Krishna Bhajan

देदो मेरी बांसुरी राधा तेरे किस काम की लिरिक्स (Dede dede meri bansuri radha kis kaam ki lyrics in Hindi) - Krishna Bhajan - Bhaktilok

1,221 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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देदो मेरी बांसुरी राधा तेरे किस काम की - परिचय एवं भक्ति भाव

भक्ति और संगीत की पावन धरा पर राधा-कृष्ण का प्रेम केवल दो आत्माओं का मिलन नहीं, बल्कि जीव और ब्रह्म का शाश्वत संवाद है। जब भी ब्रज की गलियों का स्मरण होता है, कान्हा की मुरली की वह जादुई तान कानों में गूंजने लगती है, जिसके बिना ब्रज की कल्पना भी अधूरी है। प्रस्तुत भजन "देदो मेरी बांसुरी राधा तेरे किस काम की" भगवान श्रीकृष्ण और श्री राधा रानी के बीच के उस निर्मल, सख्य और प्रेमपूर्ण नटखट संवाद का अद्भुत जीवंत चित्रण करता है, जहां सांसारिक वस्तुओं का कोई मूल्य नहीं रह जाता, बल्कि केवल प्रेम और समर्पण ही सर्वोपरि होता है। इस भजन का भाव और इसकी लय साधकों को वृंदावन के कुंज-गलियारों और रासलीला के अलौकिक दृश्यों में ले जाती है, जहां गोवंश, गोपियां और स्वयं बांकेबिहारी प्रेम की डोर से बंधे हुए हैं। भक्त जब इस भजन का गान करते हैं, तो उनके हृदय में भगवान के प्रति अनन्य अनुराग और वात्सल्य की भावना जागृत होती है। यह भजन विशेष रूप से उन अवसरों पर गाया जाता है जब भक्त भगवान कृष्ण के बाल-स्वभाव और राधा रानी के साथ उनकी प्रेमाभक्ति का आनंद लेना चाहते हैं।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थाई (Mukhda):

देयी दे देयी दे मेरी बांसुरी .. राधा तेरे किस काम की
ओ देयी दे देयी दे मेरी बांसुरी .. राधा तेरे किस काम की..
राधा तेरे किस काम की.. राधा तेरे किस काम की..
ओ देयी दे देयी दे मेरी बांसुरी .. राधा तेरे किस काम की …

अंतरा 1:

ना सोने की ना चांदी की .. ना सोने की ना चांदी की…
ओ ये तो वृंदावन ये तो वृंदावन की लकड़ी..
राधा तेरे किस काम की…
ओ देयी दे देयी दे मेरी बांसुरी .. राधा तेरे किस काम की …

अंतरा 2:

ना हीरे की ना मोती की .. ना हीरे की ना मोती की ..
ओ ये तो दिलवर की .. ये तो दिलवर की तारागिनी…
राधा तेरे किस काम की…
ओ देयी दे देयी दे मेरी बांसुरी .. राधा तेरे किस काम की …

अंतरा 3:

इस बंसी की गंउआ दीवानी .. इस बंसी की गंउआ दीवानी..
वो चरती ना.. वो तो चरती ना बिन बांसुरी ..
राधा तेरे किस काम की…..
ओ देयी दे देयी दे मेरी बांसुरी .. राधा तेरे किस काम की …

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

प्रस्तुत भजन में भगवान श्रीकृष्ण अपनी बांसुरी को वापस पाने के लिए राधा रानी से बड़े ही अनोखे और प्रेमपूर्ण अंदाज में आग्रह कर रहे हैं। कान्हा कहते हैं कि हे राधे! तुम मेरी यह बांसुरी मुझे वापस दे दो, यह तुम्हारे किस काम की है? सांसारिक दृष्टि से देखा जाए तो राधा रानी के पास रत्नों, आभूषणों और महलों की कोई कमी नहीं है, परंतु कान्हा की यह बांसुरी सोने या चांदी की कीमती धातु से नहीं बनी है।

