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मेरे सतगुरु प्यारे दा ,दरबार बड़ा सोहणा है लिरिक्स (mere sataguru pyaare da, darabaar bada sohana hai lyrics in hindi) - bhaktilok

109 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मेरे सतगुरु प्यारे दा, दरबार बड़ा सोहणा है - सम्पूर्ण परिचय एवं भावार्थ

सच्चे गुरु की महिमा और उनके पावन दरबार की अलौकिक सुंदरता का गुणगान करने वाला यह लोकप्रिय भजन "मेरे सतगुरु प्यारे दा, दरबार बड़ा सोहणा है (Mere Sataguru Pyaare Da, Darabaar Bada Sohana Hai)" गुरु भक्ति का एक अत्यंत भावपूर्ण और मनमोहक गीत है। भारतीय सनातन संत परंपरा में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर तथा परब्रह्म का प्रत्यक्ष स्वरूप माना गया है। जब कोई जिज्ञाsu और साधक अपने सतगुरु की शरण में जाता है, तो उसे जो मानसिक शांति, प्रेम और आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति होती है, उसका वर्णन शब्दों में करना असंभव है। इस भजन का प्रत्येक शब्द और पंक्ति गुरु दरबार के उस वैभव, अपनापन, प्रेम और करुणा को दर्शाती है जहाँ हर आने वाले को भवसागर से पार उतरने का मार्ग मिलता है।

भक्ति संगीत प्रेमियों के बीच यह भजन विशेष रूप से सत्संग, जागरण, भंडारा और गुरु पूर्णिमा जैसे पावन पर्वों पर अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है। इस लेख में हम इस दिव्य भजन के संपूर्ण बोल (Lyrics), पंक्ति-दर-पंक्ति सरल हिंदी अर्थ, भावार्थ, आध्यात्मिक संदेश तथा जीवन में गुरु के महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यदि आप भी अपने गुरुदेव के चरणों में ध्यान लगाना चाहते हैं, तो यह पावन भजन आपके हृदय को भक्ति रस से सराबोर कर देगा।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ मेरे सतगुरु प्यारे दा, दरबार बड़ा सोहणा है ॥

मेरे सतगुरु प्यारे दा ,दरबार बड़ा सोहणा है
इत्थे दर्शन होंदे ने, दीदार बड़ा सोहणा है
दीदार बड़ा सोहणा है , परिवार बड़ा सोहणा है
मेरे सतगुरु प्यारे दा, दरबार बड़ा सोहणा है...

मैनु सारे पुछदे हैं, मेरे संगी ते साथी
जिनने इक वारि देख लई मेरे सतगुरु दी झांकी
कित्थे ढून्ढ के ल्यांदा है, ये लाल बड़ा सोहणा है
मेरे सतगुरु प्यारे दा ,दरबार बड़ा सोहणा है...

मैनु आपे नई मिलया सतगुरु ने मिलाया है
इत्थे मिलने दा मैनु रासता सतगुरु ने दिखाया है
मेरे सतगुरु प्यारे दा , उपकार बड़ा सोहणा है
मेरे सतगुरु प्यारे दा ,दरबार बड़ा सोहणा है...

ये मानसरोवर है, इत्थे मोती मिलदे हैं
कई जन्मा दे बिछड़े प्रेमी, इस दर ते मिलदे हैं
ये घाटे का सौदा नहीं , व्यापार बड़ा सोहणा है
मेरे सतगुरु प्यारे दा ,दरबार बड़ा सोहणा है...

मेरे सतगुरु प्यारे दी, बड़ी शान निराली है
इत्थे रोज़ दशहरा है, इत्थे रोज़ दिवाली है
इत्थे तन मन रंग देते, रंगदार बड़ा सोहणा है
मेरे सतगुरु प्यारे दा ,दरबार बड़ा सोहणा है...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि एक शिष्य के अपने गुरु के प्रति अगाध प्रेम, समर्पण और कृतज्ञता की जीवंत अभिव्यक्ति है। आइए इसके प्रत्येक अंतरे के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को समझें:

मुखड़ा (स्थायी): भक्त अपने इष्टदेव रूपी सतगुरु की महिमा गाते हुए कहता है कि मेरे प्यारे सतगुरु का दरबार अत्यंत सुंदर और अलौकिक है। इस दरबार में प्रवेश करते ही सतगुरु के दर्शन होते हैं और उनका वह दिव्य दीदार (झलक) समस्त दुखों को हरने वाला है। उस दरबार का वातावरण, वहाँ रहने वाले संतों और भक्तों का परिवार इतना प्रेममय है कि मन वहीं रम जाता है।

प्रथम अंतरा: भक्त कहता है कि मेरे सभी संगी-साथी और संबंधी मुझसे पूछते हैं कि तुम्हें इतनी शांति और आनंद कहाँ से मिला है? जिन लोगों ने भी एक बार मेरे सतगुरु की दिव्य झांकी देख ली है, वे उनके मोहक रूप में ऐसे खो जाते हैं कि वे आश्चर्य से पूछते हैं कि तुमने इस अलौकिक रत्न (सतगुरु) को कहाँ से ढूँढ कर प्राप्त किया है?

