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गुरुदेव मेरे दाता हमको ऐसा वर दो(Gurudev Mere Data Lyrics in Hindi) - Bhaktilok

715 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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गुरुदेव मेरे दाता हमको ऐसा वर दो — परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व

श्री शिरडी के साईं बाबा, सदगुरु देव और परब्रह्म परमेश्वर के चरणों में समर्पित यह पावन भजन "गुरुदेव मेरे दाता हमको ऐसा वर दो (Gurudev Mere Data Lyrics in Hindi)" साधक के हृदय की वह पुकार है जिसमें भौतिक कामनाओं से ऊपर उठकर आत्मिक उत्थान, परोपकार, सहनशीलता, क्षमा और अनन्य भक्ति की कामना की जाती है। सनातन संस्कृति और अद्वैत वेदांत की परंपरा में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश और साक्षात् परब्रह्म माना गया है। जब कोई साधक अपने सतगुरु के दरबार में झुकता है, तो वह धन-दौलत या संसारिक सुख-सुविधाओं की मांग नहीं करता, बल्कि वह ऐसे गुणों की भीख मांगता है जो उसे पशु प्रवृत्ति से उठाकर देवत्व की ओर अग्रसर कर सकें। इस भजन का मुख्य भाव 'समर्पण', 'सत्संग', 'सुमिरन' और 'समभाव' है। प्रातः काल की वेला में, ध्यान सत्र के आरंभ में, संध्या आरती के पूर्व अथवा गुरु पूर्णिमा और सत्संग समारोहों के दौरान इस भजन का गायन भक्तों के अंतःकरण को पावन कर देता है। यह भजन हमें सिखाता है कि जीवन की वास्तविक संपदा बाहरी वस्तुएं नहीं, बल्कि भीतर का निर्मल प्रेम और सभी जीवों के प्रति करुणा भाव है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

गुरुदेव मेरे दाता हमको ऐसा वर दो
सेवा सत्संग सुमिरण से झोली मेरी भर दो
गुरुदेंव मेरे दाता मुझको ऐसा वर दो।।

नफरत जो करे मुझसे मैं उनसे प्यार कहूँ
कहते है बुरा मुझको उनका सत्कार करूँ
नफरत को मिटा कर मुझमे इक प्यार का रंग भर दो
गुरुदेंव मेरे दाता मुझको ऐसा वर दो।।

मेरे मन मंदिर में गुरुवर इक बार बस जाओ
जिस ओर भी देखूं मैं बस तुम ही नजर आओ
दो दान प्रभु अमृत का जीवन में रस भर दो
गुरुदेंव मेरे दाता मुझको ऐसा वर दो।।

शबरी की तरह सेवा और ध्यान हो मीरा सा
श्रद्धा हो तुलसी सी और बोल कबीरा सा
रहमत नजर से प्रभु जी निहाल मुझे कर दो
गुरुदेंव मेरे दाता मुझको ऐसा वर दो।।

हो समर्पण अर्जुन सा और त्याग हो बुद्ध जैसा
भक्ति हो नरसी सी और प्यार विदुरानी सा
एक अर्ज यही तुमसे गुरुदेव पूरी कर दो
गुरुदेंव मेरे दाता मुझको ऐसा वर दो।।

गुरुदेव मेरे दाता मुझको ऐसा वर दो
सेवा सत्संग सुमिरण से झोली मेरी भर दो
गुरुदेंव मेरे दाता मुझको ऐसा वर दो।।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन अत्यंत ही गहन दार्शनिक और नैतिक शिक्षाओं से ओत-प्रोत है। भजन की प्रत्येक पंक्ति में एक महान भक्त या संत का आचरण और उनकी साधना पद्धति का संदर्भ दिया गया है। पहले अंतरे में साधक गुरु से प्रार्थना करता है कि जो लोग उससे ईर्ष्या या द्वेष रखते हैं, वह उनके प्रति भी प्रेम और सम्मान का भाव रख सके। यह जैन धर्म के 'क्षमावाणी', बौद्ध धर्म के 'मैत्री भाव' और गीता के 'समदर्शित्व' की पराकाष्ठा है। जब कोई व्यक्ति बुरा कहे और बदले में हम उसका सत्कार करें, तभी अहंकार का शमन होता है।

दूसरे चरण में साधक अपने अंतःकरण को 'मन मंदिर' बनाते हुए गुरु की स्थाई प्रतिष्ठा चाहता है। उसकी दृष्टि ऐसी हो कि सृष्टि के कण-कण में केवल गुरु या आराध्य का ही दर्शन हो। यह अद्वैत दर्शन की वह अवस्था है जहाँ दृष्टा और दृश्य का भेद समाप्त हो जाता है।

चौथे और पांचवें अंतरे में भारतीय संस्कृति के महान पात्रों के माध्यम से उच्च कोटि की भक्ति का आदर्श प्रस्तुत किया गया है:

  • शबरी की सेवा: प्रभु राम के आगमन की प्रतीक्षा में प्रतिदिन मार्ग बुहारना और मीठे बेर चुनकर रखना, जो अनन्य निष्काम सेवा का प्रतीक है।
  • मीरा का ध्यान: विष का प्याला हंसते-हंसते पी लेना और हर परिस्थिति में कृष्णमय हो जाना, जो अटूट प्रेम और एकाग्र ध्यान का प्रतीक है।
  • तुलसी की श्रद्धा: मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के चरणों में अगाध विश्वास और रामचरितमानस जैसी पावन रचनाओं का सृजन।
  • कबीर के बोल: निडरता, सत्यवादिता और पाखंड पर करारा प्रहार करते हुए दो टूक सत्य बोलना।
  • अर्जुन का समर्पण: गीता के युद्धक्षेत्र में सर्वस्व श्रीकृष्ण को सौंपकर शरणागत हो जाना।
  • बुद्ध का त्याग: राजपाट, सुख-सुविधा और मोह-माया का त्याग कर करुणा और अहिंसा का मार्ग अपनाना।
  • नरसी मेहता की भक्ति: भगवान श्री कृष्ण को अपने जीवन का हर कार्य सौंपकर मस्त रहना, जिनकी हुंडी स्वयं सांवरिया सेठ ने भरी थी।
  • विदुरानी (विदुर की पत्नी या विदुर का प्रेम): भगवान श्री कृष्ण के स्वागत में केले के छिलके प्रेमवश परोस देना और छिलकों को ही प्रभु द्वारा चाव से खाना, जो अनन्य निष्कपट प्रेम का प्रतीक है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल शब्दों का संकलन नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण साधना पद्धति है। इसे गाने और सुनने से मन में व्याप्त तनाव, क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार स्वतः समाप्त होने लगते हैं। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • नैतिक उत्थान: यह भजन मनुष्य को नैतिक रूप से सुदृढ़ बनाता है और बदला लेने की भावना को माफ करने की प्रवृत्ति में बदलता है।
  • ऐतिहासिक एवं पौराणिक संदर्भ: इसमें हिंदू सनातन परंपरा के महान संतों और भक्तों (शबरी, मीरा, तुलसी, कबीर, अर्जुन, बुद्ध, नरसी और विदुर) का अद्भुत समन्वय किया गया है।
  • गुरु महिमा: इसमें गुरु को भगवान से भी बढ़कर दाता माना गया है जो चेतना के द्वार खोल सकता है।
  • सार्वभौमिक अपील: यह किसी संप्रदाय विशेष तक सीमित न होकर संपूर्ण मानवता के कल्याण की बात करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को अपनी दैनिक साधनाचर्या का हिस्सा बनाया जा सकता है। इसके श्रवण और गायन के लिए निम्नलिखित समय और विधियां अत्यंत उपयुक्त हैं:

  • ब्रह्ममुहूर्त एवं प्रातः कालीन बेला: सुबह उठकर ध्यान या पूजा के समय इसे गाने से पूरे दिन मन शांत और सकारात्मक रहता है।
  • संध्या वंदन एवं आरती: शाम को दिनभर की भागदौड़ के बाद शांति प्राप्त करने के लिए यह भजन मानसिक थकान दूर करता है।
  • गुरु पूर्णिमा एवं सत्संग: गुरु पूर्णिमा, मासिक सत्संग, साईं बाबा के गुरुवार व्रत या किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के दौरान समूह में इसका गान सामूहिक चेतना को जागृत करता है।
  • विधि: शांतचित्त होकर बैठें, धूप-दीप प्रज्वलित करें, गुरु या इष्ट देव के चित्र का स्मरण करें और पूरी तन्मयता के साथ इस भजन को गाएं।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से शिरडी के साईं बाबा, सदगुरु देव दत्तात्रेय, और सभी आत्मज्ञानी संतों को समर्पित है। शिरडी के साईं बाबा को 'दाता' और 'गुरुदेव' के रूप में देखा जाता है जो अपने भक्तों की झोली श्रद्धा और सबूरी (धैर्य) से भर देते हैं। इसके अतिरिक्त, इस भजन में जिन संतों और भक्तों के नाम आए हैं, वे सभी भारतीय आध्यात्मिक इतिहास के शिखर पुरुष और स्त्रियां हैं जिन्होंने प्रेम और भक्ति के मार्ग से मानवता को आलोकित किया है। सदगुरु की कृपा के बिना इनमें से किसी भी गुण को प्राप्त करना असंभव माना गया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