कान्हा स्पष्ट करते हैं कि यह बांसुरी तो साधारणतया वृंदावन के कुंजों की एक लकड़ी से गढ़ी गई है, जिस पर किसी भौतिक धन का अधिकार नहीं है। यह तो मुरलीधर के हृदय की स्पंदन और उनकी आत्मा का हिस्सा है। भजन की अगली पंक्तियों में श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस बंसी की तान पर वृंदावन की गाएं (गौमाता) पूरी तरह मुग्ध और दीवानी हैं। वे बिना इस बांसुरी की धुन के चारा भी ग्रहण नहीं करती हैं। यह प्रसंग ब्रज की प्रकृति, पशुधन और गोपाल के बीच के अटूट प्रेम को दर्शाता है। आध्यात्मिक रूप से, बांसुरी वह खाली माध्यम है जिसमें अहंकार का एक भी कण नहीं है, और जब प्रभु उसमें अपनी श्वास भरते हैं, तो पूरा ब्रह्मांड मंत्रमुग्ध हो जाता है। यही कारण है कि कान्हा राधा रानी से बार-बार अनुरोध करते हैं कि वह उनकी प्रिय बांसुरी उन्हें लौटा दें।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • दैवीय प्रेम का प्रतीक: यह भजन राधा और कृष्ण के निष्कलंक और परम पवित्र प्रेम को संगीत के माध्यम से प्रकट करता है।
  • प्रकृति और जीव प्रेम: भजन में गौमाता और वृंदावन की वनस्पति का उल्लेख यह बताता है कि सनातन संस्कृति में प्रकृति और जीव-जंतु ईश्वर की भक्ति से जुड़े हैं।
  • निष्कपट भाव: इसमें कान्हा का नटखट रूप और भोलापन झलकता है जो भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
  • ब्रज संस्कृति का सजीव चित्रण: ब्रजभाषा के शब्दों और स्थानीय शैलियों का समावेश इसे लोक-संस्कृति के बहुत निकट लाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस मधुर भजन का गान किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु ब्रह्म मुहूर्त, संध्याकालीन आरती या विशेष उत्सवों जैसे श्री कृष्ण जन्माष्टमी और राधा अष्टमी के पावन पर्व पर इसका श्रवण और गान विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। इसे सत्संग भवन, मंदिरों में कीर्तन के दौरान अथवा घर में पारिवारिक पूजा-पाठ के समय एकतारा, ढोलक और मंजीरे की थाप के साथ गाया जा सकता है। इसे गाते समय मन में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति सख्य भाव और राधा रानी के प्रति आदर का भाव रखना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में ब्रज के प्राणधन भगवान श्रीकृष्ण और स्वरूपा शक्ति श्री राधा रानी हैं। सनातन परंपरा में राधा और कृष्ण को एक ही तत्व के दो रूप माना जाता है - 'राधा कृष्णयुग रूपम्'। ब्रज के संतों, अष्टछाप के कवियों और महाप्रभु चैतन्य महाप्रभु तथा निम्बार्क संप्रदाय के आचार्यों ने इसी मधुरोपासना (मधुर भक्ति भाव) को अपने पदों और भजनों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक ब्रज लोकगीतों और संकीर्तन परंपरा की देन है, जिसे पीढ़ियों से संतों, लोक-गायक कलाकारों और भक्तों द्वारा गाया जाता रहा है। इसकी कोई एक निश्चित लिपिबद्ध मूल प्रति नहीं मिलती, बल्कि यह मौखिक परंपरा (श्रुति परंपरा) के माध्यम से ब्रजमंडल से निकलकर पूरे भारतवर्ष में फैल गई। इसके बोलों की सहजता और सरलता ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है, जो हर उम्र के व्यक्ति के जुबान पर आसानी से चढ़ जाती है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

भजन की भाषा लोक-सुलभ हिंदी और ब्रजभाषा का सुंदर मिश्रण है। इसमें ग्रामीण परिवेश की शब्दावली जैसे 'गंउआ' (गाएं), 'दिलवर' (प्रियतम), और 'तारागिनी' जैसे शब्दों का प्रयोग इसे अत्यंत आत्मीय बनाता है। काव्य शैली की दृष्टि से यह एक प्रश्नोत्तर और संवाद शैली (Dialogue Style) का पद है, जिसमें भगवान और उनकी प्रियतमा के बीच का हल्का-फुल्का प्रेम-कलह दिखाई देता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • अहंकार का त्याग: बांसुरी अंदर से पूरी तरह खाली होती है, जो यह सिखाती है कि जब तक मनुष्य अपने भीतर के अहंकार और इच्छाओं को पूरी तरह खाली नहीं करता, तब तक प्रभु उसमें अपनी धुन नहीं बजा सकते।
  • भगवान से सहज संबंध: ईश्वर के साथ हमारा रिश्ता व्यापारिक नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण का होना चाहिए।
  • समस्त जीवों के प्रति करुणा: गौमाता और प्रकृति के प्रति प्रेम ही सच्ची भगवद भक्ति है।
  • सरलता में सुख: सोने-चांदी के आभूषणों से अधिक महत्वपूर्ण प्रेम और सादगी से भरा जीवन है।
शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ संदर्भ / प्रसंग
बांसुरी मुरली, बंसी कृष्ण का प्रिय वाद्य यंत्र
वृंदावन की लकड़ी वृंदावन के वनों का साधारण बांस बंसी की सहज और पवित्र उत्पत्ति
दिलवर प्रियतम, प्रेमी श्रीकृष्ण के लिए संबोधन
गंउआ गाएं, गोधन वृंदावन की गायें जो बंसी की दीवानी हैं
तारागिनी प्रियतमा / प्राणों का आधार हृदय से जुड़ी हुई वस्तु

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"देयी दे देयी दे मेरी बांसुरी राधा तेरे किस काम की" - इस पंक्ति में कान्हा राधा रानी से अपनी बंसी मांग रहे हैं और हास्य-विनोद में कह रहे हैं कि यह मुरली तुम्हारे श्रृंगार या किसी अन्य कार्य में उपयोगी नहीं है, अतः इसे मुझे लौटा दो।

