Krishna Bhajan

रडते माझे बाळ तान्हे गौळण लिरिक्स (Radate Majhe Bal Tanhe Gavlan Lyrics in Hindi) - Marathi Krishna Bhajan - Bhaktilok

2,179 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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प्रस्तावना एवं परिचय

सम्पूर्ण मूल पाठ एवं पवित्र श्लोक

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

रडते माझे बाळ तान्हे गौळण समजाविता राहीना नानापरी समजावितेमागील ते खाया देते भाप डोळे निजवितेतरी हा उगा राहीना रडते माझे बाळ तान्हे... नानापरी करितो छंद रडतो हा कुज कुज नेत्रावाटे वाहे बुंद रडता हा राहीना रडते माझे बाळ तान्हे... बोटी धरुनिया दमसर्वा अंगी सुटला घाम एका जनार्दने प्रेम यशोदेसी माई नार रडते माझे बाळ तान्हे... रडते माझे बाळ तान्हे समजाविता राहीना
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह भजन भगवान श्रीकृष्ण की बाल्यावस्था की मधुर और हृदयस्पर्शी लीला का वर्णन करता है। 'रडते माझे बाळ तान्हे' अर्थात् मेरा बालक रोता है और रोता रहता है - यह पंक्ति यशोदा माता के हृदय की पीड़ा को अभिव्यक्त करती है। भजन में श्रीकृष्ण के रोने के कारणों का सुंदर वर्णन है जैसे कि उन्हें समझाया नहीं जा सकता, उनकी मांगें पूरी नहीं होती, और माता की समझाइश व्यर्थ चली जाती है। 'नानापरी करितो छंद, रडतो हा कुज कुज' - विभिन्न प्रकार की चेष्टाएं करते हुए वह रोते हैं। यह भजन बाल-लीला के माध्यम से भगवान के मानवीय रूप को दर्शाता है जहां वे एक साधारण बालक की तरह व्यवहार करते हैं। यह श्रीकृष्ण की अलौकिक शक्ति और लौकिक बाल-स्वभाव के बीच अद्भुत संतुलन प्रदर्शित करता है।

इस भजन का भावार्थ यशोदा माता की वात्सल्य-भक्ति में निहित है। 'बोटी धरुनिया दमसर्वा, अंगी सुटला घाम' - माता यशोदा ने अपनी संतान को समझाने के लिए कितना प्रयास किया, शरीर से पसीना बहाया, किंतु बालक कृष्ण का रोना थमता नहीं। यह दृश्य केवल एक बालक के रोने का नहीं है, बल्कि भगवान और उनकी माता के बीच शाश्वत प्रेम संबंध का चित्रण है। 'एका जनार्दने प्रेम यशोदेसी माई नार' - यह पंक्ति दर्शाती है कि यशोदा का प्रेम केवल एक माता का प्रेम नहीं है, बल्कि पूर्ण ब्रह्मांड के निर्माता और संचालक के साथ उनका अनन्य संबंध है। भक्त के लिए यह शिक्षा है कि विरह और प्रेम की पीड़ा ही भक्ति की सर्वोच्च अनुभूति है।

भक्ति के दृष्टिकोण से यह भजन वात्सल्य-भक्ति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। वात्सल्य-भक्ति में भक्त अपने को पूरी तरह माता के रूप में समर्पित करता है और ईश्वर को बालक के रूप में देखता है। यह मार्ग द्वैताद्वैत (दुआलिटी) और अद्वैत (नॉन-डुआलिटी) को समन्वित करता है - यशोदा अपने को भिन्न जानते हुए भी पूरी तरह कृष्ण में लीन हो जाती है। गोपीकुल की परंपरा में वात्सल्य-भक्ति को सर्वोच्च माना गया है क्योंकि यह शर्तहीन, निःस्वार्थ और पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। इस भजन द्वारा साधक अपनी माता-वृत्ति को जागृत करता है और कृष्ण के साथ शाश्वत प्रेम-संबंध की स्थापना करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

यह भजन श्रीमद्भागवत पुराण की गोपाल-लीलाओं पर आधारित है, विशेषकर नवम स्कंध में वर्णित श्रीकृष्ण की बाल्यावस्था की घटनाओं से प्रेरित है। भागवत पुराण में विस्तार से बताया गया है कि कैसे यशोदा माता बालक कृष्ण को पालते समय अनगिनत चुनौतियों का सामना करती हैं। महाभारत के भीष्म-पर्व और विभिन्न पुराणों में कृष्ण-कथा के माध्यम से यह सिद्ध किया गया है कि भगवान का सर्वोच्च रूप माता-पुत्र के प्रेम संबंध में प्रकट होता है। मथुरा और ब्रज की परंपरा में इन लीलाओं का विशेष महत्व है और गोपीकुल की भक्ति परंपरा का यह मूल आधार है। उत्तर भारतीय भक्ति आंदोलन में विशेषकर गोस्वामी तुलसीदास और सूरदास जैसे संतों ने इन लीलाओं को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का जाप करने से मन में शांति, प्रेम और करुणा की वृद्धि होती है। यह भजन आंतरिक संवेदनशीलता को जागृत करता है और माता-पुत्र के संबंध को गहराई से समझने में मदद करता है। नियमित गायन से मानसिक तनाव में कमी आती है और हृदय की पीड़ा को सहने की क्षमता बढ़ती है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह भजन भक्त को समर्पण और सेवा का मार्ग दिखाता है। बालक-कृष्ण की लीला को ध्यान करने से चेतना का विकास होता है और दिव्य प्रेम की अनुभूति होती है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का गायन प्रातःकाल ब्रह्म-मुहूर्त में सर्वाधिक फलदायक है। पूजा के समय घी का दीप प्रज्वलित करें और गोपाल-मूर्ति या श्रीकृष्ण की प्रतिमा के सामने बैठें। भजन गाते समय पद्मासन या सुखासन में बैठें, मन को शुद्ध और विनम्र रखें। दूध, मक्खन, खीर आदि का भोग लगाएं। संध्या के समय भी इस भजन का गायन कृष्ण-विचार करते हुए किया जा सकता है। सात्विक भाव से, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ यह भजन गाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

यह भजन किस परंपरा से संबंधित है और इसका मराठी संदर्भ क्या है?

यह भजन मराठी भक्ति परंपरा से संबंधित है जो संत तुकाराम, रामदास और ज्ञानेश्वर जैसे महान संतों की विरासत को दर्शाता है। यह गोपाल-लीला पर केंद्रित है और वात्सल्य-भक्ति का सुंदर उदाहरण है। मराठी संस्कृति में यशोदा माता की कथा का विशेष महत्व है और इसे भक्ति का सर्वोच्च रूप माना जाता है।

रडते माझे बाळ तान्हे' में किस प्रकार की आध्यात्मिक शिक्षा निहित है?

इस भजन में आध्यात्मिक शिक्षा यह है कि भगवान सर्वशक्तिमान होते हुए भी माता के प्रेम के सामने असहाय हो जाते हैं। यह दर्शाता है कि प्रेम ही सबसे बड़ी शक्ति है। भक्त को सिखाया जाता है कि निःस्वार्थ प्रेम और सेवा के माध्यम से ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है, न कि बाहरी साधनों से।

क्या यह भजन सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए उपयुक्त है?

हां, यह भजन सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए पूर्णतः उपयुक्त है। बच्चों के लिए यह कृष्ण की लीलाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करता है, वयस्कों के लिए गहन आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है, और बुजुर्गों के लिए भक्ति और करुणा का मार्ग दिखाता है। प्रत्येक को अपने स्तर पर शिक्षा मिलती है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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