लईयो लईयो भवानी माँ आरती अम्बे की लिरिक्स | Laiyo Laiyo Bhavani Maan Aarti Ambe Kee Lyrics
"लईयो लईयो भवानी माँ" एक अत्यंत लोकप्रिय और भावपूर्ण देवी आरती है, जो माँ अम्बे, माँ दुर्गा और आदिशक्ति भवानी को समर्पित है। यह आरती विशेष रूप से गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में नवरात्रि, दुर्गा पूजा, ज्योति कलश स्थापना तथा माता के जागरण के अवसर पर गाई जाती है। इस आरती का स्वर अत्यंत मार्मिक है — इसमें भक्त माँ भवानी के चरणों में निवेदन करता है कि वे उसकी आरती स्वीकार करें, उसकी विनती सुनें और अपनी कृपा-दृष्टि से उसके समस्त दुःख-कष्ट हर लें। "लईयो" शब्द का अर्थ है — "स्वीकार कर लीजिए" अथवा "ग्रहण कीजिए"। जब भक्त पूर्ण समर्पण भाव से माँ से यह प्रार्थना करता है कि "हे माँ, मेरी आरती लईयो (स्वीकार करो)", तो यह भाव केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्मा का पूर्ण शरणागति भाव है। यह आरती शक्ति उपासना की उस परंपरा का प्रतीक है जिसमें माँ को जगत जननी, दुःख हारिणी और भक्त वत्सला माना गया है। भक्तिलोक पर प्रस्तुत यह सामग्री संदर्भ एवं व्याख्या सहित तैयार की गई है, जिससे साधक आरती के शब्दों के साथ-साथ उसके गूढ़ आध्यात्मिक भाव को भी समझ सके।
सम्पूर्ण आरती पाठ | Complete Aarti Lyrics
॥ लईयो लईयो भवानी माँ ॥
लईयो लईयो भवानी माँ, आरती अम्बे की लईयो।
लईयो लईयो भवानी माँ, आरती अम्बे की लईयो।
जय जय जगदम्बे माँ, जय जय जगदम्बे।
भक्त जनों के संकट, दूर करो हे माँ।
लईयो लईयो भवानी माँ, आरती अम्बे की लईयो।
माता जी की आरती, जो कोई नर गावे।
सुख सम्पत्ति पावे, दुःख दूर भगावे।
लईयो लईयो भवानी माँ, आरती अम्बे की लईयो।
दुःख दारिद्र मिटावे, भवसागर तरावे।
जन्म जन्म के फेरे, माता काट भगावे।
लईयो लईयो भवानी माँ, आरती अम्बे की लईयो।
शेरों वाली माता, भक्तों के साथ खड़ी।
संकट में जो आवे, झोली भर के देती।
लईयो लईयो भवानी माँ, आरती अम्बे की लईयो।
जय जय अम्बे माता, जय जय भवानी माँ।
तेरी महिमा न्यारी, तेरी शक्ति अगम।
लईयो लईयो भवानी माँ, आरती अम्बे की लईयो।
जो माँ के चरणों में, शीश झुकाता है।
वही भव सागर से, पार हो जाता है।
लईयो लईयो भवानी माँ, आरती अम्बे की लईयो।
माँ की आरती गावो, प्रेम भाव से गावो।
माँ की कृपा पाओ, जीवन सफल बनाओ।
लईयो लईयो भवानी माँ, आरती अम्बे की लईयो।
॥ बोलो जय माता दी ॥
आरती का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Meaning & Bhavarth
इस आरती का प्रारंभिक वाक्य ही भक्त के पूर्ण समर्पण का परिचायक है — "लईयो लईयो भवानी माँ, आरती अम्बे की लईयो।" भक्त माँ भवानी से प्रार्थना करता है कि वे उसकी आरती को स्वीकार करें। यहाँ "आरती" केवल थाली और दीपक का कर्म नहीं, बल्कि भक्त के जीवन, उसके भाव, उसके कर्म और उसकी आत्मा का समर्पण है। भक्त कहता है — "हे माँ, मेरा यह तन, मन, धन और जीवन — सब कुछ तुम्हारा है, इसे स्वीकार कर लो।"
"जय जय जगदम्बे माँ" पंक्ति में भक्त माँ को जगत की जननी कहकर उनकी स्तुति करता है। जगदम्बे अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्मांड की माता। जब भक्त माँ को जगत जननी कहता है, तो वह यह स्वीकार करता है कि इस सृष्टि का कण-कण माँ की शक्ति से ही संचालित है। "भक्त जनों के संकट दूर करो हे माँ" — यह पंक्ति भक्त की आस्था और विश्वास को प्रकट करती है कि माँ अपने भक्तों के संकटों को स्वयं हर लेती हैं।