भक्ति संगीत की आधुनिक परंपरा में यह भजन विभिन्न लोकप्रिय गायकों द्वारा अपने मधुर स्वरों में गाया गया है। इसकी सरलता, लयबद्धता और सहज शब्दावली इसे हर उम्र के भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय बनाती है। गीतकार ने बहुत ही सुव्यवस्थित ढंग से वेदांत के कठिन सिद्धांतों को सामान्य बोलचाल की हिंदी और अवधी-ब्रज मिश्रित भावपूर्ण शब्दावली में पिरोया है, ताकि एक साधारण भक्त भी इसे आसानी से समझ सके और गा सके।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा बहुत ही सहज, मधुर और प्रवाहपूर्ण हिंदी है जिसमें ब्रज और अवधी भाषा के शब्दों की मिठास भी घुली हुई है। इसमें उपमा, रूपक और अनुप्रास अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है। उदाहरण के लिए— 'मन मंदिर में गुरुवर बस जाओ', 'अमृत का रस', 'प्यार का रंग भर दो' — ये सभी प्रयोग काव्य की दृष्टि से अत्यंत उच्च कोटि के हैं जो पाठक या श्रोता के हृदय पर सीधा प्रभाव डालते हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन जीने की कला सिखाता है:

  1. संसार में शत्रुता को प्रेम से जीतने का सामर्थ्य विकसित करना।
  2. अपने अहम का विसर्जन कर गुरु को अपने हृदय में स्थान देना।
  3. महान संतों के जीवन चरित्र से प्रेरणा लेकर अपने आचरण को पावन बनाना।
  4. मांगने की प्रवृत्ति को बदलकर अपने भीतर गुणों और संस्कारों की झोली भरने की प्रार्थना करना।
  5. समर्पण और त्याग के बिना वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति असंभव है, यह सत्य स्वीकार करना।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / मुहावरा सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
दाता सबको देने वाला, प्रदाता जो हमारी झोली ज्ञान और प्रेम से भर दे (गुरु/भगवान)
सुमिरण स्मरण, भगवान या गुरु का नाम जपना मन को ईश्वर में निरंतर लगाए रखना
सत्कार आदर, सम्मान, स्वागत बुरा चाहने वाले के प्रति भी आदर भाव रखना
मन मंदिर हृदय रूपी मंदिर अंतःकरण जहाँ परमात्मा का वास होता है
रहमत नजर कृपा दृष्टि, आशीर्वाद गुरु की वह दृष्टि जिससे भक्त का जीवन निहाल हो जाए
समर्पण पूर्ण रूप से सौंप देना अपनी अहंता को गुरु के चरणों में समर्पित करना

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"सेवा सत्संग सुमिरण से झोली मेरी भर दो"
भक्त अपने गुरु से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! मुझे सांसारिक धन-दौलत नहीं चाहिए। मेरी झोली तो सेवा (निःस्वार्थ कर्म), सत्संग (सज्जनों की संगति) और सुमिरण (भगवान के नाम का जाप) से भर दीजिए, क्योंकि यही वास्तविक आध्यात्मिक पूंजी है।

"नफरत जो करे मुझसे मैं उनसे प्यार करूँ / कहते है बुरा मुझको उनका सत्कार करूँ"
यह संत कबीर और महात्मा बुद्ध की करुणा का प्रतीक है। भक्त ईश्वर से शक्ति मांग रहा है कि यदि कोई उससे द्वेष करे, तब भी उसके मन में क्रोध या बदला लेने की भावना न जागे, बल्कि वह प्रेम और सत्कार ही दे सके।

