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Papmochani Ekadashi Vrat Katha

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha in Hindi) - Ekadashi Vrat katha Ekadashi ki Kahani - Bhaktilok

99 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind | 2 मिनट पठन समय
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पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha in Hindi) - Ekadashi Vrat katha Ekadashi ki Kahani - 

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha in Hindi) - Ekadashi Vrat katha Ekadashi ki Kahani - Bhaktilok

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha in Hindi) - 

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1. पापमोचनी एकादशी का महत्त्व:-

अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा: हे मधुसूदन! आपने फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी अर्थात आमलकी एकादशी के बारे मे विस्तार पूर्वक बतलाया। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष मे आने वाली एकादशी का क्या नाम है? तथा उसकी विधि क्या है? कृपा करके आप मेरी बढ़ती हुई जिज्ञासा को शांत करें।


2. भगवान श्रीकृष्ण:-

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: हे अर्जुन! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। एक बार की बात है, पृथ्वीपति राजा मान्धाता ने लोमश ऋषि से यही प्रश्न किया था, जो तुमने मुझसे किया है। अतः जो कुछ भी ऋषि लोमश ने राजा मान्धाता को बतलाया, वही मैं तुमसे कह रहा हूँ।


3. राजा मान्धाता:-

राजा मान्धाता ने धर्म के गुह्यतम रहस्यों के ज्ञाता महर्षि लोमश से पूछा: हे ऋषिश्रेष्ठ! मनुष्य के पापों का मोचन किस प्रकार सम्भव है? कृपा कर कोई ऐसा सरल उपाय बतायें, जिससे सभी को सहज ही पापों से छुटकारा मिल जाए।


4. पापमोचनी एकादशी व्रत कथा!

महर्षि लोमश ने कहा: हे नृपति! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम पापमोचिनी एकादशी है। उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो।


5. प्राचीन समय की बात:-

प्राचीन समय में चैत्ररथ नामक एक वन था। उसमें अप्सराएँ किन्नरों के साथ विहार किया करती थीं। वहाँ सदैव वसन्त का मौसम रहता था, अर्थात उस जगह सदा नाना प्रकार के पुष्प खिले रहते थे। कभी गन्धर्व कन्‍याएँ विहार किया करती थीं, कभी देवेन्द्र अन्य देवताओं के साथ क्रीड़ा किया करते थे।


6. मेधावी नाम के एक ऋषि:-

उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि भी तपस्या में लीन रहते थे। वे शिवभक्त थे। एक दिन मञ्जुघोषा नामक एक अप्सरा ने उनको मोहित कर उनकी निकटता का लाभ उठाने की चेष्टा की, इसलिए वह कुछ दूरी पर बैठ वीणा बजाकर मधुर स्वर में गाने लगी।


 7. शिव भक्त महर्षि:-

उसी समय शिव भक्त महर्षि मेधावी को कामदेव भी जीतने का प्रयास करने लगे। कामदेव ने उस सुन्दर अप्सरा के भ्रू का धनुष बनाया। कटाक्ष को उसकी प्रत्यन्चा बनाई और उसके नेत्रों को मञ्जुघोषा अप्सरा का सेनापति बनाया। इस तरह कामदेव अपने शत्रुभक्त को जीतने को तैयार हुआ।


8. मेधावी महर्षि के बारे में:-

उस समय महर्षि मेधावी भी युवावस्था में थे और काफी हृष्ट-पुष्ट थे। उन्होंने यज्ञोपवीत तथा दण्ड धारण कर रखा था। वे दूसरे कामदेव के समान प्रतीत हो रहे थे। उस मुनि को देखकर कामदेव के वश में हुई मञ्जुघोषा ने धीरे-धीरे मधुर वाणी से वीणा पर गायन शुरू किया तो महर्षि मेधावी भी मञ्जुघोषा के मधुर गाने पर तथा उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गए। वह अप्सरा मेधावी मुनि को कामदेव से पीड़ित जानकर उनसे आलिङ्गन करने लगीमहर्षि मेधावी उसके सौन्दर्य पर मोहित होकर शिव रहस्य को भूल गए और काम के वशीभूत होकर उसके साथ रमण करने लगे।


9. तदुपरान्त मञ्जुघोषा:-

काम के वशीभूत होने के कारण मुनि को उस समय दिन-रात का कुछ भी ज्ञान न रहा और काफी समय तक वे रमण करते रहे। तदुपरान्त मञ्जुघोषा उस मुनि से बोली: हे ऋषिवर! अब मुझे बहुत समय हो गया है, अतः स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये।


10. अप्सरा की बात सुनकर ऋषि ने कहा:-

 हे मोहिनी! सन्ध्या को तो आयी हो, प्रातःकाल होने पर चली जाना ऋषि के ऐसे वचनों को सुनकर अप्सरा उनके साथ रमण करने लगी इसी प्रकार दोनों ने साथ-साथ बहुत समय बिताया मञ्जुघोषा ने एक दिन ऋषि से कहा: हे विप्र! अब आप मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये मुनि ने इस बार भी वही कहा: हे रूपसी! अभी ज्यादा समय व्यतीत नहीं हुआ है, कुछ समय और ठहरो।


11. मुनि की बात सुन अप्सरा ने कहा:- 

हे ऋषिवर! आपकी रात तो बहुत लम्बी है। आप स्वयं ही सोचिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया। अब और ज्यादा समय तक ठहरना क्या उचित है ||


12. अप्सरा की बात:-

अप्सरा की बात सुन मुनि को समय का बोध हुआ और वह गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे। जब उन्हें समय का ज्ञान हुआ कि उन्हें रमण करते सत्तावन (57) वर्ष व्यतीत हो चुके हैं तो उस अप्सरा को वह काल का रूप समझने लगे इतना ज्यादा समय भोग-विलास में व्यर्थ चला जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया। अब वह भयंकर क्रोध में जलते हुए उस तप नाश करने वाली अप्सरा की तरफ भृकुटी तानकर देखने लगे। क्रोध से उनके अधर काँपने लगे और इन्द्रियाँ बेकाबू होने लगीं।


13. क्रोध से थरथराते स्वर में मुनि ने उस अप्सरा से कहा:-

मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा! तू महा पापिन और बहुत ही दुराचारिणी है, तुझ पर धिक्कार है। अब तू मेरे श्राप से पिशाचिनी बन जा।


14. मुनि के क्रोधयुक्त श्राप:- 

मुनि के क्रोधयुक्त श्रापसे वह अप्सरा पिशाचिनी बन गई। यह देख वह व्यथित होकर बोली: हे ऋषिवर! अब मुझ पर क्रोध त्यागकर प्रसन्न होइए और कृपा करके बताइये कि इस शाप का निवारण किस प्रकार होगा? विद्वानों ने कहा है, साधुओं की सङ्गत अच्छा फल देने वाली होती है और आपके साथ तो मेरे बहुत वर्ष व्यतीत हुए हैं, अतः अब आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए, अन्यथा लोग कहेंगे कि एक पुण्य आत्मा के साथ रहने पर मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनना पड़ा।


15. मञ्जुघोषा की बात:-

मञ्जुघोषा की बात सुनकर मुनि को अपने क्रोध पर अत्यन्त ग्लानि हुई साथ ही अपनी अपकीर्ति का भय भी हुआ, अतः पिशाचिनी बनी मञ्जुघोषा से मुनि ने कहा: तूने मेरा बड़ा बुरा किया है, किन्तु फिर भी मैं तुझे इस श्राप से मुक्ति का उपाय बतलाता हूँ। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है, उसका नाम पापमोचिनी है। उस एकादशी का उपवास करने से तेरी पिशाचिनी की देह से मुक्ति हो जाएगी ऐसा कहकर मुनि ने उसको व्रत का सब विधान समझा दिया। फिर अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए वे अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गये।


16. च्यवन ऋषि ने अपने पुत्र मेधावी को देखकर कहा:-

हे पुत्र ऐसा क्या किया है तूने कि तेरे सभी तप नष्ट हो गए हैं? जिससे तुम्हारा समस्त तेज मलिन हो गया है मेधावी मुनि ने लज्जा से अपना सिर झुकाकर कहा: पिताश्री! मैंने एक अप्सरा से रमण करके बहुत बड़ा पाप किया है। इसी पाप के कारण सम्भवतः मेरा सारा तेज और मेरे तप नष्ट हो गए हैं। कृपा करके आप इस पाप से छूटने का उपाय बतलाइये।


17. ऋषि ने कहा:- 

हे पुत्र! तुम चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का विधि तथा भक्तिपूर्वक उपवास करो, इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे अपने पिता च्यवन ऋषि के वचनों को सुनकर मेधावी मुनि ने पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। उसके प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए मञ्जुघोषा अप्सरा भी पापमोचिनी एकादशी का उपवास करने से पिशाचिनी की देह से छूट गई और पुनः अपना सुन्दर रूप धारण कर स्वर्गलोक चली गई।


18. लोमश मुनि ने कहा:- 

हे राजन! इस पापमोचिनी एकादशी के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवण व पठन से एक हजार गौदान करने का फल प्राप्त होता है। इस उपवास के करने से ब्रह्म हत्या करने वाले, स्वर्ण चुराने वाले, मद्यपान करने वाले, अगम्या गमन करने वाले आदि भयंकर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और अन्त में स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।




सनातन संस्कृति एवं प्रामाणिक संपादन

यह भजन/आरती लिरिक्स भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा उपलब्ध प्रामाणिक स्रोतों के संदर्भ में समीक्षा एवं संपादन के बाद प्रकाशित किया गया है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 10 Aug 2026

