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तृतीया तिथि पर माँ चन्द्रघंटा की उपासना विधि | Worship Method of Goddess Chandraghanta on Tritiya Tithi

152 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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प्रस्तावना एवं परिचय

सम्पूर्ण मूल पाठ एवं पवित्र श्लोक

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

सम्पूर्ण पाठ विधि, नियम, शुभ मुहूर्त एवं सावधानियां

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

तृतीया तिथि पर विशेष (Worship on Tritiya Tithi)

दुर्गा के तीसरे स्वरूप की आराधना का विधान

🌟 तृतीया तिथि और माँ चन्द्रघंटा का महत्व

नवरात्रि के तीसरे दिन तृतीया तिथि पर माँ चन्द्रघंटा की पूजा का विधान है। यह देवी दुर्गा का तीसरा स्वरूप हैं। इनके मस्तक पर अर्धचन्द्राकार घंटा होने के कारण इन्हें 'चन्द्रघंटा' कहा गया है। यह स्वरूप शांति, साहस और आंतरिक शक्ति का प्रतीक है।

शास्त्रों के अनुसार, माँ चन्द्रघंटा की उपासना से साधक के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, मन में स्थिरता आती है और अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। यह स्वरूप अपने भक्तों को सदा सुरक्षा प्रदान करने वाला है।

🔱 माँ चन्द्रघंटा का स्वरूप (Divine Form)

माँ चन्द्रघंटा का स्वरूप अत्यंत दिव्य और तेजस्वी है। इनकी उपासना से साधक में अपार साहस और शक्ति का संचार होता है:

  • मस्तक पर अर्धचन्द्र: इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचन्द्र सुशोभित है, जो शीतलता और शांति का प्रतीक है।
  • दस हाथ: माँ चन्द्रघंटा के दस हाथ हैं, जिनमें वे विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं।
  • सिंह वाहिनी: यह देवी सिंह पर आरूढ़ हैं, जो साहस, शौर्य और पराक्रम का प्रतीक है।
  • स्वर्णिम कांति: इनका शरीर स्वर्ण के समान कांतिमान है, जो ऊर्जा और तेज का प्रतिनिधित्व करता है।
🔱

माँ चन्द्रघंटा
सिंह वाहिनी

📅 तृतीया तिथि का आध्यात्मिक महत्व

नवरात्रि की तृतीया तिथि का अपना विशिष्ट स्थान है। यह तिथि साधक को स्थिरता और शक्ति प्रदान करने वाली मानी जाती है:

✨ तृतीया तिथि की विशेषताएँ

  • मन और बुद्धि को स्थिर करने वाली तिथि
  • शत्रुओं पर विजय प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ
  • आंतरिक शक्ति का विकास करने वाली
  • संकल्प शक्ति को दृढ़ करने वाली

🌺 इस दिन की उपासना का फल

  • रोगों से मुक्ति और आरोग्य लाभ
  • भय और बाधाओं का नाश
  • मानसिक शांति और आनंद की प्राप्ति
  • सभी प्रकार के ग्रह दोषों से मुक्ति

🪔 माँ चन्द्रघंटा की पूजा विधि (Step-by-Step)

1

प्रातः स्नान और वस्त्र

प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा के लिए पीले या सफेद वस्त्र उत्तम माने गए हैं।

2

स्थापना और आसन

पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके चौकी पर माँ चन्द्रघंटा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। लाल या पीला आसन बिछाएं।

3

संकल्प

जल, अक्षत, फूल लेकर संकल्प करें - 'मैं माँ चन्द्रघंटा की पूजा कर रहा हूँ।'

4

आवाहन, आसन, अर्घ्य

माँ का आवाहन करें, आसन अर्पित करें, पाद्य, अर्घ्य, आचमन से देवी का स्वागत करें।

5

षोडशोपचार पूजा

गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल, दक्षिणा आदि 16 उपचारों से पूजा करें।

6

मंत्र जाप और स्तुति

माँ चन्द्रघंटा के मंत्रों का जाप करें और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।

7

आरती और प्रार्थना

देवी की आरती करें और अपनी मनोकामना के साथ प्रार्थना करें।

🕉️ माँ चन्द्रघंटा के मंत्र और स्तोत्र

✨ बीज मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।

ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः।

🙏 ध्यान मंत्र

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढां चन्द्रघण्टां यशस्वनीम्॥

🔱 कवच

चन्द्रघण्टेति मन्त्रेण कवचं पठतेत् यः।
सर्वबाधाविनिर्मुक्तः सुखमेति न संशयः॥

तृतीया तिथि पर इन मंत्रों का विशेष जाप करने से माँ चन्द्रघंटा प्रसन्न होती हैं और साधक की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

🌸 आवश्यक पूजा सामग्री (Worship Items)

  • 🔸 माँ चन्द्रघंटा की प्रतिमा या चित्र
  • 🔸 लाल या पीला वस्त्र
  • 🔸 चौकी और आसन
  • 🔸 गंगाजल या शुद्ध जल
  • 🔸 रोली, कुमकुम, हल्दी
  • 🔸 अक्षत (चावल)
  • 🔸 पुष्प (विशेषकर गुलाब, गेंदा)
  • 🔸 धूप, दीप, कपूर
  • 🔸 नैवेद्य (मिष्ठान्न, फल)
  • 🔸 पान, सुपारी, लौंग
  • 🔸 दक्षिणा
  • 🔸 दुर्गा सप्तशती की पुस्तक