"ना सोने की ना चांदी की, ये तो वृंदावन की लकड़ी" - कान्हा बताते हैं कि मेरी इस बंसी का मूल्य किसी भौतिक धातु या आभूषण से नहीं आंका जा सकता, यह तो मेरे प्रिय धाम वृंदावन के साधारण वन की लकड़ी से बनी अनमोल वस्तु है।

"इस बंसी की गंउआ दीवानी, वो चरती ना बिन बांसुरी" - भगवान कहते हैं कि ब्रज की भोली गाएं इस बंसी की धुन पर इतनी मुग्ध हैं कि वे इसकी अनुपस्थिति में चारा तक ग्रहण नहीं करतीं। अतः इस बंसी से केवल मेरा नहीं, पूरे ब्रज के प्राण जुड़े हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस सुंदर भजन के साथ स्मरण करने योग्य पावन महामंत्र:

"ॐ श्री कृष्णाय नमः" एवं "राधे कृष्ण राधे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण राधे राधे"

तथा ब्रज की वंदना का प्रसिद्ध श्लोक:

"वृंदावनास्य कंदस्य राधिकायाश्च जीवनम्। वेणुनादप्रिये कृष्णं वन्दे ब्रजसुप्रियाम्॥"

भजन की जानकारी (Quick Information) विवरण
भजन का नाम देदो मेरी बांसुरी राधा तेरे किस काम की (Dede Dede Meri Bansuri)
आराध्य देवी-देवता भगवान श्रीकृष्ण एवं श्री राधा रानी
रचना परंपरा पारंपरिक ब्रज लोक भजन / संकीर्तन
भाषा हिंदी / ब्रजभाषा
प्रमुख थीम राधा-कृष्ण प्रेम, मुरली की महिमा, लीला गान
भक्ति भाव सख्य भाव, वात्सल्य और मधुरोपासना
उपयुक्त अवसर जन्माष्टमी, राधा अष्टमी, दैनिक संकीर्तन, सत्संग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्ल 1: "देदो मेरी बांसुरी राधा तेरे किस काम की" भजन किस भगवान को समर्पित है?

उत्तर: यह भजन ब्रज के प्राणधन भगवान श्रीकृष्ण और श्री राधा रानी के पावन प्रेम को समर्पित है।

प्रश्ल 2: इस भजन में बांसुरी को किस चीज का बना बताया गया है?

उत्तर: भजन में बताया गया है कि यह बांसुरी सोने या चांदी की नहीं, बल्कि वृंदावन की साधारण लकड़ी से बनी है।

प्रश्ल 3: इस भजन को कब और किस अवसर पर गाया जा सकता है?

उत्तर: इसे जन्माष्टमी, राधा अष्टमी, किसी भी सत्संग, धार्मिक उत्सव या दैनिक पूजा के समय आसानी से गाया जा सकता है।

प्रश्ल 4: भजन में गायों के बारे में क्या कहा गया है?

उत्तर: भजन में कहा गया है कि वृंदावन की गाएं इस बंसी की धुन की इतनी दीवानी हैं कि वे इसके बिना चारा भी नहीं चरती हैं।

प्रश्ल 5: क्या यह एक पारंपरिक भजन है?

उत्तर: हां, यह ब्रज की लोक संस्कृति और संकीर्तन परंपरा से जुड़ा एक अत्यंत लोकप्रिय पारंपरिक भजन है।

प्रश्ल 6: इस भजन को गाने से किस प्रकार की भक्ति की प्राप्ति होती है?

उत्तर: इस भजन से साधक के मन में मधुर, सख्य और निश्चल प्रेम भक्ति का भाव जागृत होता है।

प्रश्ल 7: इस भजन का मुख्य आध्यात्मिक संदेश क्या है?

उत्तर: इसका मुख्य संदेश अहंकार का त्याग कर प्रभु के चरणों में पूर्ण समर्पण करना और उनके साथ प्रेम का सहज संबंध स्थापित करना है।

प्रश्ल 8: क्या इस भजन को घर पर बच्चे और परिवार के लोग मिलकर गा सकते हैं?

उत्तर: बिल्कुल, इसकी भाषा अत्यंत सरल और मधुर है, जिसे परिवार के सभी सदस्य मिलकर आसानी से गा सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तलोक (Bhaktilok.in) के संपादकीय दल द्वारा इस पृष्ठ पर दी गई समस्त जानकारी, भजन के बोल, अर्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या पारंपरिक स्रोतों, लोक-साहित्य और ब्रज संकीर्तन पद्धतियों के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत की गई है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, प्रामाणिक और उच्च कोटि की devotional सामग्री पहुँचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • ब्रज की लोकगीत एवं संकीर्तन परंपरा
  • श्रीकृष्ण लीला एवं माधुरी संकीर्तन संग्रह
  • सनातन धर्म के विभिन्न वैष्णव ग्रंथ एवं पद-संग्रह

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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