Durga Bhajan Lyrics

करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां लिरिक्स (Kare Bhagat Ho Aarti Mayi Doyi Biriya Aarti Lyrics in Hindi) - Durga Bhajan by Rakesh Tiwari - Bhaktilok

228 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां" आदिशक्ति मां दुर्गा की आराधना में गाया जाने वाला एक अत्यंत मधुर, पारंपरिक और भावपूर्ण भजन है। इस भजन को सुप्रसिद्ध गायक राकेश तिवारी जी ने अपनी दिव्य आवाज में गाकर जन-जन तक पहुंचाया है। इस भजन में भक्त अपनी आराध्या देवी मां दुर्गा के प्रति अनन्य श्रद्धा, समर्पण और प्रेम भाव को प्रकट करते हैं। 'दोई बिरियां' का अर्थ है 'दोनों समय' यानी सुबह और शाम। हिंदू सनातन धर्म में त्रिकाल संध्या या कम से कम दो समय (प्रातःकाल और सायंकाल) की आरती का विशेष महत्व है। यह भजन उसी पावन परंपरा को रेखांकित करता है, जहां भक्त सोने के लोटे में गंगाजल, नंदनवन के पुष्प, अतर (इत्र), पान-सुपारी, ध्वजा, नारियल, धूप-कपूर और लाल रंग के दिव्य श्रृंगार के साथ मां की आरती उतारते हैं। इस भजन का गायन विशेष रूप से नवरात्रि, संध्याकालीन पूजा, और पारिवारिक सत्संगों में किया जाता है, जो वातावरण को पूरी तरह से देवीमय और सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां

करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां।
सोने के लोटा गंगा जल पानी माई दोई बिरियां,
अतर चढें दो दो सिसियां माई दोई बिरियां।
करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां॥

लाए नंदन वन से फुलवा माई दोई बिरियां,
हार बनाये चुन चुन कलियां माई दोई बिरियां।
करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां॥

पान सुपारी माई ध्वजा नारियल दोई बिरियां,
धूप कपूर चढ़े चुड़ियाँ माई दोई बिरियां।
करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां॥

लाल वरण सिंगार करे माई दोई बिरियां,
मेवा खीर सजी थरियां माई दोई बिरियां।
करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां॥

पांच भगत मिल जस तोरे गावे माई दोई बिरियां,
काटो बिपत की भई जरियां माई दोई बिरियां।
करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का मुख्य भाव मां भगवती की नित्य सेवा और उनकी दिव्य आरती के प्रति समर्पण है। भक्त अपनी आराध्या मां दुर्गा से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे माता! आपके भक्त दोनों समय (सुबह और शाम) आपकी पावन आरती उतारते हैं। आरती की इस पावन बेला में भक्त मां को अत्यंत प्रिय और पवित्र वस्तुएं अर्पित करते हैं।

प्रथम अंतरे में भक्त सोने के कलश में पवित्र गंगाजल लेकर आते हैं ताकि मां के चरणों को पखारा जा सके और उन्हें आचमन कराया जा सके। इसके साथ ही मां को सुगंधित अतर (इत्र) की शीशियां अर्पित की जाती हैं, जिससे पूरा गर्भगृह और भक्त का हृदय सुगंधित हो उठता है।

द्वितीय अंतरे में भक्त देवराज इंद्र के नंदनवन से दिव्य और अलौकिक पुष्प लेकर आते हैं। इन पुष्पों की सुंदर कलियों को चुन-चुनकर मां के लिए एक सुंदर हार पिरोया जाता है। यह हार केवल फूलों का नहीं, बल्कि भक्त की श्रद्धा और प्रेम की भावनाओं का प्रतीक है।

तृतीय और चतुर्थ अंतरे में मां की पूजा सामग्री और उनके दिव्य श्रृंगार का वर्णन है। भक्त मां को पान, सुपारी, ध्वजा (लाल झंडा), नारियल, धूप, कपूर और सुहाग की प्रतीक लाल चूड़ियां अर्पित करते हैं। मां का लाल रंग के वस्त्रों और आभूषणों से दिव्य श्रृंगार किया जाता है और उन्हें चांदी या सोने की थाली (थरियां) में सजाकर मेवा और खीर का उत्तम भोग लगाया जाता है।