🍯 भोग प्रसाद (Offerings)

माँ चन्द्रघंटा को शुद्ध शाकाहारी भोग अर्पित किया जाता है। इन्हें विशेष रूप से दूध से बने व्यंजन, खीर, मिष्ठान्न, फल और शहद अर्पित करना अत्यंत प्रिय है।

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दूध और खीर

🍯

शहद

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फल

भोग अर्पित करने के बाद प्रसाद सभी भक्तों में वितरित करें। प्रसाद ग्रहण करने से मन की शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।

📖 पौराणिक कथा: माँ चन्द्रघंटा का प्रादुर्भाव

पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध करने का संकल्प लिया, तब उनके मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाली देवी का प्रादुर्भाव हुआ। यह स्वरूप चन्द्रघंटा के नाम से विख्यात हुआ।

इस रूप में देवी ने महिषासुर के सेनापतियों का संहार किया। कहा जाता है कि इस युद्ध में देवी की घंटा की ध्वनि से समस्त असुर सेना भयभीत हो गई थी।

इस कथा से ज्ञात होता है कि माँ चन्द्रघंटा की उपासना से साधक को भय से मुक्ति मिलती है और वह सभी प्रकार के शत्रुओं और बाधाओं पर विजय प्राप्त करता है।

🔔

घंटा की ध्वनि
भय का नाश

✨ माँ चन्द्रघंटा की उपासना के लाभ (Benefits)

  • ✅ भय से मुक्ति: सभी प्रकार के भय का नाश होता है।
  • ✅ शारीरिक शक्ति: शरीर में ऊर्जा और स्फूर्ति का संचार होता है।
  • ✅ मानसिक शांति: मन में स्थिरता और शांति प्राप्त होती है।
  • ✅ शत्रु नाश: शत्रुओं और विघ्नों का नाश होता है।
  • ✅ आरोग्य लाभ: रोगों से मुक्ति और दीर्घायु प्राप्ति।
  • ✅ ग्रह दोष निवारण: चंद्र और मंगल दोष से मुक्ति।
  • ✅ आध्यात्मिक उन्नति: साधना में तीव्र गति मिलती है।
  • ✅ मनोकामना सिद्धि: सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

❓ माँ चन्द्रघंटा उपासना से जुड़े प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: क्या माँ चन्द्रघंटा की पूजा केवल नवरात्रि में ही कर सकते हैं?

उत्तर: नहीं, माँ चन्द्रघंटा की उपासना किसी भी तिथि पर की जा सकती है। तृतीया तिथि विशेष रूप से शुभ मानी जाती है।

प्रश्न 2: माँ चन्द्रघंटा को कौन सा रंग प्रिय है?

उत्तर: माँ चन्द्रघंटा को पीला और नारंगी रंग अत्यंत प्रिय है। पूजा में इन रंगों के वस्त्र और पुष्प अर्पित करने चाहिए।

प्रश्न 3: क्या माँ चन्द्रघंटा की पूजा में किसी विशेष मंत्र का जाप आवश्यक है?

उत्तर: बीज मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' का जाप उत्तम है। साथ ही दुर्गा चालीसा का पाठ भी लाभकारी है।

प्रश्न 4: माँ चन्द्रघंटा की पूजा का सबसे उत्तम समय क्या है?

उत्तर: प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। यदि संभव हो तो तृतीया तिथि के दिन ब्रह्म मुहूर्त में पूजा करें।

प्रश्न 5: क्या माँ चन्द्रघंटा की पूजा से ग्रह दोष दूर होते हैं?

उत्तर: हाँ, माँ चन्द्रघंटा की उपासना से चंद्र और मंगल ग्रह के दोष शांत होते हैं और जीवन में स्थिरता आती है।

📝 तृतीया तिथि पर माँ चन्द्रघंटा की उपासना

तृतीया तिथि पर माँ चन्द्रघंटा की उपासना साधक को शक्ति, साहस और आंतरिक शांति प्रदान करती है। यह देवी का वह स्वरूप है जो अपने भक्तों को सभी प्रकार के भय से मुक्त करता है और जीवन में स्थिरता लाता है।

शास्त्रों में वर्णित विधि-विधान से की गई पूजा साधक को अभीष्ट फल प्रदान करती है। विशेष रूप से नवरात्रि के तीसरे दिन की गई आराधना अत्यंत फलदायी मानी गई है।

इस तिथि पर माँ चन्द्रघंटा की भक्ति भाव से उपासना करें, उनके मंत्रों का जाप करें और उनकी कृपा से अपने जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति प्राप्त करें।

🙏 ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः ।। जय माँ चन्द्रघंटा ।।

🙏 तृतीया तिथि पर माँ चन्द्रघंटा की उपासना
शक्ति, साहस और स्थिरता प्रदान करने वाली देवी
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "तृतीया तिथि पर माँ चन्द्रघंटा की उपासना विधि | Worship Method of Goddess Chandraghanta on Tritiya Tithi" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

श्रेणियां: Spritual Puja Vidhi

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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