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द्वार खड़ी शनी देव तुम्हारे (Dwar Khadi Shani Dev Tumhare Lyrics in Hindi) - Bhaktilok

138 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"द्वार खड़ी शनी देव तुम्हारे" (Dwar Khadi Shani Dev Tumhare) भगवान शनि देव को समर्पित एक अत्यंत भावपूर्ण, करुणामयी और शरणागति के भाव से ओतप्रोत भजन है। यह भजन भक्त के हृदय की उस पुकार को दर्शाता है जब वह सांसारिक कष्टों, दुखों और कर्मों के चक्रव्यूह में फंसकर असहाय महसूस करता है और न्याय के देवता शनि देव के चरणों में पूर्ण समर्पण कर देता है। इस भजन का मुख्य स्वर 'विनय' और 'करुणा' है, जहां भक्त अपने ज्ञात-अज्ञात अपराधों के लिए क्षमा मांगते हुए शनि देव से दया की याचना करता है। शनिवार के दिन, विशेषकर संध्या काल में इस भजन का श्रवण और गायन करने से मन को असीम शांति मिलती है और शनि देव की कृपा से जीवन के कष्टों का निवारण होता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

द्वार खड़ी शनी देव तुम्हारे

द्वार खड़ी शनी देव तुम्हारे
किरपा करो शनि दया करो,
करू तुम्हारी चरण वंदना
कष्ट हमारे विदा करो
द्वार खड़ी शनी देव तुम्हारे .....

तुम्हे मालुम सभी कुछ घेर
खड़े है गम कितने
तुम से नही तो किस से कहे
लाचार बड़े है हम कितने
तुम से है ये बिनती मेरी
छमा करो अप्राद मेरे
भीड़ दुखो की घेरे खड़ी है
कोई नही है साथ मेरे
करू तुम्हारी चरण वंदना
कष्ट हमारे विदा करो
द्वार खड़ी शनी देव तुम्हारे .....

दुनिया की क्या बात करू
मैं परछाई भी दुश्मन है
राहे हो गई अंगारों सी
आग में जलता जीवन है
हाथ धरो मेरे सिर के ऊपर
शीतल सी छाया करदो
हो जाए दुःख दूर हमारे
तुम ऐसी माया करदो
करू तुम्हारी चरण वंदना
कष्ट हमारे विदा करो
द्वार खड़ी शनी देव तुम्हारे .....

कब काटो गी देव हमारी
किस्मत की जनजीरो को
रंग दो खुशियों से हाथो की
इन बेरंग लकीरों को
नया करा है न्याए देवता
दर दर की ठुकराई हूँ
नये मिलेगा यही सोच के
द्वार तुम्हारे आई हूँ
करू तुम्हारी चरण वंदना
कष्ट हमारे विदा करो
द्वार खड़ी शनी देव तुम्हारे .....

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन भक्त और भगवान के बीच के उस आत्मीय संबंध को उजागर करता है जहां भक्त अपने अहंकार को त्यागकर पूर्णतः ईश्वर के अधीन हो जाता है। भजन के प्रथम भाग में भक्त कहता है कि हे शनि देव! मैं आपके द्वार पर आकर खड़ी हूँ। मुझ पर अपनी कृपा और दया दृष्टि कीजिए। मैं आपके पावन चरणों की वंदना करती हूँ, आप मेरे जीवन के समस्त कष्टों और संतापों को दूर कर दीजिए।

भजन का केंद्रीय भाव यह है कि शनि देव सर्वव्यापी और सर्वज्ञ हैं। वे मनुष्य के अंतर्मन की हर पीड़ा और उसके संचित कर्मों से भली-भांति परिचित हैं। भक्त कहता है कि "तुम्हें मालूम सब कुछ है", अर्थात मुझे अपनी व्यथा विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आप तो अंतर्यामी हैं। जब संसार में कोई सहारा नहीं बचता और चारों ओर से दुखों का अंधकार घेर लेता है, तब केवल ईश्वर का ही आश्रय शेष रहता है। भक्त अपनी लाचारी और विवशता को स्वीकार करते हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करता है।

