तू ही तारणहार है सबका तू ही पालनहार लिरिक्स - परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व
सनातन धर्म की पावन और समृद्ध परंपरा में भजन, संकीर्तन और प्रभु नाम का स्मरण जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ने का सबसे सरल और प्रभावी मार्ग माना गया है। "तू ही तारणहार है सबका तू ही पालनहार" यह अत्यंत ही मधुर, भक्ति-रस से ओत-प्रोत और अंतर्मन को झकझोर देने वाला एक लोकप्रिय भजन है। इस दिव्य भजन के माध्यम से साधक अपनी समस्त चिंताओं, दुखों और योग्यताओं को भूलकर पूर्ण रूप से उस परम सत्ता के चरणों में समर्पित हो जाता है, जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन, पालन और संकटों से उद्धार करती है। कलयुग में नामस्मरण को ही मोक्ष का द्वार बताया गया है, और यह भजन साधक के भीतर अनन्य भक्ति, दृढ़ विश्वास और आत्मिक शांति का संचार करता है। इस लेख में हम इस भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, शब्दार्थ, विस्तृत भावार्थ और इसके आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जिससे भक्तगण इस पावन रचना का आनंद लेते हुए अपनी साधना को और अधिक सुदृढ़ कर सकें।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
स्थाई (मखड़ा):
तू ही तारणहार है सबका, तू ही पालनहार,
तेरे चरणों में झुकता है, सारा ये संसार।
दीनों के दुख हारने वाले, भक्तों के रखवाले,
नैया मेरी पार लगा दो, हे प्रभु गिरधारी!
प्रथम अंतरा:
इस दुनिया के मेले में, भटके मन की नादानी,
तेरी कृपा बिन प्रभु जी, अधूरी हर कहानी।
तू ही दीप, तू ही बाती, तू ही उजियारा,
इस भवसागर में प्रभु, तू ही सहारा।
दुखों की आंधी चले चाहे, या बरसे गम की धार,
तेरे नाम का सिमरन ही है, जीवन का आधार।
द्वितीय अंतरा:
कौन सुने इस मन की पीर, कौन समझे दर्द हमारा,
तेरे सिवा जग में कोई नहीं, मेरा जीवन सहारा।
अहंकार की इस माया में, हम भूल गए भगवान,
तू बैठा है घट-घट वासी, तुझको सब ज्ञान।
क्षमा करो अपराध हमारे, हे करुणामय दाता,
तुझसे ही है रिश्ता मेरा, तू ही भाग्य विधाता।
समापन / अंत (Refrain):
सबकी झोली भरने वाले, सबका तू रखवाला,
तेरे दर पर जो भी आया, किस्मत को चमकाया।
तू ही तारणहार है सबका, तू ही पालनहार,
कोटि-कोटि प्रणाम प्रभु तुझको, बारंबार।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन साधक और परमात्मा के बीच के अनन्य और प्रेमपूर्ण संबंध को अत्यंत सुंदर शब्दों में प्रस्तुत करता है। भजन की शुरुआती पंक्तियों में ही ईश्वर की सर्वव्यापकता और उनके तारणहार स्वरूप को स्वीकार किया गया है। 'तारणहार' का अर्थ है भवसागर से पार लगाने वाला और 'पालनहार' का अर्थ है इस संपूर्ण सृष्टि का भरण-पोषण करने वाला। साधक का मानना है कि इस चराचर जगत में ऐसा कोई भी नहीं है जो जीव के दुखों को हर सके और उसकी नैया को पार लगा सके सिवाय उस परमेश्वर के।
प्रथम अंतरे में जीवन की विडंबनाओं और सांसारिक मोह-माया का वर्णन किया गया है। मनुष्य इस दुनिया के प्रलोभन में भटककर अपने असली उद्देश्य यानी ईश्वर प्राप्ति को भूल जाता है। भजन याद दिलाता है कि ईश्वर ही अंधकार में प्रकाश (उजियारा) दिखाने वाले दीप और बाती के समान हैं। चाहे जीवन में कितनी भी कठिनाइयां या दुख रूपी आंधियां क्यों न आएं, भगवान के नाम का स्मरण ही जीवन की सबसे बड़ी नौका और सुरक्षा कवच बनता है.