द्वितीय अंतरा: साधक अपनी विनम्रता प्रकट करते हुए कहता है कि मुझे यह मार्ग अपनी बुद्धि या बल से नहीं मिला, बल्कि मेरे सतगुरु ने स्वयं मुझ पर कृपा करके मुझे अपने चरणों से जोड़ा है। इस संसार में ईश्वर से मिलने का जो सच्चा मार्ग और रहस्य है, वह मुझे मेरे सतगुरु ने ही दिखाया है। सतगुरु का यह उपकार इतना महान है कि जीवन भर इसका ऋण चुकाया नहीं जा सकता।

तृतीय अंतरा: सतगुरु के दरबार को मानसरोवर (पवित्र सरोवर) की उपमा दी गई है जहाँ ज्ञान रूपी अमूल्य मोती मिलते हैं। अज्ञानता के कारण जो आत्माएं कई जन्मों से परमात्मा से बिछड़ चुकी थीं, वे प्रेमी भक्त इस दरबार में आकर पुन: परमात्मा से जुड़ जाते हैं। भक्ति का यह मार्ग कोई घाटे का सौदा नहीं है, बल्कि यह ऐसा श्रेष्ठ व्यापार है जिसमें केवल और केवल आत्मिक लाभ ही प्राप्त होता है।

चतुर्थ अंतरा: अंत में भक्त वर्णन करता है कि मेरे सतगुरु की शान सबसे निराली है। उनके दरबार में रोज विजय का पर्व (दशहरा) और आनंद का उत्सव (दिवाली) जैसा उल्लास रहता है। सतगुरु अपने प्रेम के रंगों से भक्तों के तन और मन दोनों को भक्ति के रंग में रंग देते हैं, जिससे जीवन आनंदमय हो जाता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • गुरु-शिष्य परंपरा का उत्स: यह भजन सनातन धर्म की उस महान गुरु-शिष्य परंपरा को समर्पित है जहाँ गुरु को मार्गदर्शक और मुक्तिदाता माना गया है।
  • आंतरिक शांति और संतोष: इस भजन को सुनने और गाने से मन में व्याप्त तनाव, चिंता और अशांति दूर होती है।
  • सामूहिक गायन के लिए उपयुक्त: इसकी लय और धुन इतनी सरल और मधुर है कि इसे सत्संग या परिवार के साथ आसानी से गाया जा सकता है।
  • भक्ति रस से ओतप्रोत: यह भजन साधक के हृदय में प्रेम, करुणा और समर्पण के भाव को जागृत करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भक्ति गीतों और भजनों का पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए उचित समय और भाव का होना आवश्यक है:

  • प्रातःकाल एवं संध्या वंदना: सुबह स्नान के पश्चात पूजा घर में अथवा संध्याकाल में शांत चित्त से इस भजन को सुनने या गाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • गुरु पूर्णिमा एवं सत्संग: गुरु पूर्णिमा, मासिक सत्संग या किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के दौरान इस भजन का सामूहिक संकीर्तन विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
  • मानसिक शांति के समय: जब भी मन विचलित हो, इस भजन को गुनगुनाने से चित्त शांत और स्थिर हो जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन प्रत्यक्ष रूप से किसी एक देवी-देवता को समर्पित न होकर ब्रह्मलीन संतों, सतगुरुओं और साक्षात् गुरु रूप में पूजनीय महापुरुषों को समर्पित है। भारतीय दर्शन में कहा गया है— "गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूपाय। बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोविंद दियो बताय।" इस प्रकार सतगुरु ही वह माध्यम हैं जो जीव को ईश्वर से साक्षात्कार कराते हैं। आप हमारे गुरुदेव भजन संग्रह पर जाकर ऐसे अन्य पावन भजनों का आनंद ले सकते हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन सरल हिंदी और पंजाबी मिश्रित लोक शैली (संत भाषा) में रचा गया है। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे 'सोहणा', 'इत्थे', 'दीदार', 'आपे' आदि इसे उत्तर भारत और पंजाब के लोक संगीत की मिठास प्रदान करते हैं। रूपक अलंकारों का सुंदर प्रयोग करते हुए सतगुरु के दरबार को मानसरोवर और ज्ञान को मोतियों के समान बताया गया है, जो काव्य की दृष्टि से इसकी उच्च गुणवत्ता को सिद्ध करता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • शरणगति का महत्व: जीवन में अहंकार का त्याग करके किसी सच्चे सतगुरु की शरण में जाना ही कल्याण का मार्ग है।
  • कृतज्ञता का भाव: हमें अपने गुरु के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए जिनकी कृपा से जीवन अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ता है।
  • सत्संग का प्रभाव: संतों और सत्संगियों के बीच बैठने से जन्म-जन्मांतर के संताप मिट जाते हैं और आत्मिक उन्नति होती है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ संदर्भ / प्रसंग
सतगुरु प्यारे प्रिय गुरुदेव आध्यात्मिक मार्गदर्शक जो प्रेम का प्रतीक हैं
दरबार बड़ा सोहणा है गुरु का दरबार अत्यंत सुंदर है गुरु के आश्रम या सत्संग स्थल की दिव्यता
दीदार दर्शन या झलक गुरु के मुखमंडल या स्वरूप के दर्शन
मानसरोवर पवित्र झील जहाँ मोती चुगते हैं गुरु का ज्ञान रूपी पवित्र स्थल
रंगदार रंगने वाला / प्रेम रंग में सराबोर भक्ति के रंग में रंगने की कृपा

