Patriotic Songs

श्री गायत्री माता आरती (Gayatri Mata Aarti Lyrics in Hindi) - by Rishi Chintan Gayatri Aarti - Bhaktilok

91 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

सनातन धर्म में वेदमाता गायत्री को समस्त ज्ञान, विज्ञान और वेदों की जननी माना गया है। आदि शक्ति मां गायत्री की आराधना से साधक के भीतर सद्बुद्धि, सात्विकता और दिव्य चेतना का उदय होता है। युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य (ऋषि चिंतन) द्वारा रचित "श्री गायत्री माता आरती" (Gayatri Mata Aarti) केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि मानव चेतना के परिष्कार और आत्म-कल्याण की एक पावन प्रार्थना है। इस आरती के नियमित गायन से साधक के जीवन से अज्ञान का अंधकार दूर होता है और ज्ञान का प्रकाश फैलता है। संध्याकाल या प्रातःकाल की पूजा के समय इस आरती का श्रद्धापूर्वक गान करने से मानसिक शांति, एकाग्रता और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। प्रस्तुत लेख में हम मां गायत्री की इस दिव्य आरती के संपूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, कठिन शब्दों के अर्थ, शास्त्रीय महत्व और साधना विधि की सांगोपांग चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण आरती पाठ | Complete Aarti Lyrics

॥ श्री गायत्री माता आरती ॥

जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता।
सत् मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता॥

आदि शक्ति तुम अलख निरंजन जगपालक कर्त्री।
दु:ख शोक भय क्लेश कलश दारिद्र दैन्य हत्री॥
जयति जय गायत्री माता...

ब्रह्म रूपिणी प्रणात पालिन जगत धातृ अम्बे।
भव भयहारी जन-हितकारी सुखदा जगदम्बे॥
जयति जय गायत्री माता...

भय हारिणी भवतारिणी अनघेअज आनन्द राशि।
अविकारी अखहरी अविचलित अमले अविनाशी॥
जयति जय गायत्री माता...

कामधेनु सतचित आनन्द जय गंगा गीता।
सविता की शाश्वती शक्ति तुम सावित्री सीता॥
जयति जय गायत्री माता...

ऋग यजु साम अथर्व प्रणयनी प्रणव महामहिमे।
कुण्डलिनी सहस्त्र सुषुमन शोभा गुण गरिमे॥
जयति जय गायत्री माता...

स्वाहा स्वधा शची ब्रह्माणी राधा रुद्राणी।
जय सतरूपा वाणी विद्या कमला कल्याणी॥
जयति जय गायत्री माता...

जननी हम हैं दीन-हीन दु:ख-दरिद्र के घेरे।
यदपि कुटिल कपटी कपूत तउ बालक हैं तेरे॥
जयति जय गायत्री माता...

स्नेहसनी करुणामय माता चरण शरण दीजै।
विलख रहे हम शिशु सुत तेरे दया दृष्टि कीजै॥
जयति जय गायत्री माता...

काम क्रोध मद लोभ दम्भ दुर्भाव द्वेष हरिये।
शुद्ध बुद्धि निष्पाप हृदय मन को पवित्र करिये॥
जयति जय गायत्री माता...

आरती का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Meaning & Bhavarth

युगऋषि द्वारा रचित इस आरती की प्रत्येक पंक्ति में मां गायत्री के विराट स्वरूप और उनकी असीम अनुकंपा का वर्णन किया गया है। आइए इसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ को समझते हैं:

मंगलाचरण और प्रार्थना

"जयति जय गायत्री माता... सत् मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता॥"
हे माता गायत्री! आपकी सर्वदा जय हो। आप हमें सदैव सत्य और सन्मार्ग (सद्बुद्धि के मार्ग) पर चलने की प्रेरणा दें। यही मार्ग जीवन में वास्तविक सुख, शांति और मोक्ष प्रदान करने वाला है।

आदिशक्ति का स्वरूप

"आदि शक्ति तुम अलख निरंजन जगपालक कर्त्री... दु:ख शोक भय क्लेश कलश दारिद्र दैन्य हत्री॥"
हे माता! आप ही सृष्टि की आदि शक्ति हैं, जो अलख (अदृश्य) और निरंजन (दोषरहित) हैं। आप ही इस जगत का पालन और सृजन करने वाली हैं। आप अपने भक्तों के समस्त दुखों, शोकों, भयों, क्लेशों, दरिद्रता और दीनता का हरण करने वाली हैं।