"शबरी की तरह सेवा और ध्यान हो मीरा सा"
भक्त शबरी की निष्काम सेवा और मीराबाई के अनन्य, एकनिष्ठ प्रेम की भीख मांग रहा है ताकि उसकी भक्ति भी उतनी ही पवित्र और सच्ची बन सके।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव के अनुकूल निम्नलिखित पावन गुरु स्तोत्र का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना गया है:

"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥"

इसके साथ ही श्री हनुमान चालीसा का पाठ करने से भी मन में सेवा और समर्पण के भाव जाग्रत होते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विशेषता विवरण
भजन का नाम गुरुदेव मेरे दाता हमको ऐसा वर दो (Gurudev Mere Data)
समर्पित देवता / संत शिरडी के साईं बाबा एवं सदगुरु देव
भाषा सरल हिंदी / ब्रज-अवधी मिश्रित बोलचाल
मुख्य भाव (Bhava) समर्पण, करुणा, क्षमा, भक्ति और विनय
उपयुक्त अवसर गुरु पूर्णिमा, दैनिक प्रार्थना, सत्संग, साईं संध्या
प्रमुख संदेश नफरत के बदले प्रेम और सेवा-सुमिरण की प्राप्ति

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

गुरुदेव मेरे दाता हमको ऐसा वर दो भजन मुख्य रूप से किसे समर्पित है?

यह भजन शिरडी के साईं बाबा, सदगुरु देव और सभी महान गुरुओं को समर्पित है जो अपने भक्तों को ज्ञान, भक्ति और क्षमा का वरदान देते हैं।

इस भजन को गाने से जीवन में क्या लाभ मिलता है?

इस भजन के नियमित गायन या श्रवण से मन का अहंकार, क्रोध और ईर्ष्या समाप्त होती है तथा सहनशीलता, प्रेम और समर्पण की भावना विकसित होती है।

भजन में किन-किन भक्तों और संतों का उल्लेख किया गया है?

इस भजन में माता शबरी, मीराबाई, तुलसीदास जी, संत कबीर, अर्जुन, महात्मा बुद्ध, नरसी मेहता और विदुरानी का उल्लेख किया गया है।

क्या इस भजन को घर पर रोज गाया जा सकता है?

हाँ, इस भजन को प्रातः काल या संध्या वंदन के समय पूजा स्थल पर प्रतिदिन पूरी श्रद्धा के साथ गाया जा सकता है।

'सेवा सत्संग सुमिरण' का क्या अर्थ है?

सेवा का अर्थ निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता, सत्संग का अर्थ विद्वानों और संतों की संगति, और सुमिरण का अर्थ ईश्वर या गुरु के नाम का निरंतर स्मरण करना है।

क्या यह भजन बच्चों को याद कराना चाहिए?

अवश्य! बच्चों को इस भजन के माध्यम से महान संतों के जीवन आदर्शों और उच्च नैतिक मूल्यों की शिक्षा आसानी से दी जा सकती है।

गुरु पूर्णिमा के दिन इस भजन का क्या महत्व है?

गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुरु दरबार में यह भजन गाने से गुरु के प्रति अनन्य श्रद्धा और आभार प्रकट होता है।

इस भजन का केंद्रीय भाव (Core Theme) क्या है?

इस भजन का केंद्रीय भाव सांसारिक वस्तुओं की मांग न करके भगवान से उत्तम गुण, क्षमाशीलता, परोपकार और सच्ची भक्ति मांगना है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख शिरडी साईं बाबा भक्ति परंपरा और सनातन संत साहित्य के विभिन्न ग्रंथों के अध्ययन पर आधारित है। पाठकों की आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करने और उन्हें उच्च कोटि के भक्ति भाव से जोड़ने के लिए इस सामग्री को अत्यंत सावधानी और विधि-विधान के साथ तैयार किया गया है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसका उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक और हृदयस्पर्शी devotional content प्रदान करना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - भक्ति योग एवं कर्म योग प्रसंग
  • श्री साईं सच्चचरित्र एवं साईं भजन परंपरा
  • भारतीय संत साहित्य और कबीर-मीरा पदावली
  • पारंपरिक लोक भजन संग्रह एवं सत्संग पुस्तिकाएं

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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