आगे के अंतरे में संसार की निष्ठुरता और जीवन के संघर्षों का मार्मिक चित्रण है। जब परिस्थितियां विपरीत होती हैं, तो अपनी परछाई भी साथ छोड़ देती है और जीवन की राहें अंगारों जैसी दहकती हुई प्रतीत होती हैं। ऐसे कठिन समय में भक्त शनि देव से प्रार्थना करता है कि वे अपना वरदहस्त उसके सिर पर रखें ताकि उसे शीतलता और शांति का अनुभव हो सके। अंतिम पंक्तियों में न्याय के देवता से न्याय की गुहार लगाई गई है। भक्त अपनी बेरंग किस्मत की लकीरों को खुशियों के रंगों से भरने की प्रार्थना करता है, क्योंकि उसे पूर्ण विश्वास है कि शनि देव के दरबार से कोई भी याचक खाली हाथ और निराश नहीं लौटता।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह शनि देव की आराधना का एक शक्तिशाली माध्यम है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • शरणागति का भाव: इस भजन में भक्त का शनि देव के प्रति पूर्ण समर्पण झलकता है। यह सिखाता है कि जब हम अपने अहंकार को शून्य कर देते हैं, तब दैवीय कृपा का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • कर्मफल दाता की महिमा: शनि देव को ज्योतिष शास्त्र और पुराणों में कर्मों का फल देने वाला माना गया है। यह भजन स्वीकार करता है कि हमारे कष्ट हमारे ही पूर्व कर्मों का परिणाम हैं और उनसे मुक्ति केवल शनि देव की दया से ही संभव है।
  • मानसिक शांति का प्रदाता: इस भजन के शब्द और इसकी लय अत्यंत शांत और गंभीर हैं, जो अशांत मन को स्थिरता प्रदान करते हैं।
  • क्षमा याचना की महत्ता: भजन में "छमा करो अप्राद मेरे" कहकर भक्त अपने अनजाने में किए गए पापों के लिए प्रायश्चित करता है, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

शनि देव की पूजा और आराधना के कुछ विशेष नियम और समय निर्धारित हैं। इस भजन का अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाई जा सकती है:

  • सर्वोत्तम दिन और समय: यह भजन विशेष रूप से शनिवार के दिन गाया या सुना जाना चाहिए। शनिवार की संध्या (सूर्यास्त के बाद) का समय शनि देव की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  • पूजा की तैयारी: शनिवार की शाम को स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो नीले या काले रंग के) धारण करें। घर के मंदिर में या पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करें।
  • गायन की विधि: दीपक के समक्ष बैठकर शांत चित्त से इस भजन का पाठ या गायन करें। गायन के समय मन में शनि देव के सौम्य और कृपालु रूप का ध्यान करें।
  • भोग और प्रसाद: भजन के पश्चात शनि देव को काली उड़द, काले तिल या बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं और उसे प्रसाद के रूप में वितरित करें।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity & Spiritual Context

यह भजन मुख्य रूप से भगवान शनि देव को समर्पित है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, शनि देव सूर्य देव और देवी छाया के पुत्र हैं। वे न्याय के अधिपति और दंडाधिकारी हैं। उनका वाहन गिद्ध, कौआ या भैंसा है और वे हाथ में धनुष-बाण या त्रिशूल धारण करते हैं।

शनि देव के साथ-साथ इस भजन का संबंध अप्रत्यक्ष रूप से भगवान शिव और भगवान हनुमान से भी है। शनि देव भगवान शिव के परम शिष्य हैं और उन्होंने शिव जी की घोर तपस्या करके ही नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान और न्याय का अधिकार प्राप्त किया था। वहीं दूसरी ओर, हनुमान जी के भक्तों पर शनि देव कभी अपनी क्रूर दृष्टि नहीं डालते। इसलिए, इस भजन के साथ-साथ श्री हनुमान चालीसा का पाठ करना भी अत्यंत फलदायी माना जाता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