ब्रह्ममयी और भवतारिणी रूप

"ब्रह्म रूपिणी प्रणात पालिन जगत धातृ अम्बे... भव भयहारी जन-हितकारी सुखदा जगदम्बे॥"
आप साक्षात परब्रह्म का स्वरूप हैं, शरणागतों की रक्षा करने वाली और संपूर्ण जगत को धारण करने वाली माता हैं। आप संसार के जन्म-मरण के भय को दूर करने वाली, जन-जन का कल्याण करने वाली और परम सुख प्रदान करने वाली जगदम्बा हैं।

दिव्य गुणों की खान

"भय हारिणी भवतारिणी अनघेअज आनन्द राशि... अविकारी अखहरी अविचलित अमले अविनाशी॥"
हे मां! आप भय का नाश करने वाली, भवसागर से तारने वाली, निष्पाप, अजन्मी और आनंद की राशि हैं। आप विकारों से रहित, दुखों को हरने वाली, सदैव स्थिर रहने वाली, निर्मल और अविनाशी परम सत्ता हैं।

वेद और कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक

"ऋग यजु साम अथर्व प्रणयनी प्रणव महामहिमे... कुण्डलिनी सहस्त्र सुषुमन शोभा गुण गरिमे॥"
आप चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) की जननी हैं और प्रणव (ॐ) की महान महिमा से युक्त हैं। योग साधना में आप ही मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक प्रवाहित होने वाली कुंडलिनी और सुषुम्ना नाड़ी की दिव्य शोभा और गरिमा हैं।

शरणगति और आत्म-समर्पण

"काम क्रोध मद लोभ दम्भ दुर्भाव द्वेष हरिये... शुद्ध बुद्धि निष्पाप हृदय मन को पवित्र करिये॥"
हे करुणामयी मां! हमारे भीतर व्याप्त काम, क्रोध, अहंकार, लोभ, पाखंड, दुर्भावना और द्वेष जैसी बुराइयों को नष्ट कर दीजिए। हमें शुद्ध बुद्धि प्रदान कीजिए, हमारे हृदय को निष्पाप बनाइए और हमारे मन को पूर्णतः पवित्र कर दीजिए।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Words

कठिन शब्द सरल अर्थ आरती के संदर्भ में महत्व
सत् मारग सत्य और धर्म का मार्ग मां गायत्री से सन्मार्ग पर चलने की प्रार्थना की गई है।
अलख निरंजन जो दिखाई न दे और विकारों से रहित हो ईश्वर के निराकार और शुद्ध स्वरूप का संकेत।
प्रणात पालिन शरण में आए हुए की रक्षा करने वाली भक्तों के प्रति मां की दयालुता को दर्शाता है।
अनघेअज पापरहित और अजन्मी मां गायत्री की शाश्वत और पवित्र प्रकृति।
प्रणव ओंकार (ॐ) ध्वनि मां गायत्री को ओंकार स्वरूप माना गया है।
सुषुमन सुषुम्ना नाड़ी योग मार्ग में रीढ़ की हड्डी के मध्य स्थित आध्यात्मिक ऊर्जा मार्ग।
दम्भ पाखंड या घमंड साधक अपने भीतर के अहंकार को दूर करने की प्रार्थना करता है।

आरती में वर्णित देवता की महिमा | Glory of the Deity

मां गायत्री को हिंदू धर्म में पंचमुखी देवी के रूप में दर्शाया जाता है, जो पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) और पांच प्राणों की अधिष्ठात्री हैं। वेदों की उत्पत्ति मां गायत्री से ही हुई है, इसलिए इन्हें 'वेदमाता' कहा जाता है। इस आरती में मां गायत्री को केवल एक देवी के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि की परम ऊर्जा, ज्ञान की देवी सरस्वती, ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी और शक्ति की देवी पार्वती के एकीकृत स्वरूप में स्वीकार किया गया है।