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"इत्थे दर्शन होंदे ने, दीदार बड़ा सोहणा है" - इस पंक्ति का आशय है कि गुरु के दरबार में भौतिक सुखों के साथ-साथ आत्मिक दर्शन की प्राप्ति होती है, जो भक्त के नेत्रों और हृदय को तृप्त कर देता है।

"ये मानसरोवर है, इत्थे मोती मिलदे हैं" - यहाँ ज्ञान को मोती और गुरु के दरबार को मानसरोवर कहा गया है जहाँ अज्ञानता का अंधकार मिटकर ज्ञान का प्रकाश फैलता है।

"इत्थे रोज़ दशहरा है, इत्थे रोज़ दिवाली है" - गुरु की कृपा से जीवन में हर दिन उत्सव और आनंद का माहौल बन जाता है, क्योंकि असत्य पर सत्य की विजय और अज्ञान पर ज्ञान का प्रकाश निरंतर बना रहता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थ: गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही भगवान शिव हैं। गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं, ऐसे श्री गुरुदेव को मेरा प्रणाम है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम मेरे सतगुरु प्यारे दा, दरबार बड़ा सोहणा है (Mere Sataguru Pyaare Da Darabaar Bada Sohana Hai)
श्रेणी / लेबल गुरु भजन, सतगुरु भजन, गुरुदेव भजन
भाषा हिंदी / पंजाबी मिश्रित (संत वाणी)
मुख्य भाव गुरु भक्ति, प्रेम, समर्पण और आनंद
उपयुक्त अवसर सत्संग, जागरण, गुरु पूर्णिमा, दैनिक प्रार्थना
विषय गुरु महिमा और उनके दरबार की दिव्यता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रશ્न 1: "मेरे सतगुरु प्यारे दा दरबार बड़ा सोहणा है" भजन किस विषय पर आधारित है?

उत्तर: यह भजन सतगुरु के दरबार की अलौकिक सुंदरता, गुरु-महिमा, और उनके द्वारा मिलने वाले आध्यात्मिक प्रेम और शांति पर आधारित है।

प्रश्न 2: इस भजन को किस अवसर पर गाया जाता है?

उत्तर: इसे विशेष रूप से गुरु पूर्णिमा, सत्संग कार्यक्रमों, साप्ताहिक सभाओं और दैनिक पूजा-प्रार्थना के दौरान गाया जाता है।

प्रश्न 3: भजन में 'मानसरोवर' शब्द का क्या अर्थ है?

उत्तर: इस भजन में 'मानसरोवर' सतगुरु के उस पवित्र ज्ञान स्थल को कहा गया है जहाँ भक्तों को ज्ञान रूपी अमूल्य मोती प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 4: इस भजन को गाने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है?

उत्तर: इस भजन को श्रद्धापूर्वक गाने और सुनने से मन शांत होता है, तनाव दूर होता है और गुरु चरणों में प्रेम व भक्ति बढ़ती है।

प्रश्न 5: क्या इस भजन को घर पर अकेले गाया जा सकता है?

उत्तर: हाँ, इसे आप अपने घर में पूजा के समय अकेले या परिवार के साथ संकीर्तन के रूप में गा सकते हैं।

प्रश्न 6: गुरु भक्ति हमारे जीवन में क्यों आवश्यक है?

उत्तर: गुरु हमारे जीवन के अंधकार को दूर करके हमें सही मार्ग दिखाते हैं और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

प्रश्न 7: इस भजन की भाषा शैली कैसी है?

उत्तर: यह भजन बहुत ही सरल हिंदी और पंजाबी मिश्रित संत भाषा में है जिसे आमजन आसानी से समझ और गा सकते हैं।

प्रश्न 8: ऐसे अन्य गुरु भजन हमें कहाँ मिलेंगे?

उत्तर: आप भक्तिलोक (Bhaktilok.in) वेबसाइट पर जाकर विभिन्न संतों और गुरुओं के भजनों का विशाल संग्रह पढ़ और सुन सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख Bhaktilok.in के उच्च गुणवत्ता मानकों और मार्गदर्शक सिद्धांतों के अनुसार तैयार किया गया है। भजन के बोलों की शुद्धता, उच्चारण और उसके दार्शनिक अर्थ को पाठकों तक सहज रूप से पहुँचाने के लिए इसका विशेष ध्यान रखा गया है। यह सामग्री पूरी तरह से संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है जो पाठकों को आध्यात्मिक संतुष्टि प्रदान करती है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पारंपरिक संत वाणी एवं गुरु महिमा ग्रंथ
  • सत्संग भजन संकलन, उत्तर भारत एवं पंजाब परंपरा
  • सनातन गुरु-शिष्य परंपरा और उपनिषद् आधारित दार्शनिक चिंतन

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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