श्रीगणपती स्तोत्र लिरिक्स || Shreeganapati stotr lyrics in hindi || Bhaktilok
सनातन धर्म और वैदिक परंपरा में विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश जी का स्मरण किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ, अनुष्ठान या यात्रा से पहले किया जाता है। 'श्रीगणपती स्तोत्र' भगवान गणेश के द्वादश नामों (बारह नामों) और उनके अलौकिक स्वरूप का अत्यंत पावन, प्रभावशाली और भक्तिरस से परिपूर्ण स्रोत है। नारद मुनि द्वारा रचित इस दिव्य स्तोत्र का मराठी अनुवाद संत श्रीधर जी द्वारा किया गया, जो आज सम्पूर्ण भारत में भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। इस स्तोत्र का नित्य प्रातः और संध्याकाल में सस्वर पाठ करने से साधक के जीवन के समस्त विघ्नों का नाश होता है, बुद्धि, विद्या, यश, और धन की प्राप्ति होती है तथा अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। भक्तिलोक के इस विस्तृत और प्रामाणिक आलेख में हम श्रीगणपती स्तोत्र के मूल लिरिक्स, इसका सरल हिंदी अर्थ, पदच्छेद, पाठ विधि, और इसके आध्यात्मिक महत्व का गहन अध्ययन करेंगे।
मुख्य जानकारी एक नजर में
- स्तोत्र का नाम: श्रीगणपती स्तोत्र (Shree Ganapati Stotram)
- आरध्य देव: प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश
- मूल रचयिता: देवर्षि नारद मुनि
- अनुवादक / संकलनकर्ता: संत श्रीधर (मराठी से हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में प्रसारित)
- श्रेणी: स्तोत्र संग्रह, गणपति भजन, गणेश स्तोत्र
- भाषा: संस्कृतनिष्ठ हिंदी / मराठी परंपरा
- मुख्य लाभ: विघ्ननाश, विद्या प्राप्ति, धन-समृद्धि और मोक्ष
श्रीगणपती स्तोत्र संपूर्ण लिरिक्स | Complete Shreeganapati Stotr Lyrics
शुद्ध उच्चारण और पूर्ण भक्ति भाव के साथ भगवान श्रीगणेश के इस पावन स्तोत्र का स्मरण करें:
साष्टांग नमन हे माझे गौरीपुत्रा विनायका ।
भक्तीनें स्मरतो नित्य आयुःकामार्थ साधती ॥ १ ॥
प्रथम नांव वक्रतुंड दुसरें एकदंत ते ।
तिसरे कृष्णपिंगाक्ष चवथे गजवक्र ते ॥ २ ॥
पांचवे श्रीलंबोदर सहावें विकट नांव ते ।
सातवे विघ्नराजेंद्र आठवे धुम्रवर्ण ते ॥ ३ ॥
नववे श्री भालचंद्र दहावे श्री विनायक ।
अकरावे गणपती बारावे श्री गजानन ॥ ४ ॥
देवनांवे अशी बारा तीन संध्या म्हणे नर ।
विघ्नभीती नसे त्याला प्रभो ! तू सर्व सिद्धिदे ॥ ५ ॥
विद्यार्थ्याला मिळे विद्या धनार्थ्याला मिळे धन ।
पुत्रार्थ्याला मिळे पुत्र मोक्षार्थ्याला मिळे गति ॥ ६ ॥
जपता गणपती स्तोत्र सहा मासांत हे फळ ।
एक वर्ष पुर्ण होतां मिळे सिद्धी न संशय ॥ ७ ॥
नारदांनी रचिलेले झाले संपू्र्ण हें स्तोत्र ।
श्रीधराने मराठींत पठण्या अनुवादिले ॥ ८ ॥
॥ इति श्रीगणपती स्तोत्र संपूर्णम् ॥
श्रीगणपती स्तोत्र का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Meaning & Bhavarth
भक्तगण इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान गणेश के बारह पावन नामों का स्मरण करते हैं। आइए, प्रत्येक पंक्ति के माध्यम से इसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ को समझें:
श्लोक १: माता गौरी के पुत्र, विघ्नविनाशक श्री विनायक को मेरा साष्टांग नमस्कार है। जो भक्त भक्ति भाव के साथ नित्य आपका स्मरण करता है, उसके जीवन में आयु, धर्म, काम और अर्थ (चार पुरुषार्थ) स्वतः सिद्ध हो जाते हैं।
श्लोक २ से ४ (द्वादश नाम): भगवान गणेश के बारह दिव्य नाम इस प्रकार हैं— 1. वक्रतुंड (जिनकी सूंड मुड़ी हुई है), 2. एकदंत (जिनका एक दांत है), 3. कृष्णपिंगाक्ष (जो भूरे और गहरे नेत्रों वाले हैं), 4. गजवक्र (हाथी के मुख वाले), 5. लंबोदर (बड़े पेट वाले), 6. विकट (विशाल एवं अद्भुत स्वरूप वाले), 7. विघ्नराजेंद्र (समस्त विघ्नों के राजा), 8. धूम्रवर्ण (धुएँ के वर्ण वाले), 9. भालचंद्र (मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले), 10. विनायक (विशेष नायक या नेता), 11. गणपती (गणों के आधिपत्य स्वामी), और 12. गजानन (हाथी के मुख वाले देवता)।