अंतिम अंतरे में सामूहिक भक्ति का सुंदर चित्रण है। पांच भक्त (यानी पंचजन या संपूर्ण समाज) मिलकर मां का यशगान (जस) गाते हैं और मां से प्रार्थना करते हैं कि हे जगत जननी! हमारे जीवन की समस्त विपत्तियों और कष्टों की जड़ों को काट दीजिए, हमें अपने चरणों की अनन्य भक्ति प्रदान कीजिए।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह देवी साधना की एक संपूर्ण पद्धति को सरल शब्दों में समेटे हुए है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • द्विकाल संध्या का महत्व: भजन में 'दोई बिरियां' शब्द पर विशेष बल दिया गया है, जो सुबह और शाम दोनों समय मां की नित्य आराधना करने की सनातन परंपरा को दर्शाता है।
  • पंचोपचार पूजा का वर्णन: इसमें जल (गंगाजल), गंध (अतर), पुष्प (नंदनवन के फूल), धूप-दीप (धूप-कपूर) और नैवेद्य (मेवा-खीर) जैसी पंचोपचार पूजन सामग्रियों का सुंदर उल्लेख है।
  • सामूहिक भक्ति (सत्संग): 'पांच भगत मिल जस तोरे गावे' पंक्ति दर्शाती है कि सामूहिक रूप से किया गया कीर्तन और भजन मां को अत्यंत प्रिय है और इससे समाज में समरसता आती है।
  • शरणागति का भाव: भजन के अंत में भक्त अपनी सभी विपत्तियों को मां के चरणों में सौंपकर पूर्ण शरणागति का अनुभव करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का गायन और श्रवण करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। इसे निम्नलिखित अवसरों और विधि से गाया जाना चाहिए:

  • सर्वोत्तम समय: चूंकि भजन में 'दोई बिरियां' (दोनों समय) का उल्लेख है, इसलिए इसे प्रातःकाल की पूजा और विशेष रूप से संध्याकालीन आरती के समय गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • विशेष अवसर: चैत्र और शारदीय नवरात्रि के पावन दिनों में इस भजन का गायन मां दुर्गा को प्रसन्न करने का एक उत्तम माध्यम है। इसके अलावा प्रत्येक मंगलवार और शुक्रवार को भी इसका पाठ किया जा सकता है।
  • गायन की विधि: घर के मंदिर में घी का दीपक और धूप जलाएं। मां दुर्गा को लाल पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद पूरे परिवार के साथ मिलकर करताल (ताली) और घंटी की ध्वनि के साथ इस भजन को गाएं।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन सर्वशक्तिमान आदिशक्ति माता दुर्गा को समर्पित है। मां दुर्गा, जो शक्ति, करुणा, ममता और दुष्टों का संहार करने वाली देवी हैं, अपने भक्तों के सभी कष्टों को हर लेती हैं। इस भजन के माध्यम से मां के ममतामयी और कल्याणकारी रूप की आराधना की जाती है।

इस भजन को आधुनिक समय में अपनी सुरीली और भक्तिमय आवाज से सजाने का श्रेय प्रसिद्ध लोक गायक राकेश तिवारी जी को जाता है। उन्होंने पारंपरिक लोक धुनों को सहेजते हुए इस भजन को इस प्रकार गाया है कि इसे सुनते ही मन में स्वतः ही मां के प्रति श्रद्धा जागृत हो जाती है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन मूल रूप से उत्तर भारत की लोक संस्कृति और पारंपरिक देवी गीतों (जस) से प्रेरित है। ग्रामीण अंचलों में सदियों से मां दुर्गा के 'जस' गाने की समृद्ध परंपरा रही है। इन गीतों की रचना किसी एक कवि द्वारा नहीं, बल्कि लोक मानस द्वारा समय-समय पर की गई है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ती रही। राकेश तिवारी जी ने इस पारंपरिक लोक गीत को परिष्कृत कर संगीत के साथ प्रस्तुत किया, जिससे यह आज के युवाओं और शहरी क्षेत्रों में भी अत्यधिक लोकप्रिय हो गया।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और लोक-बोली (अवधी और भोजपुरी का मिश्रण) से प्रभावित है। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे 'दोई बिरियां' (दोनों समय), 'फुलवा' (फूल), 'थरियां' (थाली), और 'जरियां' (जड़ें) लोक जीवन की मिठास को दर्शाते हैं।

