बांस की बांसुरिया पे घणो इतरावे लिरिक्स - निशा शर्मा भजन परिचय
भक्ति और संगीत की पावन धारा में ब्रज संस्कृति और भगवान श्रीकृष्ण की मोहक लीलाओं का एक विशिष्ट स्थान है। निशा दत्त शर्मा की सुरीली और भावपूर्ण आवाज में गाया गया लोकप्रिय कृष्ण भजन "बांस की बांसुरिया पे घणो इतरावे" भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। यह भजन भगवान श्रीकृष्ण और उनकी प्रिय वेणु (बांसुरी) के बीच के अलौकिक प्रेम, बाल्यकाल की सरल लीलाओं और भक्त-भगवान के मधुर संवाद को बहुत ही सुंदर राजस्थानी व ब्रज मिश्रित लोक शैली में प्रस्तुत करता है। इस भजन में एक अनूठा उलाहना और प्रेम भरा व्यंग्य है कि वह साधारण सी बांसुरी, जो कभी एक साधारण बांस का टुकड़ा हुआ करती थी, आज साक्षात परब्रह्म श्री कृष्ण के अधरों का स्पर्श पाकर किस प्रकार गर्व महसूस करती है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस लोकप्रिय भजन के संपूर्ण बोल, इसका सरल हिंदी अर्थ, आध्यात्मिक संदर्भ, भावार्थ और जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण सीख को समझेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:
मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन:
बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे,
कोई सोना की जो होती हीरा मोत्यां की जो होती,
जाणे कांई करतो कांई करतो,
बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे.....||
जेल में जनम लेके घणो इतरावे,
कोई महलां में जो होतो कोई अंगना में जो होतो,
जाणे कांई करतो कांई करतो,
बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे.....||
देवकी रे जन्म लेके घणो इतरावे,
कोई यशोदा के जो होतो मां यशोदा के जो होतो,
जाणे कांई करतो कांई करतो,
बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे.....||
गाय को ग्वालो होके घणो इतरावे,
कोई गुरूकुल में जो होतो कोई विद्यालय में जो होतो,
जाणे कांई करतो कांई करतो,
बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे.....||
गुजरया की छोरियां पे घणो इतरावे,
ब्राह्मण बनिया की जो होती सेठ ठाकुरां की जो होती,
जाणे कांई करतो कांई करतो,
बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे.....||
सांवली सुरतिया पे घणो इतरावे,
कोई गोरो सो जो होतो कोई सोणो सो जो होतो,
जाणे कांई करतो कांई करतो,
बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे.....||
माखन और मिश्री पे घणो इतरावे,
छप्पन भोग जो होतो काजू मेवा जो होतो,
जाणे कांई करतो... कांई करतो,
बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे.....||
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और दार्शनिक है। भक्त और भगवान के बीच का जो संबंध है, वह प्रेम और अधिकार का है। भजन की हर पंक्ति में भगवान कृष्ण की सादगी, उनकी लीलाओं और उनकी महानता का बखान करते हुए उन पर एक सहज उलाहना कसा गया है कि वे किस प्रकार साधारण सी वस्तुओं और परिस्थितियों से प्रेम करते हैं।
पहली पंक्ति में कहा गया है कि भगवान कृष्ण अपनी उस बांसुरी पर बहुत इतराते (गर्व करते) हैं जो साधारण बांस से बनी है। यदि वह बांसुरी सोने की या कीमती हीरे-मोती की बनी होती, तो न जाने कृष्ण क्या करते! इसका अर्थ यह है कि भगवान को बाहरी दिखावा, सोना-चांदी या वैभव नहीं, बल्कि भीतर से खोखली (अहंकार शून्य) और समर्पण से भरी हुई बांसुरी प्रिय है। बांसुरी जब अपने सारे अहंकार और गांठों को त्यागकर खाली हो जाती है, तभी भगवान उसे अपने होठों से लगाते हैं।