आरती की पंक्तियों में उन्हें "सावित्री" और "सीता" के रूप में भी संबोधित किया गया है, जो उनके पातिव्रत्य, तेज और मर्यादा का प्रतीक है। मां गायत्री की साधना से साधक के मस्तिष्क में स्थित सूक्ष्म ग्रंथियां जाग्रत होती हैं, जिससे बुद्धि कुशाग्र होती है और अंतःकरण शुद्ध होता है।

आरती का धार्मिक महत्व एवं फल | Religious Significance & Traditional Benefits

मां गायत्री की आरती का नियमित पाठ करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • बुद्धि का विकास: मां गायत्री बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी आरती के गान से मानसिक मंदता दूर होती है और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
  • नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर में नियमित रूप से आरती करने से नकारात्मक शक्तियों और वास्तु दोषों का निवारण होता है।
  • आंतरिक शांति: आरती के शब्द साधक के मन को शांत करते हैं और तनाव व अवसाद से मुक्ति दिलाते हैं।
  • पापों का क्षय: अनजाने में हुए पापों और मानसिक विकारों का शमन होता है।

यदि आप मां गायत्री के महामंत्र का जप भी करते हैं, तो गायत्री मंत्र का अर्थ समझकर किया गया जप और आरती साधक को शीघ्र ही आध्यात्मिक सिद्धियां प्रदान करती है।

आरती करने की सही विधि एवं थाली सज्जा | Aarti Vidhi & Thali Preparation

आरती की पूर्ण फलश्रुति के लिए इसे सही विधि और पवित्रता के साथ किया जाना चाहिए:

थाली की सज्जा (Aarti Thali Decoration):

  1. एक पीतल या तांबे की साफ थाली लें।
  2. थाली के केंद्र में कुमकुम से स्वास्तिक का चिह्न बनाएं।
  3. थाली में अक्षत (साबुत चावल), पुष्प, चंदन और रोली रखें।
  4. शुद्ध गाय के घी का दीपक या कपूर रखें।
  5. नैवेद्य के रूप में मिश्री, मखाने या ऋतुफल रखें।

आरती की चरणबद्ध विधि:

  • सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें।
  • मां गायत्री के चित्र या विग्रह के समक्ष पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • घी का दीपक प्रज्वलित करें और तीन बार आचमन करें।
  • आरती शुरू करने से पहले शंखनाद या घंटी बजाएं।
  • पूरी श्रद्धा और लयबद्ध स्वर में आरती का गान करें।

आरती करने का सही समय, दिशा एवं दीप घुमाने की विधि

शास्त्रों के अनुसार, आरती करने के कुछ विशेष नियम निर्धारित किए गए हैं:

विषय सर्वोत्तम नियम व विधि
सर्वोत्तम समय प्रातःकाल (सूर्योदय के समय) और संध्याकाल (सूर्यास्त के समय)।
सही दिशा साधक का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
दीप घुमाने की विधि दीपक को मां के चरणों में चार बार, नाभि के पास दो बार, मुखमंडल के पास एक बार और पूरे शरीर के समक्ष सात बार गोलाकार (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाना चाहिए।

आरती के दौरान घंटी, शंख एवं दीप का महत्व

आरती के समय बजाई जाने वाली घंटी और शंख केवल परंपरा का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य है:

  • घंटी की ध्वनि: घंटी की आवाज से उत्पन्न होने वाले कंपन से वातावरण में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया नष्ट होते हैं और मस्तिष्क के दोनों हिस्से संतुलित होते हैं।
  • शंखनाद: शंख की ध्वनि से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और हृदय रोग व श्वास संबंधी समस्याओं में लाभ मिलता है।
  • दीपक का प्रकाश: घी का दीपक ज्ञान का प्रतीक है, जो हमारे भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार को समाप्त करता है।

घर में आरती कैसे करें एवं सावधानियां | Home Aarti & Rules

घर के मंदिर में आरती करते समय कुछ विशेष सावधानियां रखनी चाहिए:

