भगवान श्री रामचंद्र जी की भक्ति में समर्पित यह भजन "तेरी पूजा मे मन लीन रहे, मेरा मस्तक हो और द्वार तेरा" एक अत्यंत भावपूर्ण और आत्मसमर्पण का संदेश देने वाला पावन कीर्तन है। यह भजन साधक के हृदय में शरणागति, विनम्रता और भगवान के प्रति अनन्य प्रेम का भाव जागृत करता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की महिमा का गुणगान करने वाले इस भजन में भक्त अपने जीवन को पूर्णतः प्रभु के चरणों में समर्पित करने की कामना करता है। भजन की लय और शब्द भक्त को सीधे साकेत धाम की पावन चेतना से जोड़ते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के सिद्धांतों के अनुसार, राम का नाम स्वयं राम से भी अधिक सामर्थ्यवान है। यह भजन विशेष रूप से राम नवमी, विवाह पंचमी, दीपावली, और प्रत्येक मंगलवार एवं शनिवार को श्रद्धालुओं द्वारा गाया जाता है। इसकी मधुर लय और गहन भावार्थ भक्तों को आंतरिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
तेरी पूजा मे मन लीन रहे, मेरा मस्तक हो और द्वार तेरा।
तेरी पूजा मे मन लीन रहे, मेरा मस्तक हो और द्वार तेरा।
तेरे चरणों में जो भी आया, उसका हो जाए उद्धार सहारा।
तेरी पूजा मे मन लीन रहे, मेरा मस्तक हो और द्वार तेरा।।
जब तक सांस चले इस तन में, तेरा ही गुणगान करूँ मैं।
तेरे नाम की माला जपकर, अपना जीवन धन्य करूँ मैं।
तेरी पूजा मे मन लीन रहे, मेरा मस्तक हो और द्वार तेरा।।
माया मोह के बंधन तोड़े, तेरा भजन ही मेरा सहारा।
तेरे दरस की प्यासी आँखें, तुझमें ही मन रमता है मेरा।
तेरी पूजा मे मन लीन रहे, मेरा मस्तक हो और द्वार तेरा।।
जो भी तेरे द्वार पे आया, कभी निराश नहीं लौट पाया।
तेरी कृपा से पतित भी पावन, तेरा ही आश्रय मैंने पाया।
तेरी पूजा मे मन लीन रहे, मेरा मस्तक हो और द्वार तेरा।।
राम नाम रस पीकर मैं तो, मस्त हुआ दीवाना।
तेरे चरणों की धूल बनूँ मैं, यही है जीवन का सपना।
तेरी पूजा मे मन लीन रहे, मेरा मस्तक हो और द्वार तेरा।।
तेरी पूजा मे मन लीन रहे, मेरा मस्तक हो और द्वार तेरा।
तेरे चरणों में जो भी आया, उसका हो जाए उद्धार सहारा।
तेरी पूजा मे मन लीन रहे, मेरा मस्तक हो और द्वार तेरा।।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का मुख्य भाव शरणागति और पूर्ण समर्पण का है। भक्त भगवान श्री राम से प्रार्थना करता है कि उसका मन सदैव प्रभु की पूजा और भक्ति में लीन रहे। "मेरा मस्तक हो और द्वार तेरा" का अर्थ है कि भक्त अपने जीवन को पूर्णतः भगवान के चरणों में अर्पित कर देता है, जिससे उसका अहंकार समाप्त हो जाए और वह प्रभु की शरण में आ जाए। यह भाव विनम्रता, आत्मसमर्पण और अनन्य भक्ति का प्रतीक है।
भजन की दूसरी पंक्ति "तेरे चरणों में जो भी आया, उसका हो जाए उद्धार सहारा" यह दर्शाती है कि भगवान राम की शरण में आने वाला कोई भी भक्त कभी निराश नहीं होता। रामचरितमानस में भी कहा गया है कि राम की शरणागति ही जीवन का परम साधन है। भक्त जब तक जीवित है, तब तक प्रभु का गुणगान करना चाहता है और उनके नाम की माला जपकर अपने जीवन को धन्य बनाना चाहता है।
तीसरे अंतरे में भक्त माया और मोह के बंधनों से मुक्त होकर केवल भगवान के भजन को अपना सहारा मानता है। उसकी आँखें प्रभु के दर्शन की प्यासी हैं और उसका मन केवल राम में ही रमता है। यह भाव वैराग्य और प्रेम का अद्भुत संगम है। चौथे अंतरे में भक्त कहता है कि जो भी भगवान के द्वार पर आया, वह कभी निराश नहीं लौटा। प्रभु की कृपा से पतित भी पावन हो जाते हैं, और भक्त ने उनका आश्रय पाया है।
अंतिम अंतरे में भक्त राम नाम रस का पान करके मस्त और दीवाना हो जाता है। वह प्रभु के चरणों की धूल बनना चाहता है, जो जीवन का परम सपना है। इस प्रकार यह भजन भक्ति, शरणागति, वैराग्य और प्रेम का सुंदर संदेश देता है। यह साधक को सांसारिक बंधनों से मुक्त करके परमात्मा के चरणों में स्थायी शांति और आनंद प्रदान करता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन भगवान श्री रामचंद्र जी को समर्पित है, जो मर्यादा पुरुषोत्तम और धर्म के प्रतीक हैं। भजन का मुख्य विषय शरणागति, भक्ति और आत्मसमर्पण है। इस भजन को सुनने और गाने से भक्त के मन में वैराग्य, संयम, दया और प्रेम का भाव जागृत होता है। सनातन ग्रंथों के अनुसार, राम नाम का जाप कलयुग का सर्वश्रेष्ठ साधन माना गया है। वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में राम नाम की असीम महिमा गाई गई है।
इस भजन की लय और शब्द भक्त को सीधे साकेत धाम की पावन चेतना से जोड़ते हैं। जब जीव समस्त सांसारिक प्रपंचों से थककर भगवान राम के चरणों में शरण लेता है, तो उसे परम अभय की प्राप्ति होती है। राम नाम की ध्वनि से वातावरण शुद्ध होता है और अंतःकरण में धर्म और सत्य के प्रति निष्ठा दृढ़ होती है। यह भजन विशेष रूप से उन भक्तों के लिए है जो जीवन में शांति, स्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को किसी भी शुभ अवसर पर गाया और सुना जा सकता है। विशेष रूप से राम नवमी, विवाह पंचमी, दीपावली, और प्रत्येक मंगलवार एवं शनिवार को इस भजन का गायन अत्यंत फलदायी माना जाता है। सुबह के समय ब्रह्म मुहूर्त में या संध्या के समय दीपक जलाकर इस भजन को गाने से विशेष आध्यात्मिक लाभ मिलता है।
भजन गाने की विधि अत्यंत सरल है। सर्वप्रथम स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान राम की मूर्ति या चित्र के समक्ष दीपक और धूप जलाएं। फिर हाथ जोड़कर भजन का गायन प्रारंभ करें। भजन गाते समय मन को एकाग्र रखें और प्रभु के चरणों में पूर्ण समर्पण का भाव रखें। भजन के बाद राम रक्षा स्तोत्र या हनुमान चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं। इससे भक्ति और भी गहन होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे भक्तिलोक की टीम द्वारा शास्त्रीय ग्रंथों, रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण और प्रामाणिक भक्ति परंपराओं के आधार पर तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सटीक, गहन और आध्यात्मिक रूप से पोषक सामग्री प्रदान करना है।
संदर्भ: रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण, भक्ति आंदोलन की परंपरा, और लोक भजन संग्रह।
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