"द्वार खड़ी शनी देव तुम्हारे" एक पारंपरिक और लोक-प्रचलित भजन है। इसकी रचना किसी विशिष्ट आधुनिक कवि द्वारा नहीं बल्कि लोक-भक्ति परंपरा के अंतर्गत हुई है। यह भजन उत्तर भारत के मंदिरों और घरों में दशकों से गाया जा रहा है। इसकी पृष्ठभूमि मानव जीवन के संघर्षों और उन संघर्षों से मुक्ति पाने के लिए ईश्वर की शरण में जाने की शाश्वत मानवीय प्रवृत्ति पर आधारित है। जब भी कोई व्यक्ति साढ़ेसाती, ढैय्या या शनि की महादशा से पीड़ित होता है, तो यह भजन उसके लिए एक संबल और आशा की किरण बनकर उभरता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें आत्मीयता और करुणा का पुट है। इसकी काव्य शैली अत्यंत प्रवाहमयी और संगीतमय है।

  • बिंब और रूपक: भजन में "राहे हो गई अंगारों सी" और "किस्मत की जंजीरों" जैसे सुंदर रूपकों का प्रयोग किया गया है, जो जीवन की कठिनाइयों को सजीव रूप से प्रस्तुत करते हैं।
  • लयबद्धता: प्रत्येक अंतरे के बाद "करू तुम्हारी चरण वंदना कष्ट हमारे विदा करो" की पुनरावृत्ति भजन को एक सुंदर लय और गेयता प्रदान करती है।
  • भाव प्रवणता: शब्दों का चयन इस प्रकार किया गया है कि वे सीधे सुनने वाले के हृदय को स्पर्श करते हैं और आंखों में अश्रु ला देते हैं, जो कि सच्ची भक्ति का लक्षण है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पाठ सिखाता है:

  1. कर्मों की स्वीकार्यता: यह हमें सिखाता है कि हमारे जीवन में आने वाले सुख-दुख हमारे ही कर्मों का प्रतिफल हैं। हमें अपनी परिस्थितियों के लिए दूसरों को दोष देने के बजाय अपने कर्मों का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए।
  2. धैर्य और विश्वास: कठिन से कठिन समय में भी ईश्वर पर अटूट विश्वास बनाए रखना चाहिए। "न्याय मिलेगा यही सोच के द्वार तुम्हारे आई हूँ" यह पंक्ति दर्शाती है कि ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं।
  3. अहंकार का त्याग: जब हम भगवान के सामने अपनी लाचारी स्वीकार करते हैं, तो यह हमारी कमजोरी नहीं बल्कि हमारे अहंकार का अंत होता है। अहंकार के अंत से ही वास्तविक ज्ञान और शांति की प्राप्ति होती है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ भजन के संदर्भ में महत्व
चरण वंदना पैरों की पूजा या प्रणाम करना ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और आदर का भाव।
लाचार विवश या असहाय संसार की माया के सामने मनुष्य की सीमाएं।
अपराध (अप्राद) गलतियां या पाप कर्म अपने ज्ञात-अज्ञात पापों के लिए क्षमा की याचना।
अंगारों सी राहें अत्यंत कठिन और कष्टदायक परिस्थितियां जीवन के संघर्षों और दुखों का प्रतीक।
न्याय देवता इंसाफ करने वाले देव (शनि देव) शनि देव का वह स्वरूप जो निष्पक्ष होकर फल देते हैं।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"द्वार खड़ी शनी देव तुम्हारे, किरपा करो शनि दया करो..."
भक्त कहता है कि हे शनि देव, मैं सब कुछ छोड़कर आपके द्वार पर शरण लेने आई हूँ। अब आप ही मेरी रक्षा कर सकते हैं, मुझ पर अपनी दया और कृपा बरसाइए।

"तुम्हे मालुम सभी कुछ घेर खड़े है गम कितने..."
हे प्रभु, आप तो अंतर्यामी हैं, आपसे कुछ भी छुपा नहीं है। मेरे जीवन में जितने भी दुख और गम हैं, उन सबके बारे में आप जानते हैं। मैं आपके सामने अत्यंत असहाय हूँ और अपनी व्यथा आपसे कह रही हूँ।

