Papmochani Ekadashi Vrat Katha

करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं स्वीकार करो माँ (Karti Hoon Tumhara Vrat Mai Lyrics in Hindi) - Neelima Nilaye Maa Bhajan - Bhaktilok

124 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

माँ जगदंबे, आदि शक्ति भगवती दुर्गा के चरणों में समर्पित यह अत्यंत भावुक और पावन भजन "करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं स्वीकार करो माँ (Karti Hoon Tumhara Vrat Mai Lyrics in Hindi) - Neelima Nilaye Maa Bhajan" सनातन धर्म की अनन्य भक्ति परंपरा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। नीलिमा निलये जी की मधुर वाणी और दिव्य रचना से सजे इस भजन में एक भक्त की अपनी इष्ट देवी माँ के प्रति अगाध श्रद्धा, पूर्ण शरणागति और व्रत-आराधना की सच्ची पुकार स्पष्ट रूप से झलकारी देती है। हिंदू सनातन संस्कृति में व्रत, उपवास और अनुष्ठान केवल शारीरिक शुद्धि के साधन मात्र नहीं हैं, बल्कि यह जीवात्मा का परमात्मा के साथ एकाकार होने का एक अत्यंत सुगम मार्ग है। जब एक साधक सच्चे मन से नियम, संयम और विधि-विधान के साथ माता रानी का व्रत रखता है, तो उसके अंतःकरण में भक्ति रूपी अमृत का स्वतः संचार होने लगता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस पावन भजन के संपूर्ण हिंदी बोल (Lyrics), उसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ, भावार्थ, व्रत-पूजन की विधि, और जीवन में इस भक्ति संगीत का महत्व।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं, स्वीकार करो माँ,
मेरे सूने जीवन में, नवप्राण भरो माँ।

चरणों में तेरे झुकता, मेरा ये मस्तक सारा,
बिन तेरे जग में माँ, नहीं कोई सहारा।
मेरी इस सूनी झोली में, प्रकाश करो माँ,
करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं, स्वीकार करो माँ...

नियम संयम से माँ मैंने, तेरी जोत जलाई,
अंधियारी रातों में तूने, मुझको राह दिखाई।
अपनी इस ममता की छाया, विस्तार करो माँ,
करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं, स्वीकार करो माँ...

दुखियों की दुखहारी तू ही, संकट हर लेती,
जो भी मांगे सच्चे मन से, झोली भर देती।
भक्तों के इस जीवन का, उद्धार करो माँ,
करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं, स्वीकार करो माँ...

घट-घट कीवासी अंबे, तू ही जग की माता,
तेरे सिवा जग में माँ, कोई न दिल को भाता।
'नीलिमा' की इस विनती को, स्वीकार करो माँ,
करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं, स्वीकार करो माँ...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन साधक और आराध्य के बीच के उस अटूट रिश्ते को समर्पित है जहाँ भक्त पूरी निष्ठा के साथ माँ की आराधना करता है। भजन की पहली पंक्ति 'करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं, स्वीकार करो माँ' में एक समर्पित साधिका अपनी कुलदेवी या जगदंबा माँ से यह प्रार्थना करती है कि हे माँ! मैंने आपके निमित्त जो यह व्रत, उपवास और साधना की है, उसे आप अपनी करुणा से स्वीकार करें तथा मेरे नीरस और कष्टमय जीवन में नए उत्साह और ऊर्जा का संचार करें।

मध्यवर्ती पंक्तियों में भक्त अपने अहंकार का त्याग कर माँ के चरणों में नतमस्तक होता है और स्वीकार करता है कि इस विशाल संसार में आपके अलावा मेरा कोई अन्य रक्षक नहीं है। व्रत और उपवास के माध्यम से मन को नियंत्रित करने, संयमित जीवन जीने और अंतःकरण में ज्ञान रूपी दीपक प्रज्वलित करने का सुंदर चित्रण इन पंक्तियों में मिलता है। जब मनुष्य सांसारिक दुखों से विचलित हो जाता है, तब माता की ममतामयी छाया ही उसे असीम शांति प्रदान करती है। यह भजन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति किसी दिखावे की मोहताज नहीं होती, बल्कि यह हृदय के शुद्ध भाव और समर्पण पर निर्भर करती है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