श्लोक ५ से ७ (फलश्रुति): जो मनुष्य तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न और सायं काल) में गणेशजी के इन बारह नामों का पाठ करता है, उसे किसी भी प्रकार के विघ्न या भय की प्राप्ति नहीं होती है। हे प्रभो! आप ही समस्त सिद्धियों के दाता हैं। विद्यार्थी को विद्या, धन चाहने वाले को धन, संतान चाहने वाले को संतान और मोक्ष चाहने वाले को परम गति की प्राप्ति होती है। छह मास तक इस स्तोत्र का नित्य जप करने से उपर्युक्त फल प्राप्त होने लगते हैं और एक वर्ष पूर्ण होते-होते साधक को निश्चित रूप से सिद्धि की प्राप्ति होती है, इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक ८: यह संपूर्ण स्तोत्र देवर्षि नारद द्वारा रचा गया है, जिसे संत श्रीधर जी ने भक्तों के सुगम पठन हेतु मराठी भाषा में अनुवादित किया। इसका प्रभाव आज भी जन-कल्याण के लिए जीवंत है।
श्रीगणपती स्तोत्र के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पदावली | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक / पौराणिक संदर्भ |
|---|---|---|
| साष्टांग नमन | शरीर के आठ अंगों को जमीन पर टिकाकर किया जाने वाला प्रणाम | पूर्ण समर्पण और विनम्रता का प्रतीक |
| गौरीपुत्र | माता पार्वती (गौरी) के नंदन | वात्सल्य और शक्ति के प्रतीक भगवान गणेश |
| वक्रतुंड | मुड़ी हुई सूंड वाले | समस्त ब्रह्मांड के टेढ़े-मेढ़े मार्गों और बाधाओं को सीधा करने वाले |
| एकदंत | एक दांत वाले | ब्रह्मचर्य, एकाग्रता और महाभारत लेखन के समय का पावन प्रसंग |
| कृष्णपिंगाक्ष | काले और भूरे नेत्रों वाले | तीक्ष्ण दृष्टि और संपूर्ण ब्रह्मांड के रक्षक |
| लंबोदर | बड़े पेट वाले | समस्त चराचर जगत (ब्रह्मांड) को अपनेोदर (पेट) में समाहित रखने वाले |
| भालचंद्र | मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले | शीतल बुद्धि, शांति और ज्ञान के प्रकाशक |
| सिद्धिदे | समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाले | साधक की साधना को पूर्ण करने वाले परमेश्वर |
श्रीगणपती स्तोत्र पाठ विधि एवं नियम | Recitation Method & Vidhi
किसी भी स्तोत्र की पूर्ण सफलता उसके विधि-विधान और शुद्ध उच्चारण पर निर्भर करती है। श्रीगणपती स्तोत्र का पाठ करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- शुद्धता एवं स्नान: प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा घर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें।
- आसन: कुशा या ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- श्रीगणेश पूजन: भगवान गणेश की मूर्ति या तस्वीर के समक्ष दीपक (घृत या तेल का), धूप और अक्षत अर्पित करें। दूर्वा घास और मोदक का भोग अत्यंत प्रिय है।
- संध्या काल पाठ: स्तोत्र में उल्लेख है कि तीनों संध्याओं में इसका पाठ करने से विशेष फल मिलता है। अतः प्रातः, मध्याह्न और सायं काल इसका स्मरण करना श्रेष्ठ है।
- नियमितता: कम से कम 41 दिनों तक या निरंतर एक वर्ष तक इस स्तोत्र का नियमपूर्वक पाठ करने से साधक के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री पारंपरिक सनातन ग्रंथों, नारदीय पुराण संदर्भों और संत श्रीधर जी की कृतियों पर आधारित है। इसे पाठकों की सुविधा के लिए अत्यंत सरल, प्रामाणिक और व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री
स्रोत एवं संदर्भ
- नारद पुराण एवं गणेश पुराण - केंद्रीय पौराणिक संदर्भ
- संत श्रीधर कृत मराठी स्तोत्र संग्रह एवं पारंपरिक टीका
- सनातन धर्म ग्रंथ एवं स्तोत्र रत्नाकर
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें