आदिशक्ति माता दुर्गा, महालक्ष्मी और महासरस्वती को समर्पित अत्यंत भावुक और लोक-संस्कृति से ओत-प्रोत भजन "हे जगतारन देवी दुर्गा मईया (He Jagtaran Devi Lyrics in Hindi)" भारतीय लोक-भक्ति और विशेषकर छत्तीसगढ़ी व क्षेत्रीय लोक-परंपराओं का एक अनमोल रत्न है। विसर्जन, जवारा उठने के अवसर, और नवरात्रि की विदाई के समय गाए जाने वाले इस भजन में माँ भगवती के प्रति एक पुत्री और भक्त का अनूठा वात्सल्य, विरह और समर्पण झलकता है। जब भक्त माता की विदाई के समय व्याकुल होकर गाते हैं कि "कइसे करबो दाई तोर बिदाई, लागत हावे भारी करलाई", तो पूरा वातावरण भक्तिमय और आंसुओं से सराबोर हो जाता है। यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि मानव आत्मा और जगत जननी के बीच के उस अटूट पारिवारिक रिश्ते की अभिव्यक्ति है जहाँ भक्त माता को अपने परिवार का अभिन्न अंग मानता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण बोल, हिंदी अर्थ, विदाई के भाव, और इसके आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:
मखड़ा (स्थाई):
हे जगतारन देवी दुर्गा मईया।।
हे जगतारन देवी दुर्गा मईया।।
कइसे करबो दाई तोर बिदाई, लागत हावे भारी करलाई।।
जोत जावरा लागे उसलईया... हे जगतारन देवी...
अंतरा 1:
जब जब तोला देखेव मईया, तोरे मुहरन फूले वो मां
नजरे नज़र मा झूले तैहर, आंतस कइसे भूले वो मां
जैसे बेटी पहुना तिजा आथे, जोरे माया ला वोहर चले जाथे
अइसन दया माया के हस जगईया.... हे जगतारन देवी
अंतरा 2:
नव दिन पूजा बरत करेहव, दशमी के तोला पठोहू वो मां
लगे पुरखा के अलग चलागन, सगुरी मां तोला सरोहू वो मां
कईसन कईसन रचना ला बनाए, नेंग जोंग गढ़के रसदा ला बताए।
जान तीही हर दाई जनम देवईया... हे जगतारन देवी
अंतरा 3:
माता बिदाई के आथे बेरा मन ह मोर सुररथे वो मां
काबर आथे ये दिन बादर कहिके जीवरा चुरथे वो मां
छाती फाटे नयना आसू ढारे, तोर बिना अब करिही माया दुलारे
काहा पाबे गौतम अचरा के छईहा.... हे जगतारन देवी।।
समापन:
कइसे करबो दाई तोर बिदाई, लागत हावे भारी करलाई।।
जोत जावरा लागे उसलईया... हे जगतारन देवी।।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति और भाषा की पावन माटी में रचा-बसा है, जो माँ दुर्गा के प्रति अनन्य प्रेम और नवरात्रि के समापन पर होने वाली विदाई के दर्द को व्यक्त करता है।
मखड़ा का भाव: भक्त माता से विनती करता है—हे संपूर्ण जगत का तारण करने वाली माँ दुर्गा! नवरात्रि के उपरांत जब जवारे विसर्जन का समय आता है और माँ की जोत को ठंडी (उसलईया) करने की बेला आती है, तो भक्त का हृदय भर आता है। वह कहता है कि हे दाई (माता), तुम्हारी यह विदाई हम से कैसे होगी? यह विदाई का क्षण हमारे हृदय को भारी पीड़ा (करलाई) दे रहा है।
प्रथम अंतरा का भाव: भक्त माँ के रूप का स्मरण करते हुए कहता है—हे मईया! जब-जब मैंने तुम्हारे अलौकिक दर्शन किए, मेरा मन प्रफुल्लित हो उठा। तुम्हारी मूरत मेरी आँखों में इस तरह बस गई है कि वह पल-पल मेरी नजरों के सामने झूलती रहती है। मैं अपने हृदय (आंतस) से तुम्हारी उस छवि को कैसे भुला सकता हूँ? जिस प्रकार कोई पुत्री अपने मायके तीज त्यौहार पर आती है और अपनों से अथाह स्नेह (माया) पाकर पुनः अपने ससुराल लौट जाती है, हे जगत जननी! तुम भी वैसी ही ममता और असीम दया की मूरत हो जो कुछ दिनों के लिए हमारे पास आती हो।
द्वितीय अंतरा का भाव: भक्त आगे कहता है—हमने नौ दिनों तक बड़े ही विधान से व्रत और पूजा की, और अब दशमी के दिन हम तुम्हें विदा (पठोहू) कर रहे हैं। यह हमारे पूर्वजों (पुरखों) की चली आ रही प्राचीन परंपरा है, जिसके अनुसार हम सगुरी (पवित्र स्थल या विसर्जन स्थल) में ले जाकर तुम्हारी पूजा संपन्न कर रहे हैं। इस संसार की रचना करने वाली और इसके विधि-विधान व रस को बताने वाली हे दाई! तुम ही हम सबकी जन्मदात्री और पालनहार हो।
तृतीय अंतरा का भाव: विदाई का वर्णन करते हुए रचनाकार (गौतम) कहते हैं कि माता की बिदाई का जैसे ही समय आता है, मन विचलित हो उठता है और पुरानी यादें सुररने लगती हैं। मन में प्रश्न उठता है कि हे माँ! ऐसे दुःखद दिन क्यों आते हैं, जिससे हमारा जीवरा (प्राण) चुर-चुर हो जाता है? हमारी छाती फट रही है और नयनों से आंसुओं की धारा बह रही है। तुम्हारे बिना अब हमें कौन ऐसा ही माया और दुलार देगा? हे माँ! तेरे आंचल की शीतल छाया हमें संसार में अब कहाँ प्राप्त हो सकेगी?
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन भारतीय लोक-आध्यात्मिकता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है जहाँ भक्त और भगवान के बीच स्वामी-सेवक का नहीं, बल्कि माता और संतान का अत्यंत निकट संबंध स्थापित किया जाता है।
- लोक-संस्कृति का संगम: छत्तीसगढ़ी और आंचलिक लोक बोलियों के शब्दों (जैसे दाई, करलाई, जोत जावरा, उसलईया, आंतस, जीवरा) का सुंदर प्रयोग इसे सीधे दिल तक पहुँचाता है।
- वात्सल्य रस की प्रधानता: इस रचना में शांत और करुण रस के साथ-साथ वात्सल्य रस की पराकाष्ठा देखने को मिलती है, जहाँ माँ की विदाई पर रोता हुआ भक्त चित्रित किया गया है।
- त्योहारों से जुड़ाव: नवरात्रि, जवारा विसर्जन, और जवारा ठंडा करने की परंपराओं का सजीव चित्रण इस भजन को धार्मिक अनुष्ठानों का अनिवार्य हिस्सा बनाता है।
- आध्यात्मिक समर्पण: यह सिखाता है कि ईश्वर के साथ हमारा रिश्ता सांसारिक रिश्तों से भी अधिक प्रगाढ़ और निश्छल होना चाहिए।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
भक्ति संगीत में भाव की शुद्धता और समय का विशेष महत्व होता है:
- उचित अवसर: शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि के दौरान, विशेषकर दशमी तिथि को जवारा विसर्जन, कलश विसर्जन या माता की विदाई के समय इस भजन का गायन अत्यंत भावुक और उपयुक्त होता है।
- दैनिक स्मरण: संध्याकालीन बेला में जब मन में वैराग्य या माता के प्रति गहरी पुकार हो, तब इसे एकाग्रचित होकर सुना या गाया जा सकता है।
- गायन विधि: इसे सामूहिक स्वर में, हारमोनियम और ढोलक/झांझ की धीमी थाप के साथ करुण और वात्सल्य भाव में गाना चाहिए ताकि सुनने वालों की आँखें नम हो सकें।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह स्तुति साक्षात् जगदम्बा, आदिशक्ति माँ दुर्गा, महालक्ष्मी और महासरस्वती के एकीकृत स्वरूप को समर्पित है। लोक परंपरा में इन्हें 'दाई' (माता) कहकर पुकारा जाता है। भारतीय लोक साहित्य में ऐसे अनगिनत अज्ञात और लोक-कवि हुए हैं जिन्होंने अपनी अनूठी शब्दावली में माँ की महिमा का गुणगान किया है, जिनमें से कई रचनाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ी हैं। ऐसे ही पारंपरिक रचनाकारों में गौतम जैसे लोक-संतों व गीतकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की रचना छत्तीसगढ़ और मध्य भारत के ग्रामीण अंचलों की उस समृद्ध परंपरा से जुड़ी है जहाँ नवरात्रि के नौ दिनों तक गाँवों और घरों में जवारे (गेहूँ या जौ के जवारे) बोए जाते हैं। इन नौ दिनों तक माँ की सेवा में प्रतिदिन जस गीत और सेवा गीत गाए जाते हैं। दशमी के दिन जब इन जवारों को बाजे-गाजे के साथ नदी या तालाब में विसर्जित करने ले जाया जाता है, तब पूरा गाँव इस करुण गीत से गूँज उठता है। यह पृष्ठभूमि इस भजन को मात्र एक संगीत न बनाकर एक जीवंत सांस्कृतिक अनुष्ठान बनाती है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा ठेठ छत्तीसगढ़ी मिश्रित लोक हिंदी है, जो इसकी मिठास को और बढ़ा देती है।
- शब्दावली: 'जगतारन' (जगत का तारण करने वाली), 'करलाई' (कष्ट या भारीपन), 'उसलईया' (ठंडा करने की प्रक्रिया), 'आंतस' (हृदय की गहराई), 'पहुना' (मेहमान या बेटी), 'तिजा' (तीज का त्यौहार), 'सगुरी' (पवित्र विसर्जन स्थल)।
- काव्य रूप: यह मात्रिक लोक-छंद शैली में रचित है, जिसमें टेक (मखड़ा) और अंतरे की सुंदर संरचना है।
