Matarani Bhajan

आओ भोग लगाओ मेरी मैया लिरिक्स (Aao Bhog lagao meri maiya Lyrics in Hindi) - Matarani Bhajan - Bhaktilok

472 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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आओ भोग लगाओ मेरी मैया लिरिक्स - Matarani Bhajan परिचय

माता रानी की आराधना और उनके प्रति अगाध प्रेम को अभिव्यक्त करने वाले भजनों में 'आओ भोग लगाओ मेरी मैया' (Aao Bhog Lagao Meri Maiya Lyrics) का एक विशिष्ट और अत्यंत पावन स्थान है। यह भजन आदिशक्ति जगत जननी माँ दुर्गा, माता वैष्णो देवी, और विभिन्न शक्तिपीठों की अधिष्ठात्री महामाया के चरणों में अनन्य समर्पण, भाव-विभोर कर देने वाली पुकार और आत्मीयता का प्रतीक है। सनातन धर्म में माँ को केवल जगत की संचालिका ही नहीं, बल्कि एक परम स्नेही जननी के रूप में देखा गया है, जो अपने बालकों की छोटी-से-छوٹی भेंट को भी उसी प्रकार सहर्ष स्वीकार करती है जिस प्रकार उसने त्रेता और द्वापर युग में अपने अनन्य भक्तों के प्रेम को स्वीकार किया था। इस भजन में शबरी के बेर, सुदामा के चावल, और विदुर जी के घर मिलने वाले सादा शाक जैसे महान पौराणिक प्रसंगों का सुंदर समावेश किया गया है, जो यह सिद्ध करता है कि भगवान या देवी को प्रसन्न करने के लिए किसी भव्य वैभव की नहीं, बल्कि केवल निर्मल अंतःकरण और सच्चे प्रेम की आवश्यकता होती है। प्रसिद्ध गायिका शीला कालसन (Sheela Kalson) की मधुर और भावपूर्ण आवाज में गाए गए इस भजन को सुनने मात्र से मन में भक्ति रस की त्रिवेणी बहने लगती है। नवरात्र के पावन दिनों, माता के जागरण, कन्या पूजन, चौकी, और दैनिक संध्या वंदन के समय इस भजन का श्रवण और गायन भक्तों को एक अलौकिक शांति और आनंद की अनुभूति कराता है। यह भजन न केवल आध्यात्मिक चेतना को जागृत करता है, बल्कि साधक के जीवन में सकारात्मकता, कृतज्ञता और भगवद्-भक्ति के दीप को प्रज्वलित करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics


मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन - शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:

आओ भोग लगाओ मेरी मैया
रुच रुच भोग लगाओ मेरी मैया
मेरा भोग करो स्वीकार
कर दो बेड़ा पार……

पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण
चारो दिशाओ से आओ मेरी मैया
आओ भोग लगाओ मेरी मैया
रुच रुच भोग लगाओ मेरी मैया……

भीलनी के बेर सुदामा के चावल
रुच रुच भोग लगाओ मेरी मैया
आओ भोग लगाओ मेरी मैया
रुच रुच भोग लगाओ मेरी मैया……

दुर्योधन की मेवा त्यागी
साग विधुर घर खाओ मेरी मैया
आओ भोग लगाओ मेरी मैया
रुच रुच भोग लगाओ मेरी मैया……

ऐसा भोग लगाओ मेरी मैया
सब अमृत हो जाये मेरी मैया
आओ भोग लगाओ मेरी मैया
रुच रुच भोग लगाओ मेरी मैया……

जो तेरे इस भोग को खावे
वो तेरा हो जाये मेरी मैया
आओ भोग लगाओ मेरी मैया
रुच रुच भोग लगाओ मेरी मैया……

हम भक्तो की एक अर्ज है
कर दरश दिखाओ मेरी मैया
आओ भोग लगाओ मेरी मैया
रुच रुच भोग लगाओ मेरी मैया……


गायक / कलाकार: शीला कालसन (Singer ▹ Sheela Kalson)

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह एक भक्त और भगवती के बीच के वात्सल्यपूर्ण संबंध की पराकाष्ठा है। भजन की शुरुआत 'आओ भोग लगाओ मेरी मैया' पुकार से होती है, जहाँ भक्त माता को अपनी श्रद्धा का नैवेद्य ग्रहण करने के लिए बड़े ही प्रेम से आमंत्रित करता है। 'रुच रुच भोग लगाओ' का अर्थ है कि हे मैया! आप बड़े चाव, रुचि और प्रसन्नता के साथ इस भोग को स्वीकार करें। भक्त मैया से प्रार्थना करता है कि वह उसके द्वारा अर्पित किए गए छोटे से भोग को स्वीकार करके उसके इस भवसागर रूपी संसार के बेड़े को पार लगा दें।

भजन के अगले चरण में भक्त माता का आह्वान चारों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) से करता है, जिसका दार्शनिक अर्थ यह है कि जगत जननी सर्वव्यापी हैं और वे किसी एक स्थान पर सीमित न होकर ब्रह्मांड के हर कोने में विराजमान हैं। भक्त मैया को मनाने के लिए भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े प्रेम प्रसंगों का स्मरण कराता है—'भीलनी के बेर सुदामा के चावल' और 'दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विधुर घर खाओ'। इन पंक्तियों के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि माता रानी को बाह्य दिखावा, छप्पन भोग या सोने-चांदी के बर्तन नहीं सुहाते; उन्हें तो शबरी के प्रेम से जूठे किए गए बेर और सुदामा के तंदुल (चावल) जैसी पवित्र भावनाएं प्रिय हैं। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के राजसी छप्पन भोग को ठुकराकर विदुर जी के यहाँ साधारण साग बड़े प्रेम से खाया था, उसी प्रकार माँ भी अपने सच्चे भक्त के भाव को देखती है, वस्तु के मूल्य को नहीं।

अंत में भक्त निवेदन करता है कि हे मैया! हमारे इस साधारण से भोग को ऐसा अमृतमय बना दो कि जो भी इसे ग्रहण करे, वह पूर्णतः तुम्हारा ही होकर रह जाए। यह भजन साधक के उस आंतरिक समर्पण को दर्शाता है जहाँ वह अपने जीवन की हर वस्तु माता को समर्पित कर देना चाहता है और अंत में केवल माँ के दिव्य दर्शन की भीख मांगता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता, मार्मिकता और लोक-संगीत की सी मिठास है। इसे किसी भी आयु वर्ग के लोग आसानी से गा सकते हैं और इसमें प्रयुक्त पौराणिक उदाहरण जनमानस के हृदय में तुरंत उतर जाते हैं। शक्ति की उपासना में भोग और प्रसाद का विशेष महत्व होता है। जब कोई भक्त भावपूर्ण तरीके से माता को भोग लगाता है, तो वह वस्तु भौतिक न रहकर प्रसाद बन जाती है जो शरीर और आत्मा दोनों को तृप्त करती है। नवरात्र के दिनों में जब देश भर के मंदिरों और घरों में माता की आराधना होती है, तब इस प्रकार के भजन वातावरण को पूरी तरह से चैतन्य और ऊर्जावान बना देते हैं। यह भजन हमें सिखाता है कि पूजा-पाठ में धन या वैभव से अधिक महत्वपूर्ण हमारा समर्पण और निर्मल हृदय है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस पावन भजन का गायन और श्रवण निम्नलिखित अवसरों पर विशेष रूप से फलदायी माना जाता है:

  • दैनिक संध्या वंदन एवं आरती: प्रतिदिन सुबह या शाम को माता के समक्ष दीपक प्रज्वलित करने के बाद भोग लगाते समय।
  • नवरात्र उत्सव: चैत्र और शारदीय नवरात्र के नौ दिनों में विशेष हवन, कन्या पूजन और माता के श्रृंगार के समय।
  • माता की चौकी या जागरण: परिवार या सामाजिक आयोजनों में जब माता का जगराता हो, तब माहौल को भक्तिमय बनाने के लिए।
  • पूर्णिमा और अष्टमी व्रत: मासिक दुर्गाष्टमी या पूर्णिमा के उपवास के दौरान जब माता को नैवेद्य अर्पित किया जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन की मुख्य आराध्य देवी माँ दुर्गा / जगत जननी आदिशक्ति हैं, जिन्हें भक्त ममतामयी मैया के रूप में पुकारते हैं। इसके साथ ही, भजन में जिन महान संतों और भक्तों का स्मरण किया गया है—जैसे त्रेता युग की माता शबरी, द्वापर युग के भक्त सुदामा और महात्मा विदुर—वे सभी भगवद्-प्रेम और सादगी के सर्वोच्च प्रतीक माने जाते हैं। इस भजन को स्वरबद्ध करने वाली प्रसिद्ध लोक गायिका शीला कालसन ने अपनी अनूठी गायन शैली से इसे जन-जन तक पहुँचाया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