  1. स्वच्छता: आरती स्थल और स्वयं की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। अपवित्र अवस्था में आरती न करें।
  2. एकाग्रता: आरती के समय मन को इधर-उधर न भटकाएं। मां के दिव्य स्वरूप का ध्यान करें।
  3. सुरक्षा: दीपक या कपूर जलाते समय अग्नि सुरक्षा का ध्यान रखें। बच्चों को सुरक्षित दूरी पर रखें।
  4. आरती के बाद: आरती पूर्ण होने के बाद जल से आचमन करें और सभी उपस्थित लोगों को आरती का प्रसाद व आशीर्वाद दें।

आरती का आध्यात्मिक संदेश एवं दैनिक जीवन सीख

ऋषि चिंतन द्वारा रचित यह आरती हमें दैनिक जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सीख देती है। आरती की अंतिम पंक्तियां हमें सिखाती हैं कि मनुष्य को अपने भीतर के षड्रिपुओं (काम, क्रोध, मद, लोभ, दम्भ, द्वेष) का त्याग करना चाहिए। जब तक हमारा हृदय निष्पाप और मन पवित्र नहीं होगा, तब तक हम वास्तविक सुख का अनुभव नहीं कर सकते। यह आरती हमें "सद्बुद्धि" की प्रार्थना करना सिखाती है, जो आज के भौतिकवादी युग में सबसे अमूल्य संपदा है।

एक नजर में आरती की जानकारी | Quick Information Table

विवरण महत्वपूर्ण जानकारी
आरती का नाम श्री गायत्री माता आरती (जयति जय गायत्री माता)
आराध्य देवी वेदमाता मां गायत्री (आदिशक्ति)
रचयिता / कवि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य (युगऋषि / ऋषि चिंतन)
मुख्य विषय सद्बुद्धि की प्रार्थना, आंतरिक विकारों का शमन
गायन का समय प्रातःकाल और संध्याकाल की आरती
संबंधित मंत्र महामंत्र गायत्री मंत्र

मुख्य आध्यात्मिक सीख | Key Takeaways

  • मां गायत्री समस्त ज्ञान और वेदों का मूल स्रोत हैं।
  • सद्बुद्धि ही जीवन का सबसे बड़ा उपहार है, जो सन्मार्ग पर ले जाता है।
  • आरती के माध्यम से हम अपने आंतरिक विकारों जैसे क्रोध, लोभ और अहंकार को दूर करने का संकल्प लेते हैं।
  • यह आरती हमें समर्पण और शरणागति का भाव सिखाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह प्रसिद्ध आरती "जयति जय गायत्री माता" युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य (शांतिकुंज, हरिद्वार के संस्थापक) द्वारा रचित है, जिन्हें ऋषि चिंतन के रूप में भी जाना जाता है।

मां गायत्री की आरती करने का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल सूर्योदय के समय (ब्राह्म मुहूर्त के बाद) और संध्याकाल सूर्यास्त के समय (संध्या बेला) माना जाता है।

हां, पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के अनुसार, मां गायत्री सभी की माता हैं। महिलाएं और पुरुष दोनों ही पूर्ण पवित्रता के साथ गायत्री मंत्र का जप और आरती कर सकते हैं।

इससे बुद्धि कुशाग्र होती है, मानसिक तनाव दूर होता है, घर में सुख-समृद्धि आती है और साधक के भीतर सकारात्मक विचारों का प्रवाह होता है।

मां गायत्री की आरती के लिए गाय के शुद्ध घी का दीपक सर्वोत्तम माना जाता है। यदि घी उपलब्ध न हो, तो तिल के तेल का दीपक भी जलाया जा सकता है।

मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने मां गायत्री के २४ अक्षरों से ही चारों वेदों की रचना की थी, इसलिए इन्हें वेदमाता या वेदों की जननी कहा जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस आरती के पाठ और व्याख्या को शांतिकुंज हरिद्वार के प्रामाणिक साहित्य और सनातन धर्म के पूज्य ग्रंथों के आधार पर संकलित व विश्लेषित किया गया है ताकि पाठकों को शुद्ध और त्रुटिहीन जानकारी प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • गायत्री महाविज्ञान - पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  • ऋग्वेद एवं यजुर्वेद संहिता
  • शांतिकुंज हरिद्वार प्रकाशन

संबंधित भजन एवं लेख

मां गायत्री और अन्य देवियों की आराधना के लिए आप हमारे निम्नलिखित पावन लेख भी पढ़ सकते हैं:

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!