सनातन परंपरा में व्रत और संकीर्तन का अत्यंत ऊंचा स्थान माना गया है। श्रीमद्भागवत गीता और विभिन्न पुराणों में भी भगवती दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की उपासना का विशेष महात्म्य बताया गया है। इस भजन की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • अनन्य शरणागति: भजन में भक्त का अपनी माँ के प्रति पूर्ण समर्पण और अटूट विश्वास झलकता है।
  • व्रत और साधना का महिमामंडन: यह भजन साधक को नियम, संयम, पवित्रता और नियमित व्रत रखने की प्रेरणा देता है।
  • मानसिक शांति और संबल: इस भजन के निरंतर श्रवण या गायन से मन का भटकाव दूर होता है और आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है।
  • भक्ति रस से परिपूर्ण: यह रचना किसी भी पारिवारिक दीपावली व्रत कथा, मंगलवार व्रत कथा या माँ भगवती के जागरण और सत्संग के अवसरों पर गाने के लिए अत्यंत उपयुक्त है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस पवित्र भजन को गाने और सुनने के लिए ब्रह्म मुहूर्त, संध्या बेला (प्रदोष काल) या माँ दुर्गा के पूजन का समय सबसे उत्तम माना जाता है। इसे आप निम्नलिखित अवसरों पर गा सकते हैं:

  • नवरात्रि के नौ दिनों के पावन पर्व पर कलश स्थापना और माता के पूजन के समय।
  • मंगलवार, शुक्रवार या किसी भी देवी व्रत के उद्यापन और कथा वाचन के दौरान।
  • घर में आयोजित होने वाले पारिवारिक अनुष्ठानों, देवी जागरण या संकीर्तन बैठकों में।
  • जब भी मन अशांत हो अथवा जीवन में कोई संकट या मानसिक उलझन महसूस हो, तब एकांत में बैठकर इस भजन का स्मरण करने से अद्भुत मानसिक शांति मिलती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन की केंद्र बिंदु हैं आदिशक्ति माँ जगदंबे, जो संपूर्ण ब्रह्मांड की जननी, पालनहार और संकटमोचिनी हैं। हिन्दू धर्म में माता दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों जैसे माँ शैल पुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा पूरे देश में विधि-विधान से की जाती है। इस भजन की रचना और स्वर सज्जा भक्ति संगीत परंपरा को आगे बढ़ाने वाले प्रसिद्ध कलाकारों द्वारा की गई है, जो श्रोताओं के मन में देवी के प्रति अगाध प्रेम जगाते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

भक्तिकाल से लेकर आधुनिक युग तक संकीर्तन की परंपरा सनातन संस्कृति का प्राण रही है। नीलिमा निलये जी द्वारा प्रस्तुत यह भजन आधुनिक युग की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों को अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जोड़ने का एक सुंदर प्रयास है। इस भजन की रचना शैली अत्यंत सरल, सहज और आम जनमानस के हृदय को सीधे छूने वाली है, जिससे कोई भी बच्चा, युवा या वृद्ध इसे आसानी से गा और समझ सकता है.

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल हिंदी एवं ब्रज-अवधि के सहज शब्दों का मिश्रण है, जिसे भारत के किसी भी कोने में आसानी से समझा और गाया जा सकता है। इसमें रूपक अलंकार और भक्ति रस की प्रधानता है। शब्दों का चयन इस प्रकार किया गया है कि उच्चारण करते ही जिह्वा पर पवित्रता और भावुकता का अनुभव होने लगता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल एक गीत नहीं बल्कि जीवन जीने की एक सुंदर कला और आध्यात्मिक मार्गदर्शिका है:

  • धैर्य और संयम: व्रत और उपवास हमें जीवन में संयम रखना सिखाते हैं।
  • अहंकार का त्याग: यह सिखाता है कि मनुष्य को अपनी हर सफलता और असफलता में माँ के चरणों में समर्पित रहना चाहिए।
  • निस्वार्थ प्रार्थना: सच्चा भक्त माँ से संसार की भौतिक वस्तुओं से पहले उनकी कृपा और भक्ति मांगता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
व्रत संकल्प, उपवास,नियम इंद्रियों पर नियंत्रण और ईश्वर प्राप्ति का संकल्प
नवप्राण नई ऊर्जा, नया जीवन भक्ति के द्वारा जीवन में उत्साह का संचार
घट-घट वासी कण-कण में निवास करने वाली परमात्मा की सर्वव्यापकता
शरणागति पूर्ण समर्पण अपनी रक्षा का भार पूरी तरह भगवान पर छोड़ देना

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं, स्वीकार करो माँ..." - इस पंक्ति में साधिका अपनी माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहती है कि हे माँ! मैंने जो यह अनुष्ठान आपके लिए किया है, उसे आप सहर्ष स्वीकार करें और मेरी झोली अपनी कृपा से भर दें।

"नियम संयम से माँ मैंने, तेरी जोत जलाई..." - इसका भाव यह है कि मैंने अपने जीवन में धर्म के मार्ग पर चलते हुए, अपने अंतःकरण को शुद्ध रखकर आपके नाम की अलख जगाई है। अब आप ही मेरे जीवन के अंधकार को दूर कर प्रकाश फैलाएं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के पाठ के साथ निम्नलिखित पावन मंत्र का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना गया है:

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विशेषता विवरण
भजन का नाम करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं स्वीकार करो माँ (Karti Hoon Tumhara Vrat Mai)
आराध्य देवी माँ दुर्गा / आदिशक्ति भगवती
गायक / कलाकार नीलिमा निलये (Neelima Nilaye)
भाषा सरल हिंदी / भक्ति रस
श्रेणी देवी भजन, व्रत कथा गीत, संकीर्तन
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, मंगलवार व्रत, शुक्रवार व्रत, माता जागरण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस पावन भजन की प्रस्तुति नीलिमा निलये जी द्वारा दी गई है, जिनके मधुर स्वरों में माँ भगवती के प्रति अगाध भक्ति झलकाती है।

इस भजन को नवरात्रि, मंगलवार या शुक्रवार के व्रत, देवी पूजन, जागरण, अथवा किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के समय श्रद्धापूर्वक गाया जा सकता है।

व्रत रखने से मन की एकाग्रता बढ़ती है, शरीर और आत्मा की शुद्धि होती है, तथा ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना सुदृढ़ होती है।

हाँ, इस लेख में संपूर्ण भजन के बोल देवनागरी लिपि (हिंदी) में अर्थ सहित उपलब्ध कराए गए हैं ताकि आप आसानी से इसका पाठ कर सकें।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख भक्तिलोक के विद्वान आचार्यों और संपादकीय टीम द्वारा सनातन ग्रंथों, लोकगीतों और पारंपरिक व्रत कथाओं के अध्ययन के पश्चात पूरी प्रामाणिकता के साथ तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध भक्ति सामग्री प्रदान करना है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत इस आलेख को समय-समय पर अद्यतन किया जाता है ताकि उपयोगकर्ताओं को सर्वोत्तम अनुभव प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • सनातन देवी भागवत पुराण एवं दुर्गा सप्तशती
  • पारंपरिक लोक भजन एवं संकीर्तन संग्रह
  • भक्तिलोक सांस्कृतिक और धार्मिक ग्रंथ आलेख

संबंधित भजन एवं लेख

आप हमारी वेबसाइट पर अन्य पावन व्रत कथाओं और भजनों का भी आनंद ले सकते हैं:

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!