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ना मन हूँ, ना बुद्धि, ना चित्त अहंकार (जगत चेतना हूँ) शिव भजन लिरिक्स | Na Man Hun Na Buddhi Na Chitt Ahankar Jagat Chetna Hun Shiv Bhajan Lyrics

151 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Chandan Sah
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प्रस्तावना एवं परिचय

सम्पूर्ण मूल पाठ एवं पवित्र श्लोक

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

🙏 ना मन हूँ, ना बुद्धि, ना चित्त अहंकार

भगवान शिव की महिमा, लिंगोत्पत्ति और पवित्र तीर्थों के विवरण के लिए शिव पुराण का संपूर्ण अध्ययन करें।

(जगत चेतना हूँ – Na Man Hun Na Buddhi Na Chitt Ahankar) – शिव भजन / आत्म ज्ञान गीत

🕉️ निराकार, निर्विकल्प, चैतन्य रूप – अनादि अनंता चेतना

विवरण एवं मुख्य बिंदु

🏷️ श्रेणी:शिव भजन / आत्मबोध / अद्वैत गीत
🎶 भाव:निर्लिप्तता, चैतन्य, अनादि अनंतता
📍 विशेषता:शिव को साक्षी चेतना के रूप में स्थापित करने वाला अद्भुत गीत
📀 प्रचलन:शिव भक्तों, आध्यात्मिक साधकों और ज्ञान मार्गियों में अत्यंत प्रिय, ध्यान एवं चिंतन के लिए उपयुक्त

📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)

ना मन हूँ, ना बुद्धि, ना चित्त अहंकार
ना जिह्वा, नयन नासिका कर्णद्वार
ना मन हूँ, ना बुद्धि, ना चित्त अहंकार
ना जिह्वा, नयन नासिका कर्णद्वार
ना चलता, ना रुकता, ना कहता, ना सुनता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता

॥ अंतरा १ – प्राण, वायु, घृणा, लगाव से परे ॥

ना मैं प्राण हूँ, ना ही हूँ पंचवायु
ना मुझमें घृणा, ना कोई लगाव
ना लोभ, मोह, ईर्ष्या, ना अभिमान भाव
धनधर्म काम मोक्ष, सब अप्रभाव
मैं धनराग, गुणदोष, विषय परियंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता

॥ अंतरा २ – पुण्य-पाप, मंत्र-ज्ञान, भोग-भोक्ता से परे ॥

मैं पुण्य ना पाप, सुख दुःख से विलग हूँ
ना मंत्र, ना ज्ञान, ना तीर्थ और यज्ञ हूँ
ना भोग हूँ, ना भोजन, ना अनुभव, ना भोक्ता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता

॥ अंतरा ३ – मृत्यु, मतभेद, जन्म-पिता-माता से परे ॥

ना मृत्यु का भय है, ना मतभेद जाना
ना मेरा पिता माता, मैं हूँ अजन्मा
निराकार, साकार शिव सिद्ध संता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता

॥ अंतरा ४ – निर्लिप्त, निर्विकल्प, सूक्ष्म जगत ॥

मैं निरलिप्त, निरविकल्प सूक्ष्म जगत हूँ
हूँ चैतन्य रूप और सर्वत्र व्याप्त हूँ
मैं हूँ भी नहीं और कण-कण रमंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता

॥ अंतरा ५ – भौतिक चराचर, ममता, नश्वरता से परे ॥

ये भौतिक चराचर, ये जगमग अँधेरा
ये उसका, ये इसका, ये तेरा, ये मेरा
ये आना, ये जाना, लगाना है फेरा
ये नश्वर, जगत थोड़े दिन का है डेरा
ये प्रश्नों में उत्तर, हुनिहित दिगंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता

ना मन हूँ, ना बुद्धि, ना चित्त अहंकार
ना जिह्वा, नयन नासिका कर्णद्वार
ना चलता, ना रुकता, ना कहता, ना सुनता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता

🎵 रचनाकार : लोक परम्परा / अद्वैत वेदांत गीत

🙏 भजन का अर्थ और संदेश – जगत चेतना का साक्षात्कार

यह अद्वैत भावना से ओतप्रोत शिव भजन है जो निर्गुण ब्रह्म – “जगत चेतना” – के स्वरूप का वर्णन करता है। यह गीत “नेति-नेति” (इतना नहीं, इतना नहीं) की परम्परा में है, जहाँ साधक सभी नाम-रूपों, इन्द्रियों, मन-बुद्धि-अहंकार, प्राणों, वायुओं, भावनाओं (लोभ, मोह, ईर्ष्या, अभिमान) और यहाँ तक कि पुण्य-पाप, सुख-दुःख, मंत्र-ज्ञान-तीर्थ-यज्ञ, भोग-भोक्ता – सबसे अपने को अलग कहता है।

“जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता” – यह मूल मंत्र है। यह चेतना संपूर्ण जगत का आधार है, अनादि (जिसका आदि न हो) और अनंत (जिसका अंत न हो)। यह निराकार भी है और साकार भी – शिव का सिद्ध स्वरूप।

गीत के मध्य में भौतिक जगत की असारता को दिखाया गया है – “ये उसका, ये इसका, ये तेरा, ये मेरा” – सब मोह है, सब नश्वर है। “ये प्रश्नों में उत्तर” – यह संसार रूपी पहेली है, जिसका उत्तर केवल चेतना ही है।

यह भजन साधक को अपने सच्चे स्वरूप – शुद्ध चेतना – का बोध कराता है। यह शिव को केवल देवता के रूप में नहीं, बल्कि साक्षी चैतन्य, सर्वव्यापी, निर्विकल्प ब्रह्म के रूप में प्रस्तुत करता है।

🔍 भजन का विशेष महत्त्व

अद्वैत वेदांत का सरल रूपांतरण: यह गीत शंकराचार्य के “मनो बुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं” (मैं मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त नहीं हूँ) जैसे निर्वाण षटकम् का सहज और भक्तिपूर्ण संस्करण है।

ध्यान और चिंतन के लिए उपयुक्त: इस भजन को ध्यान में, योग साधना में और शिवरात्रि के जागरण में गाया जा सकता है। हर पंक्ति “जगत चेतना हूँ” के साथ समाप्त होती है, जो साधक को अपने मूल स्वरूप में स्थापित करती है।

निराकार ब्रह्म की भक्ति: यह गीत शिव के सगुण रूप से हटकर उनके निर्गुण, साक्षी स्वरूप को समर्पित है। यह उन्नत भक्तों और ज्ञान मार्गियों को अत्यंत प्रिय है।

💖 चैतन्य की अनुभूति

🎯 संदेश

आप वह शरीर, मन, बुद्धि या भावनाएँ नहीं हैं – आप शुद्ध चेतना हैं, जो सबमें व्याप्त है और सबसे परे है। इस अहसास से ही सच्ची शांति और मुक्ति मिलती है।

✨ आस्था का प्रतीक

यह भजन हमें याद दिलाता है कि शिव केवल त्रिपुंड या त्रिशूल में ही नहीं, बल्कि हमारी अपनी चेतना के रूप में सदा विराजमान हैं। “जगत चेतना” का अनुभव ही सच्ची शिव भक्ति है।

🕉️ ॐ नमः शिवाय ।। जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता ।। हर हर महादेव ।।

॥ इति शिव चैतन्य भजनम् ॥
॥ ना मन हूँ, ना बुद्धि, ना चित्त अहंकार – जगत चेतना हूँ अनादि अनंता ॥
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

देवादिदेव महादेव को समर्पित यह भजन "ना मन हूँ, ना बुद्धि, ना चित्त अहंकार (जगत चेतना हूँ) शिव भजन लिरिक्स | Na Man Hun Na Buddhi Na Chitt Ahankar Jagat Chetna Hun Shiv Bhajan Lyrics" भगवान शिव के कल्याणकारी और वैराग्यपूर्ण रूप का सजीव चित्रण करता है। शिव का अर्थ ही कल्याण है। इस भजन के शब्दों के माध्यम से साधक शिव की अनंत चेतना, भस्म आरती, डमरू की ध्वनि और ध्यानमग्न मुद्रा का ध्यान करता है।

शिव भक्ति का मूल सिद्धांत यही है कि जगत की प्रत्येक नश्वर वस्तु का अंत शिव में ही होना है। यह भजन भक्त को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है। शिव का नाम पंचमहाभूतों को नियंत्रित करने वाली परम शक्ति का प्रतीक है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव अत्यंत भोले हैं और साधारण जल तथा बेलपत्र अर्पण करने मात्र से भी प्रसन्न हो जाते हैं। इस शिव भजन का संकीर्तन करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और कुंडली के ग्रहों के दोष शांत होते हैं।

भगवान शिव की महिमा, लिंगोत्पत्ति और पवित्र तीर्थों के विवरण के लिए शिव पुराण का संपूर्ण अध्ययन करें। नियमित शिव भजन और पंचाक्षरी मंत्र (ॐ नमः शिवाय) के जप से तनाव का नाश होता है, अवसाद दूर होता है और अंतर्मन में अपूर्व शांति का उदय होता है। यह आरोग्य और दीर्घायु प्रदान करने में भी सहायक है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

शिव संकीर्तन के लिए प्रदोष काल (संध्या समय) अथवा सोमवार का दिन सर्वोत्तम माना जाता है। उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशासन पर बैठकर शिवजी का ध्यान करते हुए भजन गाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भगवान शिव को शीघ्र प्रसन्न करने की सरल विधि क्या है?

शुद्ध जल, बेलपत्र, धतूरा अर्पित करते हुए श्रद्धापूर्वक शिव मंत्र अथवा भजनों का संकीर्तन करने से महादेव शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

शिव भजनों के लिए कौन सा दिन विशेष है?

सोमवार, प्रदोष व्रत की तिथि और महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव की उपासना और भजन संकीर्तन के लिए विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।

क्या शिव जी की उपासना से कुंडली के दोष दूर होते हैं?

हाँ, भगवान शिव (महाकाल) की आराधना से कालसर्प दोष, राहु-केतु दोष और शनि जनित कष्टों का निवारण होता है।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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