"माता जी की आरती जो कोई नर गावे, सुख सम्पत्ति पावे, दुःख दूर भगावे" — इस पंक्ति में आरती गाने का फल बताया गया है। जो भक्त श्रद्धा और प्रेम से माँ की आरती गाता है, उसे सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त होती है तथा उसके दुःख दूर हो जाते हैं। यह केवल भौतिक लाभ का वर्णन नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और आत्मिक उन्नति का संकेत है।
"दुःख दारिद्र मिटावे, भवसागर तरावे, जन्म जन्म के फेरे, माता काट भगावे" — यह पंक्ति अत्यंत गूढ़ है। भवसागर अर्थात् जन्म-मरण का चक्र। भक्त प्रार्थना करता है कि माँ उसके दुःख और दरिद्रता को मिटाए तथा उसे जन्म-जन्मांतर के बंधनों से मुक्त करे। यह मोक्ष की कामना का प्रतीक है।
"शेरों वाली माता, भक्तों के साथ खड़ी, संकट में जो आवे, झोली भर के देती" — यहाँ माँ के सिंहवाहिनी स्वरूप का वर्णन है। माँ अपने भक्तों के संकट में सदैव साथ खड़ी रहती हैं और उनकी झोली कभी खाली नहीं जाती। यह पंक्ति भक्त के अटूट विश्वास को दर्शाती है।
"जो माँ के चरणों में शीश झुकाता है, वही भव सागर से पार हो जाता है" — यह आरती का सार है। जो अहंकार त्यागकर माँ के चरणों में स्वयं को समर्पित कर देता है, वही संसार के बंधनों से मुक्त होता है। अंत में भक्त सभी को प्रेम भाव से माँ की आरती गाने का आह्वान करता है, जिससे जीवन सफल और कृतार्थ हो सके।
आरती का धार्मिक महत्व एवं फल | Significance & Benefits
सनातन परंपरा में आरती का अत्यंत विशेष स्थान है। आरती शब्द की उत्पत्ति "आरात्रिक" से मानी जाती है, जिसका अर्थ है — रात्रि के अंधकार को दूर करने वाला। जिस प्रकार दीपक का प्रकाश अंधकार को हर लेता है, उसी प्रकार माँ की आरती भक्त के जीवन से अज्ञान, भय और दुःख के अंधकार को दूर करती है। "लईयो लईयो भवानी माँ" आरती का विशेष महत्व इस बात में है कि यह भक्त और भगवान के बीच सीधा संवाद स्थापित करती है।
देवीभागवत पुराण और मार्कंडेय पुराण में माँ दुर्गा की उपासना को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की सिद्धि देने वाली बताया गया है। इस आरती के नियमित गायन से भक्त के भीतर शक्ति, साहस, करुणा और पवित्रता का संचार होता है। विशेष रूप से नवरात्रि के नौ दिनों में इस आरती का गायन माँ के नौ रूपों की कृपा प्राप्त करने का सरल साधन माना जाता है।
मान्यता है कि जो भक्त संकट के समय इस आरती को श्रद्धा से गाता है, माँ भवानी उसके जीवन से भय, रोग, शत्रु बाधा और दरिद्रता को दूर कर देती हैं। यह आरती गृह कलह, मानसिक अशांति और नकारात्मक ऊर्जा को भी दूर करने में सहायक मानी जाती है। साथ ही यह भक्त के भीतर मातृभाव, करुणा और समर्पण का विकास करती है।
आरती करने की सही विधि एवं थाली सज्जा | Aarti Vidhi & Thali Preparation
माँ भवानी की आरती करने के लिए शुद्धता, श्रद्धा और भक्ति भाव का होना अनिवार्य है। आरती की थाली सजाने की पारंपरिक विधि इस प्रकार है —
- एक ताम्र, पीतल अथवा चाँदी की आरती थाली लें।
- थाली में घी अथवा तिल के तेल का दीपक स्थापित करें।
- दीपक के साथ कपूर, धूप अथवा अगरबत्ती रखें।
- ताजे फूल, विशेषकर लाल पुष्प, गेंदा और गुलाब अर्पित करें।
- रोली, अक्षत (चावल), हल्दी और कुमकुम रखें।
- मिष्ठान अथवा प्रसाद रखें।
- पान का पत्ता और सुपारी भी शुभ मानी जाती है।