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(function() { let voiceCounter = 0; const answers = { "ध्यान": "ध्यान मन को स्थिर करने और भीतर विद्यमान चैतन्य (आत्मा) से जुड़ने का वैज्ञानिक मार्ग है। दैनिक १०-१५ मिनट का ध्यान तनाव को कम करता है, मस्तिष्क की एकाग्रता बढ़ाता है और आत्मिक शांति प्रदान करता है। साधना खंड में हमारे 'श्लोक उच्चारण' व '४३२Hz ध्यान संगीत' का उपयोग करें।", "पंचांग": "वैदिक पंचांग काल-गणना की अत्यंत सटीक वैज्ञानिक प्रणाली है। यह मुख्य रूप से पांच अंगों: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण पर आधारित होती है। इसके माध्यम से सौर तथा चंद्र गतियों के अनुसार शुभ मुहूर्त और राहु काल की स्थिति की गणना की जाती है।", "चार धाम": "सनातन संस्कृति में चार धाम - उत्तर में श्री बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारकाधीश, पूर्व में जगन्नाथ पुरी और दक्षिण में रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग हैं। इन चारों धामों की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य जी ने देश की भौगोलिक एवं आध्यात्मिक एकता को अक्षउन बना रखने के उद्देश्य से की थी।", "आज का पंचांग": "आज का पंचांग देखने के लिए कृपया हमारे 'आज का वैदिक पंचांग' विजेट को देखें। वर्तमान दिन के अनुसार तिथि तथा राहु काल की सटीक गणना वहां उपलब्ध है।", "गायत्री": "गायत्री महामंत्र (ॐ भूर्भुवः स्वः...) समस्त वेदों का सार माना गया है। यह सविता देव (सूर्य) की उपासना करता है ताकि हमारी बुद्धि सन्मार्ग की ओर प्रेरित हो। इसका नित्य उच्चारण बुद्धि तीव्र करता है।", "केदारनाथ": "केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के पवित्र हिमालय क्षेत्र में मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। यह शिव जी के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसकी स्थापना पांडवों द्वारा की गई मानी जाती है और आदि गुरु शंकराचार्य ने इसका पुनरुद्धार किया था।" }; function matchResponse(query) { query = query.toLowerCase(); if (query.includes("ध्यान") || query.includes("meditation") || query.includes("sadhana")) { return answers["ध्यान"]; } else if (query.includes("पंचांग") || query.includes("panchang")) { return answers["पंचांग"]; } else if (query.includes("धाम") || query.includes("dham")) { return answers["चार धाम"]; } else if (query.includes("गायत्री") || query.includes("gayatri")) { return answers["गायत्री"]; } else if (query.includes("केदारनाथ") || query.includes("kedarnath")) { return answers["केदारनाथ"]; } else { return "वत्स! आपका प्रश्न अत्यंत कल्याणकारी है। सनातन मार्ग ज्ञान, भक्ति और कर्म का मार्ग है। मन को शांत कर सत्यपथ पर चलें। क्या आप किसी विशिष्ट तीर्थ यात्रा अथवा दैनिक साधना के बारे में जानना चाहते हैं?"; } } window.readGuruVoice = function(text, btnId) { window.speechSynthesis.cancel(); const utterance = new SpeechSynthesisUtterance(text); utterance.lang = 'hi-IN'; utterance.rate = 0.85; const btn = document.getElementById(btnId); if (btn) { btn.innerHTML = ' श्रवण जारी है...'; } utterance.onend = () => { if (btn) btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; utterance.onerror = () => { if (btn) btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; window.speechSynthesis.speak(utterance); }; function initChatbot() { const launcher = document.getElementById('chatLauncher'); const drawer = document.getElementById('chatDrawer'); const closeBtn = document.getElementById('chatClose'); const input = document.getElementById('chatInput'); const sendBtn = document.getElementById('chatSendBtn'); const body = document.getElementById('chatBody'); if (!launcher || !drawer || !closeBtn || !input || !sendBtn || !body) { return; } launcher.addEventListener('click', function(e) { e.stopPropagation(); drawer.classList.toggle('open'); }); closeBtn.addEventListener('click', function(e) { e.stopPropagation(); drawer.classList.remove('open'); }); input.addEventListener('keydown', e => { if (e.key === 'Enter') { submitGlobalMessage(); } }); sendBtn.addEventListener('click', submitGlobalMessage); window.sendGlobalSuggestion = function(text) { input.value = text; submitGlobalMessage(); }; function submitGlobalMessage() { const query = input.value.trim(); if (query === "") return; // User Message bubble const userMsg = document.createElement('div'); userMsg.className = 'chat-msg user'; userMsg.textContent = query; body.appendChild(userMsg); input.value = ""; body.scrollTop = body.scrollHeight; // Typing Indicator const typingIndicator = document.createElement('div'); typingIndicator.className = 'chat-msg guru typing-indicator-container'; typingIndicator.innerHTML = `
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