काव्य शैली की दृष्टि से यह एक गेय पद है, जिसमें लयबद्धता और संगीतात्मकता का अद्भुत समन्वय है। प्रत्येक अंतरे के बाद मुख्य पंक्ति 'करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां' का दोहराव भजन के प्रवाह को बनाए रखता है और श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर देता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और व्यावहारिक सीख देता है:

  1. नियमितता और अनुशासन: 'दोई बिरियां' हमें सिखाता है कि ईश्वर की आराधना में निरंतरता और नियमितता होनी चाहिए। जीवन की व्यस्तता के बीच सुबह और शाम कुछ समय ईश्वर के लिए अवश्य निकालना चाहिए।
  2. सर्वश्रेष्ठ अर्पण: सोने का लोटा, नंदनवन के फूल और उत्तम मेवा-खीर इस बात के प्रतीक हैं कि हमें ईश्वर को अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार सर्वश्रेष्ठ वस्तुएं अर्पित करनी चाहिए।
  3. सामूहिकता का महत्व: अकेले साधना करने की तुलना में जब पूरा परिवार या समाज मिलकर ईश्वर का गुणगान करता है, तो वहां सकारात्मक ऊर्जा का संचार तेजी से होता है।
  4. संकटों से मुक्ति का मार्ग: जब हम अपनी विपत्तियों को मां के चरणों में समर्पित कर देते हैं, तो हमारा मानसिक तनाव दूर होता है और हमें संकटों से लड़ने की आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ भजन के संदर्भ में महत्व
दोई बिरियां दोनों समय (सुबह और शाम) नित्य सुबह-शाम की जाने वाली आरती और उपासना।
अतर इत्र या सुगंधित तेल मां के गर्भगृह को सुगंधित करने के लिए अर्पित सुगंध।
नंदन वन इंद्र का दिव्य उपवन (बगीचा) अलौकिक और अत्यंत सुंदर पुष्पों का स्रोत।
वरण रंग / वर्ण मां दुर्गा का लाल रंग का दिव्य और तेजस्वी श्रृंगार।
थरियां थाली भोग लगाने के लिए सजाई गई सुंदर थाली।
जस यश / कीर्तन / महिमा गान मां दुर्गा के दिव्य चरित्र और महिमा का गान करना।
जरियां जड़ें (कष्टों की जड़) जीवन के दुखों और संकटों को समूल नष्ट करने की प्रार्थना।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां। सोने के लोटा गंगा जल पानी माई दोई बिरियां, अतर चढें दो दो सिसियां माई दोई बिरियां॥
भावार्थ: भक्त सुबह और शाम दोनों समय मां की आरती उतारते हैं। वे सोने के कलश में पवित्र गंगाजल लेकर आते हैं और मां को सुगंधित इत्र की शीशियां चढ़ाते हैं ताकि मां प्रसन्न हों।

पंक्ति: लाए नंदन वन से फुलवा माई दोई बिरियां, हार बनाये चुन चुन कलियां माई दोई बिरियां॥
भावार्थ: भक्त देवराज इंद्र के नंदनवन से सुंदर फूल लेकर आते हैं और उनकी कोमल कलियों को चुन-चुनकर मां के लिए एक अत्यंत सुंदर और सुगंधित हार तैयार करते हैं।

पंक्ति: पान सुपारी माई ध्वजा नारियल दोई बिरियां, धूप कपूर चढ़े चुड़ियाँ माई दोई बिरियां॥
भावार्थ: मां की पूजा के लिए पान, सुपारी, लाल ध्वजा और नारियल अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही धूप-कपूर जलाकर आरती की जाती है और मां को सुहाग की प्रतीक लाल चूड़ियां चढ़ाई जाती हैं।

पंक्ति: लाल वरण सिंगार करे माई दोई बिरियां, मेवा खीर सजी थरियां माई दोई बिरियां॥
भावार्थ: मां का लाल रंग के वस्त्रों और आभूषणों से भव्य श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद सजी हुई थाली में स्वादिष्ट मेवा और खीर का उत्तम भोग मां को लगाया जाता है।

पंक्ति: पांच भगत मिल जस तोरे गावे माई दोई बिरियां, काटो बिपत की भई जरियां माई दोई बिरियां॥
भावार्थ: सभी भक्त मिलकर मां का सामूहिक कीर्तन (जस) गाते हैं और मां से विनती करते हैं कि वे उनके जीवन के सभी कष्टों और विपत्तियों को जड़ से समाप्त कर दें।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन से पूर्व या पश्चात मां दुर्गा के इस सिद्ध मंत्र का जाप करने से पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है:

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे नारायणी! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हैं। आप कल्याणकारिणी, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली और गौरी हैं। आपको हमारा बारंबार नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां
मुख्य देवी/देवता मां दुर्गा (आदिशक्ति)
प्रसिद्ध गायक राकेश तिवारी (Rakesh Tiwari)
भाषा हिंदी (लोक-बोली / अवधी-भोजपुरी मिश्रित)
भजन का प्रकार दुर्गा भजन / जस / आरती गीत
मुख्य भाव भक्ति, समर्पण, शरणागति और उत्सव
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, संध्या आरती, मंगलवार, शुक्रवार, पारिवारिक सत्संग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन को अपनी मधुर आवाज में प्रसिद्ध लोक गायक राकेश तिवारी जी ने गाया है। उनके द्वारा गाए गए इस भजन को भक्तों द्वारा बहुत पसंद किया जाता है।

'दोई बिरियां' का अर्थ है 'दोनों समय' यानी सुबह और शाम। यह भजन भक्तों को नित्य दोनों समय मां दुर्गा की आरती और आराधना करने के लिए प्रेरित करता है।

वैसे तो इसे रोज शाम की आरती में गाया जा सकता है, लेकिन नवरात्रि के नौ दिनों, मंगलवार, शुक्रवार और किसी भी पारिवारिक धार्मिक अनुष्ठान के समय इसका गायन अत्यंत शुभ और फलदायी होता है।

भजन में सोने के लोटे में गंगाजल, अतर (इत्र), नंदनवन के फूलों का हार, पान, सुपारी, ध्वजा, नारियल, धूप, कपूर, लाल चूड़ियां, लाल श्रृंगार और मेवा-खीर का भोग अर्पित करने का उल्लेख है।

यह पंक्ति सामूहिक प्रार्थना और सत्संग के महत्व को दर्शाती है। जब समाज या परिवार के लोग मिलकर मां का कीर्तन (जस) करते हैं, तो वहां एकता, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

हां, नवरात्रि के दौरान इस भजन का गायन बहुत लोकप्रिय है। मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा के समय संध्या काल में इस भजन को गाने से घर का वातावरण अत्यंत पवित्र हो जाता है।

यह भजन सरल लोक-भाषा में है, जिसमें अवधी और भोजपुरी बोलियों का सुंदर पुट देखने को मिलता है। यही कारण है कि यह आम लोगों के हृदय के बहुत करीब है।

इस भजन के श्रवण और गायन से मन को असीम शांति मिलती है, मानसिक तनाव दूर होता है, और मां दुर्गा की कृपा से जीवन के सभी कष्टों और बाधाओं का नाश होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "करें भगत हो आरती माई दोई बिरियां" भजन के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक पहलुओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस भजन के माध्यम से सनातन धर्म की नित्य पूजा और आरती की समृद्ध परंपरा को बहुत ही सरल और सुंदर तरीके से समझाया गया है। यह सामग्री पूरी तरह से शोध पर आधारित और "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" है, जो पाठकों को सही और प्रामाणिक जानकारी प्रदान करती है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - मां दुर्गा की आराधना और महात्म्य।
  • पारंपरिक लोक संगीत संग्रह और उत्तर भारतीय देवी जस परंपरा।
  • राकेश तिवारी जी द्वारा गाए गए आधिकारिक भजन के बोल।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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