द्वितीय अंतरे में साधक अपनी भूलों और अहंकार का पश्चाताप करते हुए शरणागत होता है। मनुष्य अपने दैनिक जीवन के घमंड और सांसारिक बंधनों में फंसकर उस घट-घट वासी परमात्मा को भुला बैठता है, जो अंतर्यामी है और सब कुछ जानता है। अंत में, भक्त करुणा के सागर से अपने सभी अपराधों के लिए क्षमा मांगते हुए यह स्वीकार करता है कि उसका असली भाग्य विधाता और रक्षक केवल वही है। संपूर्ण भावार्थ यह है कि मनुष्य को अपनी हर परिस्थिति में भगवान पर अटूट विश्वास रखना चाहिए और निरंतर उनका स्मरण करना चाहिए।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता, मार्मिकता और सहज भाव है। इसमें संस्कृत के कठिन शब्दों के स्थान पर सीधे और सरल हिंदी शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिन्हें आम जनमानस आसानी से समझ सकता है और गा सकता है। सनातन धर्म में संकीर्तन का बहुत बड़ा महत्व है। श्रीमद्भगवद्गीता और विभिन्न पुराणों में यह बताया गया है कि कलयुग में केवल भगवान का नाम जाप और संकीर्तन ही मुक्ति का सबसे सुगम मार्ग है। यह भजन साधक के मन को चंचलता और विकारों से मुक्त कर एकाग्रता प्रदान करता है। इसे सुनने और गाने से मानसिक तनाव दूर होता है, हृदय में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और ईश्वर के प्रति प्रेम तथा समर्पण की भावना प्रगाढ़ होती है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
भजन को गाने या सुनने के लिए किसी विशेष नियम या समय की पाबंदी नहीं होती, क्योंकि सच्ची भक्ति भाव से ओत-प्रोत होती है। फिर भी, आध्यात्मिक रूप से इसका अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित समय और विधियां उत्तम मानी जाती हैं:
- प्रातःकाल (Brahmamuhurta): सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा कक्ष या मंदिर में दीपक प्रज्वलित करने के पश्चात इस भजन का गायन या श्रवण करने से पूरा दिन सकारात्मकता और ऊर्जा से भरपूर रहता है।
- संध्यावसान / सायं काल: दिनभर की भागदौड़ और मानसिक थकान के बाद शाम के समय भगवान के समक्ष बैठकर यह भजन गाने से मन को शांति मिलती है और तनाव कम होता है।
- सत्संग एवं धार्मिक आयोजन: किसी भी पारिवारिक अनुष्ठान, कीर्तन मंडली, जागरण या विशेष पर्व (जैसे एकादशी, महाशिवरात्रि, जन्माष्टमी आदि) पर समूह में इस भजन का गायन वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बना देता है।
- मानसिक शांति के समय: जब भी जीवन में निराशा या संकट का अनुभव हो, एकांत में बैठकर इस भजन का स्मरण करने से आंतरिक शक्ति और धैर्य की प्राप्ति होती है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन किसी एक विशिष्ट देवता तक सीमित न होकर संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनहार, अर्थात भगवान विष्णु, श्री कृष्ण, श्री राम या आराध्य देव के रूप में किसी भी सर्वोच्च शक्ति को समर्पित किया जा सकता है। सनातन परंपरा में 'पालनहार' शब्द मुख्य रूप से भगवान विष्णु और उनके अवतारों (श्री राम और श्री कृष्ण) के लिए प्रयुक्त होता है, जो जगत के पालन और भक्तों के संकट निवारण के लिए जाने जाते हैं। इसके साथ ही, विभिन्न संत महात्माओं और कवियों ने अपनी रचनाओं में इसी तारणहार भाव को आधार बनाकर अनगिनत भजनों की रचना की है, जो आज भी भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। ऐसे ही पावन ग्रंथों और स्तोत्रों के बारे में जानने के लिए आप सुब्रह्मण्य अष्टोत्तर शतनामावली का भी अध्ययन कर सकते हैं, जो साधक को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
लोक-कल्याण और भक्ति रस से परिपूर्ण ऐसे भजन सदियों से भारतीय मौखिक और लिखित परंपरा का हिस्सा रहे हैं। लोक-गीतों और संतों की वाणी से प्रेरित होकर इन भजनों ने समाज को जोड़ने और जोड़ने का कार्य किया है। जब समाज में संकट, संताप या निराशा का वातावरण होता था, तब संतों और भक्तों ने ऐसे पदों की रचना की जो डूबती हुई नौका को आशा की किरण दिखा सकें। "तू ही तारणहार है सबका" इसी लोक-भक्ति परंपरा की एक उत्कृष्ट देन है, जिसे आधुनिक संगीत और पारंपरिक धुनों दोनों ही माध्यमों से भक्तों द्वारा बड़े चाव से गाया जाता है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल हिंदी, ब्रज-प्रभावित खड़ी बोली और लोक-साहित्य का एक सुंदर मिश्रण है। इसमें प्रयुक्त काव्यात्मक शैली बहुत ही प्रवाहमयी है। 'तारणहार' और 'पालनहार' जैसे तुकबंदी वाले शब्दों (Rhyming words) ने इस भजन में एक अलग ही लेह और संगीत उत्पन्न किया है। काव्य की दृष्टि से इसमें रूपक अलंकार और अनुप्रास अलंकार का सहज प्रयोग देखने को मिलता है, जैसे 'भवसागर', 'दीनों के दुख हारने वाले', और 'घट-घट वासी'। यह शैली श्रोता के हृदय को सीधे स्पर्श करती है और बिना किसी प्रयास के उसे भाव-विभोर कर देती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन केवल गाने की वस्तु नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के लिए एक महान दार्शनिक संदेश देता है:
- पूर्ण शरणागति (Surrender): मनुष्य को अपने जीवन में आने वाली हर सफलता और विफलता को स्वीकार करते हुए ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति रखनी चाहिए।
- अहंकार का त्याग: जीवन की भौतिक प्रगति या धन-दौलत के मद में आकर कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि सबका मालिक और विधाता केवल एक वही परम सत्ता है।
- संकट में धैर्य: कठिन समय या दुखों की आंधी आने पर भी अपने धैर्य को नहीं खोना चाहिए और भगवान के नाम का सहारा लेना चाहिए।
- कृतज्ञता का भाव: ईश्वर ने हमें जो जीवन, सांसें और परिवार दिया है, उसके प्रति हमेशा कृतज्ञ (Grateful) रहना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| तारणहार | पार लगाने वाला / उद्धारकर्ता | जो जीव को इस भवसागर से मुक्ति दिलाए। |
| पालनहार | भरण-पोषण करने वाला | जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड और जीवों की देखभाल करता है। |
| भवसागर | संसार रूपी सागर | जन्म-मरण का यह चक्र जिससे पार पाना कठिन है। |
| घट-घट वासी | सबके हृदय में निवास करने वाला | ईश्वर की सर्वव्यापकता का प्रतीक। |
| सिमरन | निरंतर स्मरण या जाप | भक्ति का सबसे प्रमुख साधन। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"तू ही तारणहार है सबका, तू ही पालनहार" - इस पंक्ति का अर्थ है कि हे प्रभु! इस दुनिया में जितने भी जीव हैं, उन सबका उद्धार करने वाले और उनका पालन-पोषण करने वाले एकमात्र आप ही हैं। आपके अतिरिक्त कोई दूसरा ऐसा रक्षक नहीं है।
"तेरे चरणों में झुकता है, सारा ये संसार" - इस विशाल ब्रह्मांड की समस्त शक्तियां, देवता, ऋषि-मुनि और मनुष्य आपके ही चरणों में नतमस्तक होते हैं।
"इस दुनिया के मेले में, भटके मन की नादानी" - यह संसार एक मेले की भांति है जहाँ आकर मनुष्य भौतिक वस्तुओं और प्रलोभनों में उलझकर अपने वास्तविक मार्ग से भटक जाता है, यह हमारे मन की नासमझी है।
"तेरी कृपा बिन प्रभु जी, अधूरी हर कहानी" - भगवान की अनुकंपा के बिना मनुष्य का कोई भी कार्य या जीवन की सफलता पूर्ण नहीं हो सकती। ईश्वर की कृपा ही सब कुछ है।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव को पुष्ट करने वाले कई प्राचीन वैदिक और पौराणिक श्लोक सनातन ग्रंथों में मिलते हैं। उदाहरण के लिए, भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं:
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥"
अर्थात जो भक्त अनन्य भाव से मेरा चिंतन और भजन करते हैं, उनके योग (प्राप्ति) और क्षम (ररक्षा) का उत्तरदायित्व मैं स्वयं वहन करता हूँ। इसके साथ ही, अन्य भक्तिपरक रचनाओं जैसे श्री हनुमान चालीसा में भी संकटमोचन के रूप में इसी तारणहार भाव के दर्शन होते हैं।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| भजन का नाम | तू ही तारणहार है सबका तू ही पालनहार लिरिक्स |
| विषय / थीम | भक्ति, शरणागति, ईश्वर महिमा और संकीर्तन |
| प्रमुख भाव | विनय, प्रेम, समर्पण और विश्वास |
| भाषा | सरल हिंदी एवं ब्रज-प्रभावित लोक बोली |
| उपयुक्त अवसर | प्रातःकाल पूजा, संध्या वंदना, सत्संग और कीर्तन |
| श्रेणी | भक्ति गीत एवं भजन |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
भक्तलोक (Bhaktilok.in) पर प्रकाशित यह सामग्री सनातन धर्म की पारंपरिक लोक-भक्ति, संकीर्तन परंपरा और श्रीमद्भगवद्गीता के संदेशों पर आधारित है। पाठकों की सुगमता के लिए भजन के लिरिक्स को शुद्ध देवनागरी लिपि में प्रस्तुत किया गया है तथा इसके दार्शनिक पहलुओं को विस्तार से समझाया गया है। यह सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे पूरी प्रमाणिकता और भक्ति भाव के साथ संकलित किया गया है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता - भगवान श्री कृष्ण के उपदेश एवं भक्ति योग।
- सनातन संकीर्तन एवं लोक-भजन परंपरा के पारंपरिक स्रोत।
- वैदिक साहित्य और उपनिषदों में वर्णित ईश्वर की सर्वव्यापकता के सिद्धांत।
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