'आओ भोग लगाओ मेरी मैया' भजन पारंपरिक लोक भजनों की श्रेणी में आता है जिसे समकालीन भक्ति संगीत कलाकारों ने अपने सुंदर स्वरों से संवारा है। इस प्रकार की रचनाएं सदियों से मौखिक परंपरा और लोक गाथाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति में जीवित रही हैं। इसका मूल उद्देश्य गृहस्थों और सामान्य जन को भक्ति के सरल मार्ग से जोड़ना है, जहाँ वे बिना किसी कठिन अनुष्ठान के केवल प्रेम के बल पर भगवती को प्रसन्न कर सकें। इसी श्रृंखला में आप श्री हनुमान चालीसा और दुर्गा सप्तशती के पाठ से भी अपनी आध्यात्मिक यात्रा को और अधिक समृद्ध बना सकते हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सहज और आम बोलचाल की हिंदी (खड़ी बोली एवं लोक भाषा मिश्रित) है। इसमें किसी भी प्रकार के क्लिष्ट संस्कृत शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है ताकि एक आम से आम श्रद्धालु भी इसे आसानी से समझ सके और गा सके। काव्य शैली की दृष्टि से इसमें 'तुकांत' (Rhyme) का विशेष ध्यान रखा गया है जो इसे गाने में अत्यंत कर्णप्रिय और लेवात्मक बनाता है। 'बेर-चावल', 'त्यागी-खाओ', और 'मैया-मैया' जैसे शब्दों का संयोजन श्रोताओं के मन में एक गहरा संवेदनात्मक प्रभाव छोड़ता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन के कई गहरे आध्यात्मिक और नैतिक पाठ पढ़ाता है:

  • निर्मल प्रेम ही सर्वोपरि: ईश्वर या देवी को आपकी संपत्ति नहीं, बल्कि आपका सच्चा प्रेम और भाव चाहिए।
  • अहंकार का त्याग: दुर्योधन के छप्पन भोग का त्याग और विदुर के साग का स्वीकार इस बात का प्रमाण है कि घमंड से भरी हुई भेंट कभी ईश्वर को स्वीकार्य नहीं होती।
  • समर्पण की भावना: अपना सब कुछ मैया को समर्पित कर देने से जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और बेड़ा पार हो जाता है।
  • सर्वव्यापकता का बोध: मैया किसी एक मंदिर में नहीं, बल्कि चारों दिशाओं में और हर सच्चे भक्त के हृदय में निवास करती है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संदर्भ
रुच रुच बड़े चाव से, रुचि लेकर माता द्वारा भोजन या भोग को अत्यंत प्रसन्नता और प्रेम के साथ ग्रहण करना।
नैवेद्य / भोग भोजन अर्पण भगवान या देवी को श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जाने वाला खाद्य पदार्थ।
भीलनी के बेर माता शबरी के जूठे बेर भगवान राम के प्रति शबरी का अनन्य और निश्छल वात्सल्यपूर्ण प्रेम।
विदुर का साग सादा भोजन महाभारत काल में महात्मा विदुर और उनकी पत्नी द्वारा भगवान कृष्ण को परोसा गया साधारण साग।
बेड़ा पार संकटों से मुक्ति जीवन रूपी भवसागर को पार कर मोक्ष या परम शांति की प्राप्ति करना।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: आओ भोग लगाओ मेरी मैया, रुच रुच भोग लगाओ मेरी मैया...
भावार्थ: भक्त अपनी ममतामयी माँ को अत्यंत स्नेह के साथ आमंत्रित कर रहा है कि हे मैया! आप हमारे इस स्थान पर पधारें और हमारे द्वारा अर्पित किए गए भोग को बड़े ही आनंद और चाव के साथ ग्रहण करें।

पंक्ति: भीलनी के बेर सुदामा के चावल, रुच रुच भोग लगाओ मेरी मैया...
भावार्थ: भक्त मैया को याद दिला रहा है कि हे माता! जैसे आपने शबरी के बेर और सुदामा के तंदुल को प्रेमपूर्वक खाया था, वैसे ही हमारे इस छोटे से निवेदन को भी स्वीकार कीजिए।

पंक्ति: दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विधुर घर खाओ मेरी मैया...
भावार्थ: यहाँ भक्त यह दर्शा रहा है कि देवी-देवता कभी भी बाह्य दिखावे या अहंकार के भूखे नहीं होते। दुर्योधन के राजसी व्यंजनों को छोड़कर सादगी और प्रेम से भरे विदुर के घर का साग जैसे भगवान ने खाया, वैसे ही माँ आप भी हमारे भाव को देखें।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

माता रानी को भोग लगाते समय निम्नलिखित पावन मंत्र का स्मरण करना अत्यंत शुभ माना जाता है:

ॐ त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये। गृहाण सम्मुखः कात्त्व प्रसीद परमेश्वरि॥

(हे जगदम्बे! आपकी दी हुई यह वस्तु आपको ही समर्पित है, कृपया इसे स्वीकार करें और हम पर अपनी कृपा बनाए रखें।)

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

श्रेणी (Category) विवरण (Details)
भजन का नाम आओ भोग लगाओ मेरी मैया (Aao Bhog Lagao Meri Maiya)
मुख्य आराध्य माँ दुर्गा / जगत जननी आदिशक्ति / माता रानी
प्रसिद्ध गायिका शीला कालसन (Sheela Kalson)
भाषा सरल हिंदी / लोक भाषा
भक्ति भाव (Bhava) वात्सल्य, समर्पण, प्रेम और विनय
उपयुक्त अवसर नवरात्र, संध्या आरती, माता की चौकी, जागरण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस लोकप्रिय भजन को प्रसिद्ध भजन गायिका शीला कालसन (Sheela Kalson) ने अपनी मधुर आवाज में गाया है।

इस भजन में माता शबरी (भीलनी के बेर), भक्त सुदामा (सुदामा के चावल) और महात्मा विदुर (विदुर का साग) का सुंदर उल्लेख किया गया है, जो सच्चे प्रेम और भक्ति के प्रतीक हैं।

माता को हमेशा सात्विक, शुद्ध और ताज़ा भोजन का भोग लगाना चाहिए। भोग में तुलसी, फल, मिष्ठान या हलवा-पूरी अर्पित की जा सकती है और भोग लगाने के बाद प्रेमपूर्वक आरती करनी चाहिए।

यह भजन मुख्य रूप से नवरात्र के दिनों में, माता के जागरण, कन्या पूजन और दैनिक संध्या आरती के समय भोग अर्पित करते वक्त बहुत श्रद्धा से गाया जाता है।

'रुच रुच' का अर्थ बड़े चाव, रुचि और आनंद के साथ है। इसका भाव यह है कि माता हमारे द्वारा अर्पित किए गए प्रसाद को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें।

हाँ, इस भजन को आप घर पर अकेले पूजा के समय या परिवार के साथ कीर्तन में पूरी श्रद्धा और एकाग्रता के साथ गा सकते हैं।

यह भजन सिखाता है कि ईश्वर को महंगे पकवानों से अधिक भक्त का निर्मल प्रेम, समर्पण और सच्ची भावना भाती है।

माता रानी की आराधना से साधक के जीवन के सभी संकट दूर होते हैं, मन को शांति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री Bhaktilok.in के उच्च संपादकीय मानकों के तहत सनातन धर्म की पारंपरिक लोक-भक्ति, पुराणों के कथा संदर्भों और प्रामाणिक भक्ति साहित्य का अध्ययन करके तैयार की गई है। इस आलेख का उद्देश्य पाठकों को शुद्ध गीत के बोल, उसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ और गायन की विधि प्रदान करना है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • सनातन लोक कथाएं एवं पारंपरिक भजन संकलन
  • श्रीमद्भागवत पुराण एवं श्रीरामचरितमानस (शबरी और सुदामा प्रसंग)
  • पारंपरिक शक्ति उपासना पद्धतियाँ एवं नैवेद्य अर्पण नियम

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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