आरती करते समय थाली को माँ की मूर्ति अथवा चित्र के सम्मुख घड़ी की दिशा में घुमाएँ। आरती के बाद दीपक की लौ से अपने मस्तक पर तिलक लगाएँ और प्रसाद ग्रहण करें। आरती प्रातःकाल स्नान के बाद अथवा संध्या के समय दीप प्रज्वलित करके की जाती है। नवरात्रि, दुर्गा अष्टमी, नवमी, ज्योति कलश स्थापना तथा माता के जागरण में इस आरती का विशेष महत्व है।
संबंधित मंत्र एवं स्तुति | Associated Mantra
माँ भवानी की आरती के साथ निम्नलिखित मंत्रों का जाप अत्यंत फलदायी माना जाता है —
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
॥ दुर्गा बीज मंत्र ॥
इसके अतिरिक्त दुर्गा चालीसा, जय अम्बे गौरी आरती तथा दुर्गा सप्तशती का पाठ भी माँ की कृपा प्राप्त करने का सरल साधन है। नवरात्रि में ॐ जय जगदीश आरती के साथ इस आरती का गायन विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: "लईयो लईयो भवानी माँ" आरती कब गाई जाती है?
यह आरती विशेष रूप से नवरात्रि, दुर्गा पूजा, ज्योति कलश स्थापना, माता के जागरण, दुर्गा अष्टमी और नवमी के दिन गाई जाती है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मंगलवार, शुक्रवार तथा संध्या आरती के समय भी इसे गाया जा सकता है।
प्रश्न 2: "लईयो" शब्द का क्या अर्थ है?
"लईयो" शब्द का अर्थ है — "स्वीकार कर लीजिए" अथवा "ग्रहण कीजिए"। भक्त माँ से प्रार्थना करता है कि वे उसकी आरती और समर्पण को स्वीकार करें।
प्रश्न 3: क्या इस आरती का नियमित पाठ करना चाहिए?
हाँ, यदि भक्त श्रद्धा और शुद्ध भाव से इस आरती का नियमित पाठ करता है, तो माँ भवानी की कृपा से मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और संकटों से मुक्ति प्राप्त होती है।
प्रश्न 4: आरती करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
आरती करते समय शरीर और वस्त्र शुद्ध होने चाहिए। मन में पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव होना चाहिए। आरती थाली को घड़ी की दिशा में घुमाना चाहिए तथा आरती के बाद प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।
प्रश्न 5: क्या यह आरती किसी विशेष क्षेत्र में अधिक प्रचलित है?
यह आरती गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रचलित है। विशेषकर तुलजा भवानी और अम्बे माता के मंदिरों में इसका गायन अत्यंत लोकप्रिय है।
प्रश्न 6: क्या इस आरती का गायन घर में कर सकते हैं?
हाँ, इस आरती का गायन घर के पूजा स्थल पर किया जा सकता है। इसके लिए किसी विशेष अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती, केवल श्रद्धा और शुद्धता आवश्यक है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
भक्तिलोक पर प्रस्तुत यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे शास्त्रीय संदर्भों, लोक परंपरा तथा देवी उपासना की प्रामाणिक पद्धतियों के आधार पर संकलित किया गया है। "लईयो लईयो भवानी माँ" आरती शक्ति उपासना की उस समृद्ध परंपरा का हिस्सा है, जिसमें भक्त और भगवान के बीच का संबंध केवल स्तुति का नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण और शरणागति का है।
इस आरती के माध्यम से साधक माँ भवानी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता है और उनकी कृपा से जीवन में शक्ति, शांति और समृद्धि प्राप्त करता है। यह सामग्री केवल भक्ति भाव को जागृत करने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। पाठकों से निवेदन है कि वे इसे श्रद्धा और समर्पण भाव से पढ़ें तथा माँ की कृपा का अनुभव करें।
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