🙏 ना मन हूँ, ना बुद्धि, ना चित्त अहंकार
भगवान शिव की महिमा, लिंगोत्पत्ति और पवित्र तीर्थों के विवरण के लिए शिव पुराण का संपूर्ण अध्ययन करें।
(जगत चेतना हूँ – Na Man Hun Na Buddhi Na Chitt Ahankar) – शिव भजन / आत्म ज्ञान गीत
📝 भजन विवरण
📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)
ना मन हूँ, ना बुद्धि, ना चित्त अहंकार
ना जिह्वा, नयन नासिका कर्णद्वार
ना मन हूँ, ना बुद्धि, ना चित्त अहंकार
ना जिह्वा, नयन नासिका कर्णद्वार
ना चलता, ना रुकता, ना कहता, ना सुनता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
॥ अंतरा १ – प्राण, वायु, घृणा, लगाव से परे ॥
ना मैं प्राण हूँ, ना ही हूँ पंचवायु
ना मुझमें घृणा, ना कोई लगाव
ना लोभ, मोह, ईर्ष्या, ना अभिमान भाव
धनधर्म काम मोक्ष, सब अप्रभाव
मैं धनराग, गुणदोष, विषय परियंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
॥ अंतरा २ – पुण्य-पाप, मंत्र-ज्ञान, भोग-भोक्ता से परे ॥
मैं पुण्य ना पाप, सुख दुःख से विलग हूँ
ना मंत्र, ना ज्ञान, ना तीर्थ और यज्ञ हूँ
ना भोग हूँ, ना भोजन, ना अनुभव, ना भोक्ता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
॥ अंतरा ३ – मृत्यु, मतभेद, जन्म-पिता-माता से परे ॥
ना मृत्यु का भय है, ना मतभेद जाना
ना मेरा पिता माता, मैं हूँ अजन्मा
निराकार, साकार शिव सिद्ध संता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
॥ अंतरा ४ – निर्लिप्त, निर्विकल्प, सूक्ष्म जगत ॥
मैं निरलिप्त, निरविकल्प सूक्ष्म जगत हूँ
हूँ चैतन्य रूप और सर्वत्र व्याप्त हूँ
मैं हूँ भी नहीं और कण-कण रमंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
॥ अंतरा ५ – भौतिक चराचर, ममता, नश्वरता से परे ॥
ये भौतिक चराचर, ये जगमग अँधेरा
ये उसका, ये इसका, ये तेरा, ये मेरा
ये आना, ये जाना, लगाना है फेरा
ये नश्वर, जगत थोड़े दिन का है डेरा
ये प्रश्नों में उत्तर, हुनिहित दिगंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
ना मन हूँ, ना बुद्धि, ना चित्त अहंकार
ना जिह्वा, नयन नासिका कर्णद्वार
ना चलता, ना रुकता, ना कहता, ना सुनता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता
🎵 रचनाकार : लोक परम्परा / अद्वैत वेदांत गीत
🙏 भजन का अर्थ और संदेश – जगत चेतना का साक्षात्कार
यह अद्वैत भावना से ओतप्रोत शिव भजन है जो निर्गुण ब्रह्म – “जगत चेतना” – के स्वरूप का वर्णन करता है। यह गीत “नेति-नेति” (इतना नहीं, इतना नहीं) की परम्परा में है, जहाँ साधक सभी नाम-रूपों, इन्द्रियों, मन-बुद्धि-अहंकार, प्राणों, वायुओं, भावनाओं (लोभ, मोह, ईर्ष्या, अभिमान) और यहाँ तक कि पुण्य-पाप, सुख-दुःख, मंत्र-ज्ञान-तीर्थ-यज्ञ, भोग-भोक्ता – सबसे अपने को अलग कहता है।
“जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता” – यह मूल मंत्र है। यह चेतना संपूर्ण जगत का आधार है, अनादि (जिसका आदि न हो) और अनंत (जिसका अंत न हो)। यह निराकार भी है और साकार भी – शिव का सिद्ध स्वरूप।
गीत के मध्य में भौतिक जगत की असारता को दिखाया गया है – “ये उसका, ये इसका, ये तेरा, ये मेरा” – सब मोह है, सब नश्वर है। “ये प्रश्नों में उत्तर” – यह संसार रूपी पहेली है, जिसका उत्तर केवल चेतना ही है।
यह भजन साधक को अपने सच्चे स्वरूप – शुद्ध चेतना – का बोध कराता है। यह शिव को केवल देवता के रूप में नहीं, बल्कि साक्षी चैतन्य, सर्वव्यापी, निर्विकल्प ब्रह्म के रूप में प्रस्तुत करता है।
🔍 भजन का विशेष महत्त्व
अद्वैत वेदांत का सरल रूपांतरण: यह गीत शंकराचार्य के “मनो बुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं” (मैं मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त नहीं हूँ) जैसे निर्वाण षटकम् का सहज और भक्तिपूर्ण संस्करण है।
ध्यान और चिंतन के लिए उपयुक्त: इस भजन को ध्यान में, योग साधना में और शिवरात्रि के जागरण में गाया जा सकता है। हर पंक्ति “जगत चेतना हूँ” के साथ समाप्त होती है, जो साधक को अपने मूल स्वरूप में स्थापित करती है।
निराकार ब्रह्म की भक्ति: यह गीत शिव के सगुण रूप से हटकर उनके निर्गुण, साक्षी स्वरूप को समर्पित है। यह उन्नत भक्तों और ज्ञान मार्गियों को अत्यंत प्रिय है।
💖 चैतन्य की अनुभूति
🎯 संदेश
आप वह शरीर, मन, बुद्धि या भावनाएँ नहीं हैं – आप शुद्ध चेतना हैं, जो सबमें व्याप्त है और सबसे परे है। इस अहसास से ही सच्ची शांति और मुक्ति मिलती है।
✨ आस्था का प्रतीक
यह भजन हमें याद दिलाता है कि शिव केवल त्रिपुंड या त्रिशूल में ही नहीं, बल्कि हमारी अपनी चेतना के रूप में सदा विराजमान हैं। “जगत चेतना” का अनुभव ही सच्ची शिव भक्ति है।
🕉️ ॐ नमः शिवाय ।। जगत चेतना हूँ, अनादि अनंता ।। हर हर महादेव ।।
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