- अलंकार: उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग मिलता है जहाँ माँ के आगमन की तुलना 'तिजा पर आने वाली बेटी' से की गई है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
- अस्थिरता का बोध: जिस प्रकार माँ कुछ दिनों के लिए आकर वापस लौट जाती हैं, उसी प्रकार संसार के सभी संबंध और जीवन भी क्षणभंगुर हैं।
- कृतज्ञता (Gratitude): हमें ईश्वर द्वारा प्रदत्त इस जीवन और उसकी दया के प्रति सदैव कृतज्ञ रहना चाहिए।
- गाढ़ प्रेम: ईश्वर के साथ व्यापारिक संबंध (कुछ पाने की लालसा) के बजाय अनन्य प्रेम का संबंध रखना ही सच्ची भक्ति है।
- सांसारिक विरह को सहन करना: प्रियजनों और ईश्वरीय सान्निध्य से बिछड़ने का दुःख हमें भीतर से परिपक्व बनाता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | संदर्भ / प्रसंग |
|---|---|---|
| जगतारन | संसार का उद्धार करने वाली | माता दुर्गा का विशेष संबोधन |
| करलाई | भारीपन, पीड़ा या कष्ट | विदाई के समय होने वाला मानसिक दुःख |
| उसलईया | ठंडा करना / शांति देना | जवारों के विसर्जन और जोत को शांत करने की बेला |
| आंतस | हृदय का अंतःकरण | मन की गहराइयों में बसी माता की छवि |
| तिजा | तीज का पावन पर्व | बेटी के मायके आने का सांस्कृतिक संदर्भ |
| सगुरी | पवित्र स्थान / पूजा स्थल | विसर्जन या जवारा रखने का नियत स्थान |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"कइसे करबो दाई तोर बिदाई, लागत हावे भारी करलाई"
भावार्थ: भक्त कहता है कि हे माता! हम अपने हाथों से तुम्हारी विदाई कैसे करें? यह विचार ही हमारे मन को भारी पीड़ा से भर रहा है।
"जैसे बेटी पहुना तिजा आथे, जोरे माया ला वोहर चले जाथे"
भावार्थ: माता का आगमन ऐसा है जैसे कोई विवाहित पुत्री अपने मायके तीज त्यौहार पर कुछ दिनों के लिए आती है और फिर अपने घर लौट जाती है।
"छाती फाटे नयना आसू ढारे, तोर बिना अब करिही माया दुलारे"
भावार्थ: आपके वियोग में हमारा दिल फटा जा रहा है, आँखों से अश्रुधारा बह रही है। आपके बिना अब हमें कौन इतनी ममता और दुलार देगा?
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस लोक भजन के साथ निम्नलिखित पौराणिक मंत्र का स्मरण करना अत्यंत फलदायी होता है:
ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते।।
यह मंत्र माता दुर्गा के मंगलकारी स्वरूप को नमन करता है और विसर्जन के समय माता से क्षमा प्रार्थना व आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उत्तम माना जाता है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| भजन का नाम | हे जगतारन देवी दुर्गा मईया (He Jagtaran Devi Lyrics) |
| समर्पित देवता | आदिशक्ति माँ दुर्गा / जगदम्बा |
| भाषा / शैली | छत्तीसगढ़ी लोक-बोली एवं हिंदी मिश्रित |
| मुख्य भाव | वात्सल्य, विरह, प्रेम एवं समर्पण |
| गायन अवसर | नवरात्रि विसर्जन, जवारा उठाई, माता की विदाई |
| सांस्कृतिक परंपरा | मध्य भारत एवं छत्तीसगढ़ की लोक-भक्ति परंपरा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री पारंपरिक लोक-साहित्य, क्षेत्रीय भक्ति परंपराओं और प्रामाणिक सांस्कृतिक संदर्भों के आधार पर तैयार की गई है। इसमें प्रयुक्त शब्दों के अर्थ और भावार्थ को जनसामान्य की सुगमता के ध्यान में रखकर विश्लेषित किया गया है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- भारतीय लोक-साहित्य एवं छत्तीसगढ़ी लोक-गीत संग्रह परंपरा
- देवी भागवत पुराण एवं शाक्त परंपरा के अनुष्ठान ग्रंथ
- पारंपरिक नवरात्रि एवं जवारा विसर्जन पद्धतियाँ
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें