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एकादशी की आरती (Ekadashi Aarati in Hindi) - Bhaktilok

98 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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एकादशी की आरती (Ekadashi Aarati in Hindi) भगवान विष्णु की प्रिय तिथि एकादशी की देवी स्वरूपा माता एकादशी को समर्पित एक अत्यंत पावन एवं भक्तिभाव से परिपूर्ण स्तुति है। यह आरती उस दिव्य शक्ति का गुणगान करती है जो व्रत, उपवास, जागरण एवं विष्णु-स्मरण के माध्यम से भक्तों को मोक्ष एवं मुक्ति प्रदान करती है। हिंदू धर्म शास्त्रों में एकादशी तिथि को 'हरि वासर' अर्थात भगवान विष्णु का दिन कहा गया है। प्रत्येक मास के शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष की एकादशी का अपना विशिष्ट नाम, महात्म्य एवं फल है, जिनका वर्णन इस आरती में अत्यंत सुंदर ढंग से किया गया है। यह आरती भक्तों को एकादशी व्रत के प्रति जागरूक करती है तथा भगवान विष्णु एवं माता एकादशी की कृपा प्राप्त करने का सरल साधन प्रस्तुत करती है। भक्तजन प्रातःकाल स्नान के पश्चात अथवा संध्या आरती के समय इस आरती का पाठ करते हैं, जिससे घर में सुख, शांति, समृद्धि एवं आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। इस आरती के नियमित गायन से मन की चंचलता दूर होती है और भक्त का हृदय भगवान विष्णु के प्रेम रस में सराबोर हो जाता है।

सम्पूर्ण आरती पाठ | Complete Ekadashi Aarti Lyrics

ॐ जय एकादशी माता, ॐ जय एकादशी माता ।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ ।।

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी ।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।। ॐ ।।

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी ।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई ।। ॐ ।।

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है,
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।।

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै ।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।।

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।।

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।।

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी ।। ॐ ।।

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी ।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। ॐ ।।

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए ।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए ।। ॐ ।।

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला ।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला ।। ॐ ।।

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप सब पाप हरनी ।
रमा कार्तिक कृष्णपक्ष में, शुक्ला देव उत्तानी ।। ॐ ।।

एकादशी माता की आरती, जो कोई नर गावै ।
कहत भक्त जन, सब पाप मिटै, परम धाम को पावै ।। ॐ ।।

आरती का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Meaning & Bhavarth

इस आरती का प्रारंभ "ॐ जय एकादशी माता" से होता है, जिसमें भक्त माता एकादशी की जय-जयकार करते हैं। यहाँ एकादशी को माता का स्वरूप मानकर उनकी स्तुति की गई है। भावार्थ यह है कि जो भक्त भगवान विष्णु की पूजा एवं एकादशी व्रत को श्रद्धापूर्वक धारण करता है, उसे आत्मिक शक्ति तथा जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त होती है। दूसरे पद में भक्त कहता है कि हे देवी! मैं आपके सभी नामों का गुणगान करता हूँ, आप मुझे भक्ति प्रदान करें। आप गणों एवं गौरव की दाता हैं, तथा शास्त्रों में आपकी महिमा सर्वोच्च बताई गई है।

आगे के पदों में आरती प्रत्येक मास की एकादशी के नाम एवं उनके फल का वर्णन करती है। जैसे मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की 'उत्पन्ना' एकादशी विश्व का उद्धार करने वाली है, तथा शुक्ल पक्ष की 'मोक्षदा' मोक्ष प्रदान करने वाली है। इसी प्रकार पौष की 'सफला' एवं 'पुत्रदा', माघ की 'षटतिला' एवं 'जया', फागुन की 'विजया' एवं 'आमलकी', चैत्र की 'पापमोचनी' एवं 'कामदा', वैशाख की 'बरुथिनी' एवं 'मोहिनी', ज्येष्ठ की 'अपरा' एवं 'निर्जला', आषाढ़ की 'योगिनी' एवं 'देवशयनी', श्रावण की 'कामिका' एवं 'पवित्रा', भाद्रपद की 'अजा' एवं 'परिवर्तिनी', आश्विन की 'इन्द्रा' एवं 'पापांकुशा', तथा कार्तिक की 'रमा' एवं 'उत्तानी' एकादशी का वर्णन है। अंतिम पद में आरती का फल बताया गया है कि जो भी भक्त इस आरती को श्रद्धापूर्वक गाता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे परम धाम की प्राप्ति होती है।

आरती का धार्मिक महत्व एवं फल | Significance & Benefits

एकादशी की आरती का धार्मिक महत्व अत्यंत व्यापक है। यह आरती भक्त को यह स्मरण कराती है कि एकादशी केवल उपवास का नाम नहीं है, बल्कि यह भगवान विष्णु के साथ एक आध्यात्मिक संवाद का दिन है। इस आरती के गायन से भक्त के भीतर वैराग्य, संयम एवं भक्ति का भाव जागृत होता है। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी व्रत का पालन करने वाले भक्त को यदि आरती एवं कीर्तन का आश्रय मिल जाए, तो उसका व्रत सफल हो जाता है। इस आरती में सभी 24 एकादशियों के नामों का उल्लेख होने के कारण यह एक प्रकार से समस्त एकादशी व्रतों का सार है।

इस आरती के नियमित पाठ से मानसिक शांति, पारिवारिक सुख-समृद्धि, रोगों से मुक्ति तथा संतान सुख की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से 'पुत्रदा' एवं 'कामदा' एकादशी की आरती का गायन संतान एवं धन की कामना रखने वालों के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। यह आरती भक्तों को यह भी सिखाती है कि सभी एकादशियाँ समान रूप से पवित्र हैं और प्रत्येक का अपना विशिष्ट महत्व है।

आरती करने की सही विधि एवं थाली सज्जा | Aarti Vidhi & Thali Preparation

एकादशी की आरती करने के लिए सर्वप्रथम स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु एवं माता एकादशी की मूर्ति या चित्र के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें। आरती की थाली में कपूर, घी का दीपक, धूप, पुष्प, अक्षत, तुलसी दल एवं प्रसाद रखें। थाली को दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) घुमाते हुए आरती गाएं। आरती के पश्चात भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करें तथा प्रसाद वितरित करें। एकादशी के दिन चावल एवं अन्न का सेवन वर्जित है, अतः प्रसाद में फल, दूध एवं मिश्री का उपयोग करें।

संबंधित मंत्र एवं स्तुति | Associated Mantra

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

विष्णु गायत्री मंत्र: ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।

एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु के इस मूल मंत्र का जप करने से विशेष फल प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

एकादशी की आरती प्रातःकाल पूजा के समय अथवा संध्या आरती के समय गाई जाती है। विशेष रूप से एकादशी व्रत के दिन यह आरती अवश्य करनी चाहिए।

हाँ, एकादशी की आरती घर पर भी श्रद्धापूर्वक गाई जा सकती है। इसके लिए किसी विशेष अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती, केवल शुद्धता एवं भक्ति भाव आवश्यक है।

इस आरती में वर्ष भर की प्रमुख 24 एकादशियों का वर्णन किया गया है, जिनमें उत्पन्ना, मोक्षदा, सफला, पुत्रदा, षटतिला, जया, विजया, आमलकी, पापमोचनी, कामदा, बरुथिनी, मोहिनी, अपरा, निर्जला, योगिनी, देवशयनी, कामिका, पवित्रा, अजा, परिवर्तिनी, इन्द्रा, पापांकुशा, रमा एवं उत्तानी एकादशी सम्मिलित हैं।

इस आरती के पाठ से पापों का नाश होता है, मोक्ष की प्राप्ति होती है, मानसिक शांति मिलती है तथा भगवान विष्णु एवं माता एकादशी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

हाँ, आरती के पश्चात भगवान विष्णु के भजन एवं कीर्तन अवश्य करने चाहिए। इससे वातावरण पवित्र होता है और भक्ति भाव गहरा होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे पारंपरिक हिंदू शास्त्रों, पुराणों एवं प्रचलित भक्ति परंपराओं के आधार पर संकलित किया गया है। एकादशी की आरती का पाठ भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति एवं भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति का सरल साधन है। हमारा प्रयास है कि शुद्ध उच्चारण एवं भक्ति भाव के साथ यह आरती प्रस्तुत की जाए।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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