इसी प्रकार, भजन में कारागार (जेल) में जन्म लेने, यशोदा मैया के लाड़-प्यार में पलने, गाय चराने वाले ग्वालबाल बनने और गोपियों के साथ प्रेमपूर्ण लीलाएं करने का प्रसंग आता है। भक्त कहते हैं कि यदि कृष्ण बड़े महलों में जन्म लेते या किसी बड़े विद्यालय में शिक्षा पाते, तो न जाने उनका अहंकार कितना बढ़ जाता। भगवान का सांवला रूप, उनका माखन-मिश्री प्रेम और उनकी छप्पन भोग के स्थान पर साधारण प्रेमियों का दिया हुआ जूठा या सादा भोजन स्वीकार करना यह सिखाता है कि परमात्मा को बाह्य आडंबर नहीं बल्कि निश्छल प्रेम पसंद है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह कृष्ण भक्ति की लोक परंपरा का एक जीवंत दस्तावेज है। इसकी विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- लोक शैली और सुगमता: राजस्थानी और ब्रज लोक संगीत की मिठास इस भजन को हर उम्र के श्रोताओं के बीच लोकप्रिय बनाती है।
- अहंकार शून्यता का संदेश: बांसुरी के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि ईश्वर की कृपा पाने के लिए व्यक्ति को अपने भीतर के अहंकार की 'गांठों' को मिटाना पड़ता है।
- निशा दत्त Sharma की गायकी: गायिका ने अपनी मधुर आवाज में भगवान कृष्ण के प्रति सखियों और भक्तों के भाव को जीवंत कर दिया है।
- आप इस सुंदर भजन के साथ अन्य लोकप्रिय रचनाओं जैसे श्री कृष्ण भजन लिरिक्स संग्रह और राधा कृष्ण स्टेटस व कोट्स का भी आनंद ले सकते हैं।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को गाने और सुनने के लिए किसी विशेष नियम या कठोर अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यह भाव का मार्ग है। फिर भी, इसे निम्नलिखित अवसरों पर पूरी श्रद्धा के साथ गाया जा सकता है:
- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: जन्माष्टमी के पावन अवसर पर रात्रिकालन सत्संग और झांकी दर्शन के समय।
- दैनिक पूजा और कीर्तन: संध्याकालीन आरती के पश्चात घर में परिवार के साथ बैठकर।
- सांस्कृतिक व धार्मिक कार्यक्रम: महिलाओं द्वारा आयोजित मंगल गीतों, भजन संध्या और सत्संग के दौरान।
- आप हमारे अन्य लोकप्रिय पृष्ठों जैसे श्री हनुमान चालीसा और शिव तांडव स्तोत्र पर जाकर अन्य देवी-देवताओं के स्तोत्र भी पढ़ सकते हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पदावली | सरल अर्थ | संदर्भ / भावार्थ |
|---|---|---|
| इतरावे | गर्व करना या ठसक दिखाना | भगवान का अपनी बांसुरी और लीलाओं पर प्रेमपूर्ण गर्व। |
| बाँसुरिया | छोटी बांसुरी (वेणु) | कृष्ण का प्रिय वाद्य यंत्र जो बांस से बनता है। |
| ग्वालो | गाय चराने वाला ग्वालबाल | कृष्ण का गोकुल में साधारण ग्वालों के संग रहना। |
| सांवली सुरतिया | श्याम वर्ण रूप | भगवान कृष्ण का सांवला और मनमोहक सौंदर्य। |
| माखन और मिश्री | प्रसाद / प्रिय भोग | कृष्ण की बाल्यकाल की माखन चोरी की लीला। |
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | बांस की बांसुरिया पे घणो इतरावे लिरिक्स (Baans Ki Basuriya Pe Ghano Itrave) |
| गायिका | निशा दत्त शर्मा (Nisha Dutt Sharma) |
| आराध्य देव | भगवान श्री कृष्ण एवं राधारानी |
| संगीत शैली | लोक भजन / राजस्थानी-ब्रज मिश्रित लोकगीत |
| विषय / थीम | कृष्ण लीला, बांसुरी प्रेम और भक्ति भाव |
| भाषा | हिंदी / राजस्थानी लोक भाषा |
| उपयुक्त अवसर | जन्माष्टमी, सत्संग, भजन संध्या, कीर्तन |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख भक्तों की सुविधा के लिए प्रामाणिक लोक परंपराओं और उपलब्ध साहित्यिक संदर्भों के आधार पर तैयार किया गया है।
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