"दुनिया की क्या बात करूं मैं परछाई भी दुश्मन है..."
इस मतलबी दुनिया में जब बुरा वक्त आता है, तो अपने भी साथ छोड़ देते हैं। यहां तक कि खुद की परछाई भी साथ नहीं देती। मेरा जीवन दुखों की आग में जल रहा है, आप ही मुझे शांति प्रदान करें।

"कब काटोगे देव हमारी किस्मत की जंजीरों को..."
हे न्यायकारी देव, मेरे प्रारब्ध के बंधनों और किस्मत की बेड़ियों को आप कब काटेंगे? मेरी सूनी और बेरंग जिंदगी में खुशियों के रंग भर दीजिए। मैं इसी विश्वास के साथ आपके पास आई हूँ कि मुझे यहां न्याय अवश्य मिलेगा।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन के पूर्व या पश्चात शनि देव के इन सिद्ध मंत्रों का जाप करने से भजन का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है:

॥ शनि महामंत्र ॥

ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥

मंत्र का अर्थ: जो नीले पर्वत के समान कांतिमान हैं, सूर्य देव के पुत्र हैं, यमराज के बड़े भाई हैं और देवी छाया व सूर्य के संयोग से उत्पन्न हुए हैं, उन मंद गति से चलने वाले शनि देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम द्वार खड़ी शनी देव तुम्हारे (Dwar Khadi Shani Dev Tumhare)
समर्पित देवता भगवान श्री शनि देव जी
मुख्य भाव करुणा, शरणागति, विनय और क्षमा याचना
भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
गायन का उत्तम दिन शनिवार (Saturday)
उत्तम समय संध्या काल (सूर्यास्त के बाद)
संबंधित पाठ श्री शनि चालीसा, श्री शनिदेव की आरती

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य उद्देश्य शनि देव के प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्त करना, अपने पापों के लिए क्षमा मांगना और जीवन के कष्टों से मुक्ति के लिए उनकी दया की याचना करना है।

हाँ, इस भजन को महिलाएं और पुरुष दोनों ही पूर्ण श्रद्धा भाव से गा सकते हैं। भक्ति में लिंग का कोई भेद नहीं होता।

शनि देव की पूजा और इस भजन के गायन के समय सरसों के तेल या तिल के तेल का दीपक जलाना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शनिवार को श्रद्धापूर्वक शनि देव के भजनों और मंत्रों का श्रवण करने से शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्टों में कमी आती है और मानसिक शांति मिलती है।

शनि देव की पूजा और भजन करते समय पश्चिम दिशा की ओर मुख करना सर्वोत्तम माना जाता है, क्योंकि पश्चिम दिशा के स्वामी शनि देव हैं।

शास्त्रों के अनुसार, घर के मंदिर में शनि देव की मूर्ति स्थापित नहीं करनी चाहिए। आप उनके प्रतीक रूप में उनका चित्र रख सकते हैं या घर के बाहर किसी मंदिर में जाकर उनकी पूजा कर सकते हैं।

इस पंक्ति का अर्थ है कि जीवन का मार्ग अत्यंत कठिन, चुनौतीपूर्ण और दुखों से भरा हो गया है, जहां हर कदम पर संघर्ष करना पड़ रहा है।

इस भजन के साथ-साथ शनिवार को गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करना, काले तिल का दान करना और पशु-पक्षियों (विशेषकर कौए और काले कुत्ते) को भोजन कराना अत्यंत फलदायी होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और इसके भावार्थ को विभिन्न प्रामाणिक धार्मिक स्रोतों, पौराणिक ग्रंथों और लोक परंपराओं के मिलान के बाद तैयार किया गया है ताकि पाठकों को शुद्ध और सटीक जानकारी प्राप्त हो सके। शनि देव की आराधना में शुद्धता और श्रद्धा का विशेष महत्व है, और यह मार्गदर्शिका उसी भक्ति भाव को समर्पित है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • स्कंद पुराण - काशी खंड (शनि देव की उत्पत्ति एवं महिमा)
  • पद्म पुराण - शनि स्तोत्र एवं महात्म्य
  • पारंपरिक लोक भजन संग्रह एवं सनातन धर्म ग्रंथ

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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