करते हैं।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन केवल मनोरंजन या संगीत का साधन नहीं है, बल्कि इसमें जीवन के गहरे दार्शनिक संदेश छिपे हैं:
- अहंकार का त्याग: भौतिक धन-दौलत और रोब-दबदबा क्षणिक है; वास्तविक सुंदरता सादगी और प्रेम में है।
- संतोषी स्वभाव: भगवान शिव का जीवन हमें सिखाता है कि सीमित संसाधनों में भी प्रसन्न और संतुष्ट कैसे रहा जा सकता है।
- पति-पत्नी का आत्मीय संबंध: शिव और पार्वती का प्रसंग यह सिखाता है कि वैचारिक या स्वभाविक भिन्नताओं के बावजूद आत्मीय प्रेम रिश्ते को मजबूत रखता है।
- आंतरिक सुख की खोज: बाहरी दिखावे से दूर रहकर अपनी आत्मा की शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | सांस्कृतिक / आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| गोरा | माता पार्वती | गौरी यानी गौर वर्ण वाली माता पार्वती का लोक नाम। |
| रोब | अधिकार या धौंस जमाना | पति पर अपना प्रभाव दिखाने की सामान्य मानवीय प्रवृत्ति। |
| भोले भंडारी | भगवान शिव | जो बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाएं और सब कुछ देने वाले हों। |
| भस्म | विभूति / राख | नश्वरता का प्रतीक, जिसे शिव शरीर पर लगाते हैं। |
| मृगचर्म | हिरण की खाल | तपस्वियों द्वारा आसन या वस्त्र के रूप में प्रयुक्त होने वाली खाल। |
| जोगनूरत | योगी का स्वरूप | भगवान शिव का अलौकिक और वैराग्य से परिपूर्ण रूप। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
पंक्ति: "गोरा इतना रोब दिखावे ना, मेरे भोले पे रोब चलावे ना! अरे भोले हैं भंडारी, इनपे गुस्सा तू दिखाए ना!"
भावार्थ: लोक-गायक माता पार्वती से आग्रह कर रहे हैं कि हे गोरा! आप महादेव पर अपना अधिकार या गुस्सा मत दिखाइए। वे तो अत्यंत भोले हैं और भक्तों पर सब कुछ लुटाने वाले भंडारी हैं। उन पर क्रोध करना उचित नहीं है।
पंक्ति: "तू बैठी महलों में रानी, भोले कैलाश पे रहते हैं! भंग पियाले पीकर भोले, बाबा बम-बम कहते हैं!"
भावार्थ: आपका निवास दिव्य महलों में है, जबकि आपके स्वामी भगवान शिव बर्फीले कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। वे सांसारिक मोह से दूर अपनी मस्ती में मस्त रहते हैं।
पंक्ति: "गले में इनके नाग विराजे, तन पे भस्म रमावे हैं! मुण्डो की माला ये पहने, और मृगचर्म ओढ़ावे हैं!"
भावार्थ: शिवजी के आभूषण आम मनुष्यों जैसे नहीं हैं। उनके गले में विषधर नाग सुशोभित हैं, शरीर पर श्मशान की भस्म रमी है और वे मुंडों की माला तथा मृगचर्म धारण करते हैं।
पंक्ति: "तू मांगे गहने सोने के, भोले को फिकर न काई की! डम-डम डमरू बजावे डमरू, मस्ती है भोले भाई की!"
भावार्थ: आप सोने-चाहे गहनों की इच्छा रखती हैं, परंतु भोलेनाथ को इन भौतिक चीजों की कोई चिंता नहीं है। वे तो अपने डमरू की नाद में ही ब्रह्मांड की मस्ती में लीन रहते हैं।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
शिव-पार्वती की आराधना करते समय निम्नलिखित महामृत्युंजय मंत्र और शिव पंचाक्षर मंत्र का स्मरण करना अत्यंत पुण्यदायी होता है:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
एवं पंचाक्षर मंत्र: ॐ नमः शिवाय॥
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | गोरा इतना रोब दिखावे ना (Gora Itna Rob Dikhawe Naa) |
|---|---|
| समर्पित देवता | भगवान शिव एवं माता पार्वती |
| संगीत शैली | लोक भजन / पारंपरिक भक्ति गीत |
| भाषा | हिंदी / लोक भाषा |
| मुख्य भाव | प्रेम, नोकझोक, वैराग्य और समर्पण |
| उपयुक्त अवसर | सावन मास, शिवरात्रि, प्रदोष व्रत, जागरण |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
भक्तलिका की संपादकीय टीम द्वारा प्रस्तुत यह मार्गदर्शिका सनातन धर्म की लोक-परंपरा और शिव-भक्ति के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। इस सामग्री में शब्दों के शुद्ध उच्चारण, भावार्थ की गहराई और सांस्कृतिक महत्व का पूर्ण ध्यान रखा गया है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया गया है कि पाठकों को प्रामाणिक, सरल और आत्मीय जानकारी प्राप्त हो।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- पारंपरिक लोक-साहित्य एवं मौखिक भक्ति परंपरा
- शिव पुराण (आचार्य शांतिकर्म द्वारा हिंदी अनुवादित)
- रामचरितमानस - गोस्वामी तुलसीदास (शिव-पार्वती प्रसंग)
- सनातन धर्म संस्कृति एवं व्रत-त्योहार संदर्भ ग्रंथ
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