स्तोत्र संग्रह (Stotram)

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्रम्: भगवान विष्णु की महिमा (60 chars)

33 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्रम् वैदिक परंपरा का एक अत्यंत पावन, प्रभावशाली और भक्ति से ओतप्रोत स्तोत्र है, जो श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध के तृतीय अध्याय में वर्णित है। यह स्तोत्र उस महान कथा से जुड़ा है जिसमें गजेन्द्र नामक दिव्य हाथी, जो पूर्व जन्म में राजा इन्द्रद्युम्न था, ग्राह (मगरमच्छ) के वश में फँसकर भगवान विष्णु की शरण में आया और उनकी स्तुति की। भगवान विष्णु ने तत्काल गरुड़ पर आरूढ़ होकर उसकी रक्षा की और उसे मोक्ष प्रदान किया। यह स्तोत्र भक्ति, शरणागति और ईश्वर की असीम करुणा का प्रतीक है। इसका नियमित पाठ भक्तों को मानसिक शांति, आत्मिक बल और संकटों से मुक्ति प्रदान करता है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जब मनुष्य अपने समस्त प्रयासों के बाद भी असहाय हो जाता है, तब ईश्वर की सच्ची शरणागति ही एकमात्र उपाय है।

मूल संस्कृत श्लोक / पावन पाठ

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
गजेन्द्रोऽपि तदा दीनः शङ्खचक्रगदाधरम्।
आह्वयत् पुरुषं विष्णुं सर्वयज्ञेश्वरं प्रभुम्॥
त्वमेव देवताः सर्वाः सर्वभूतानि चात्मनि।
त्वमेव सर्वं पश्यामि त्वं हि सर्वस्य कारणम्॥
नमो नारायणायेति यज्ञेशाय नमो नमः।
त्वं हि सर्वस्य जगतः कारणं परमेश्वरम्॥

पदच्छेद एवं अन्वय

प्रथम श्लोक में शुक्लाम्बरधरम्, विष्णुम्, शशिवर्णम्, चतुर्भुजम्, प्रसन्नवदनम् — इन पदों का अन्वय इस प्रकार है: सर्वविघ्नोपशान्तये शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजं प्रसन्नवदनं ध्यायेत्। अर्थात् समस्त विघ्नों की शांति के लिए श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चन्द्रमा के समान कांतिवान, चार भुजाओं वाले और प्रसन्न मुख वाले विष्णु का ध्यान करना चाहिए।

द्वितीय श्लोक में गजेन्द्रः, तदा, दीनः, शङ्खचक्रगदाधरम्, आह्वयत्, पुरुषम्, विष्णुम्, सर्वयज्ञेश्वरम्, प्रभुम् — इन पदों का अन्वय है: तदा दीनः गजेन्द्रोऽपि शङ्खचक्रगदाधरं सर्वयज्ञेश्वरं पुरुषं विष्णुं प्रभुम् आह्वयत्। अर्थात् उस समय दीन अवस्था में गजेन्द्र ने शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले, समस्त यज्ञों के ईश्वर, पुरुषोत्तम विष्णु प्रभु को पुकारा।

तृतीय श्लोक में त्वम्, एव, देवताः, सर्वाः, सर्वभूतानि, आत्मनि, सर्वम्, पश्यामि, कारणम् — इन पदों का अन्वय है: त्वमेव सर्वाः देवताः, त्वमेव सर्वभूतानि आत्मनि, त्वमेव सर्वं पश्यामि, त्वं हि सर्वस्य कारणम्। अर्थात् आप ही समस्त देवता हैं, आप ही समस्त प्राणियों में आत्मरूप से स्थित हैं, मैं आपको ही सब कुछ देखता हूँ, क्योंकि आप ही समस्त जगत के कारण हैं।

चतुर्थ श्लोक में नमः, नारायणाय, इति, यज्ञेशाय, नमः नमः, त्वम्, हि, सर्वस्य, जगतः, कारणम्, परमेश्वरम् — इन पदों का अन्वय है: नारायणाय इति नमः, यज्ञेशाय नमो नमः, त्वं हि सर्वस्य जगतः कारणं परमेश्वरम्। अर्थात् नारायण को नमस्कार है, यज्ञेश्वर को बारंबार नमस्कार है, क्योंकि आप ही समस्त जगत के कारण परमेश्वर हैं।

विस्तृत शब्दार्थ

शब्द अर्थ
शुक्लाम्बरधरम्श्वेत वस्त्र धारण करने वाले
विष्णुम्सर्वव्यापक भगवान विष्णु को
शशिवर्णम्चन्द्रमा के समान कांतिवान
चतुर्भुजम्चार भुजाओं वाले
प्रसन्नवदनम्प्रसन्न मुख वाले
ध्यायेत्ध्यान करना चाहिए
सर्वविघ्नोपशान्तयेसमस्त विघ्नों की शांति के लिए
गजेन्द्रःहाथियों का राजा, गजराज
तदाउस समय
दीनःदीन, असहाय
शङ्खचक्रगदाधरम्शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले
आह्वयत्पुकारा
पुरुषम्पुरुषोत्तम को
सर्वयज्ञेश्वरम्समस्त यज्ञों के ईश्वर
प्रभुम्स्वामी को
त्वम्आप
एवही
देवताःदेवता
सर्वाःसमस्त
सर्वभूतानिसमस्त प्राणी
आत्मनिआत्मा में
पश्यामिदेखता हूँ
कारणम्कारण
नमःनमस्कार
नारायणायनारायण को
यज्ञेशाययज्ञ के ईश्वर को
जगतःजगत के
परमेश्वरम्परम ईश्वर

सरल हिंदी भावार्थ एवं व्याख्या

इस स्तोत्र का प्रारंभ भगवान विष्णु के ध्यान से होता है। भक्त कहता है कि समस्त विघ्नों और बाधाओं की शांति के लिए उसे उन प्रभु का ध्यान करना चाहिए जो श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, जिनकी कांति चन्द्रमा के समान शीतल और सौम्य है, जो चार भुजाओं वाले हैं और जिनका मुख सदैव प्रसन्न रहता है। यह ध्यान केवल बाहरी स्वरूप का नहीं, बल्कि उस परम शांति और करुणा का है जो भगवान के स्वभाव में विद्यमान है।

दूसरे श्लोक में गजेन्द्र की दशा का वर्णन है। जब गजराज मगरमच्छ के पकड़ में आकर अत्यंत दीन और असहाय हो गया, तब उसने शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु को पुकारा। यह पुकार केवल शब्द नहीं थी, बल्कि सम्पूर्ण समर्पण और विश्वास से भरी हुई आर्त पुकार थी। गजेन्द्र ने उन्हें सर्वयज्ञेश्वर और प्रभु कहकर सम्बोधित किया, जिससे यह सिद्ध होता है कि वह भगवान की सर्वोच्च सत्ता को पहचानता था।

तीसरे श्लोक में गजेन्द्र भगवान की सर्वव्यापकता का वर्णन करता है। वह कहता है कि आप ही समस्त देवता हैं, आप ही समस्त प्राणियों में आत्मरूप से विद्यमान हैं। मैं आपको ही सब कुछ देखता हूँ, क्योंकि आप ही समस्त जगत के मूल कारण हैं। यह वाक्य अद्वैत भाव का द्योतक है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच का भेद मिट जाता है और केवल एक ही सत्य शेष रहता है।

चौथे श्लोक में गजेन्द्र नारायण को नमस्कार करता है और यज्ञेश्वर को बारंबार प्रणाम करता है। वह स्वीकार करता है कि आप ही समस्त जगत के कारण और परमेश्वर हैं। इस प्रकार यह स्तोत्र शरणागति, समर्पण और भगवान की महिमा का सुंदरतम उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह हमें सिखाता है कि जब हम अपने सभी प्रयासों से थक जाएँ, तब भगवान की शरण में जाना ही सर्वोत्तम उपाय है।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का मुख्य स्रोत श्रीमद्भागवत महापुराण है, जिसे वेदव्यास जी ने रचा। अष्टम स्कंध के तृतीय अध्याय में इस स्तोत्र का वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार, पूर्व जन्म में राजा इन्द्रद्युम्न एक श्राप के कारण हाथी के रूप में जन्मे थे। उनका नाम गजेन्द्र पड़ा। एक बार वे सरोवर में स्नान कर रहे थे, तभी एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया। दोनों में हज़ारों वर्षों तक संघर्ष चला। अंत में गजेन्द्र थक गया और उसने भगवान विष्णु की शरण ली। भगवान ने तत्काल गरुड़ पर आरूढ़ होकर उसकी रक्षा की और मगरमच्छ को मारकर उसे मोक्ष प्रदान किया।

यह स्तोत्र भक्ति आंदोलन में भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। अनेक संतों और आचार्यों ने इस पर टीका लिखी है। श्रीमद्भागवत के अतिरिक्त विष्णु पुराण और अन्य पुराणों में भी इस कथा का उल्लेख मिलता है। इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से संकटों से मुक्ति, भय निवारण और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति के लिए किया जाता है।

दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का दार्शनिक महत्व अत्यंत गहन है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जीवन में जब सभी सांसारिक उपाय विफल हो जाते हैं, तब ईश्वर की शरणागति ही एकमात्र मार्ग है। गजेन्द्र का मगरमच्छ के साथ संघर्ष मनुष्य के कर्मों और संसार के बंधनों का प्रतीक है। मगरमच्छ अज्ञानता और मोह का प्रतीक है, जो जीव को बार-बार पकड़ लेता है। गजेन्द्र की पुकार आत्मा की पुकार है, जो परमात्मा से मुक्ति की याचना करती है।

यह स्तोत्र कर्म सिद्धांत को भी स्पष्ट करता है। राजा इन्द्रद्युम्न को श्राप के कारण हाथी का जन्म लेना पड़ा, जो उनके पूर्व कर्मों का फल था। लेकिन भगवान की शरण में जाने से वे मोक्ष को प्राप्त हुए। इससे यह सिद्ध होता है कि कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है, लेकिन भगवान की कृपा से उसका अंत भी हो सकता है।

ध्यान की दृष्टि से यह स्तोत्र अत्यंत गहरा है। भगवान के श्वेत वस्त्र, चन्द्रमा के समान कांति, चार भुजाएँ और प्रसन्न मुख — ये सभी ध्यान के आलंबन हैं। इनका ध्यान करने से मन शांत होता है और भक्त भगवान के स्वरूप में लीन हो जाता है। यह स्तोत्र अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत — तीनों दर्शनों की सुंदर अभिव्यक्ति है।

दैनिक जीवन में इस रचना की उपयोगिता

विद्यार्थियों के लिए

विद्यार्थियों के लिए यह स्तोत्र अत्यंत लाभकारी है। इसका नियमित पाठ करने से एकाग्रता बढ़ती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है और परीक्षा के समय मानसिक तनाव कम होता है। भगवान विष्णु की कृपा से विद्या और बुद्धि का विकास होता है।

पेशेवरों के लिए

कार्यक्षेत्र में सफलता, निर्णय क्षमता और नेतृत्व गुणों के विकास के लिए यह स्तोत्र अत्यंत उपयोगी है। इसके पाठ से मन में स्थिरता आती है और कार्यों में बाधाएँ दूर होती हैं।

मानसिक शांति के लिए

जो लोग मानसिक अशांति, चिंता और अवसाद से पीड़ित हैं, उनके लिए यह स्तोत्र रामबाण है। इसका पाठ करने से मन शांत होता है और आत्मिक बल मिलता है।

परिवार और समाज के लिए

परिवार में सुख, शांति और समृद्धि के लिए इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है। यह पारिवारिक कलह को दूर करता है और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देता है।

साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या सायंकाल संध्या के समय करना सर्वोत्तम माना जाता है। पाठ से पूर्व स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। तुलसी या पीपल के समीप बैठकर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के समक्ष दीपक प्रज्वलित करें। पाठ की संख्या ११, २१, ५१ या १०८ बार हो सकती है। तुलसी की माला से जप करना श्रेष्ठ माना जाता है। एकादशी, गुरुवार, श्रावण मास और कार्तिक मास इस स्तोत्र के पाठ के लिए विशेष शुभ हैं। नियमित पाठ से भय, रोग, शत्रु बाधा और ग्रह दोषों से मुक्ति मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न १: गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र कहाँ से लिया गया है?

यह स्तोत्र श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध के तृतीय अध्याय में वर्णित है।

प्रश्न २: इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

इसे ११, २१, ५१ या १०८ बार पढ़ा जा सकता है। श्रद्धा और भक्ति ही मुख्य है।

प्रश्न ३: क्या इस स्तोत्र का पाठ घर में कर सकते हैं?

हाँ, इसे घर में शुद्धता और श्रद्धा के साथ किया जा सकता है।

प्रश्न ४: इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?

मानसिक शांति, रोग निवारण, भय मुक्ति, संकटों से रक्षा और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

प्रश्न ५: क्या इस स्तोत्र का पाठ स्त्रियाँ कर सकती हैं?

हाँ, स्त्रियाँ भी पूर्ण श्रद्धा के साथ इसका पाठ कर सकती हैं।

प्रश्न ६: इस स्तोत्र का पाठ किस माला से करें?

तुलसी, कमलगट्टा या स्फटिक की माला से जप करना श्रेष्ठ माना जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिकता

यह लेख भक्तिलोक.इन के वैदिक शोध विभाग द्वारा तैयार किया गया है। इसमें श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और अन्य प्रामाणिक शास्त्रीय स्रोतों का संदर्भ लिया गया है। लेख के संस्कृत श्लोक मूल पाठ के अनुसार हैं और हिंदी भावार्थ शास्त्रीय टीकाओं के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक, शोधपूर्ण और आध्यात्मिक रूप से लाभकारी सामग्री प्रदान करना है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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