भक्ति रस काव्य व भजन

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी: संत रविदास जी का अमर भजन

8 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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भजन का परिचय, भाव एवं भक्ति संदर्भ

संत शिरोमणि रविदास जी महाराज द्वारा रचित 'प्रभु जी तुम चंदन हम पानी' केवल एक भजन नहीं, बल्कि जीव और परमात्मा के बीच के अद्वैत संबंध का एक उत्कृष्ट दार्शनिक दस्तावेज है। मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक, संत रविदास जी ने इस पद के माध्यम से यह संदेश दिया है कि भक्ति का अर्थ ईश्वर से अलग होकर उनकी पूजा करना नहीं, बल्कि स्वयं को ईश्वर के अस्तित्व में विलीन कर देना है।

यह भजन निर्गुण भक्ति धारा का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ भक्त अपने आराध्य को किसी विशेष रूप या मंदिर तक सीमित न रखकर, उन्हें प्रकृति के कण-कण में अनुभव करता है। इस पद में प्रयुक्त उपमाएं—चंदन-पानी, घन-मोर, दीपक-बाती, मोती-धागा—भक्त और भगवान के अटूट बंधन को दर्शाती हैं। यह रचना न केवल भक्ति की पराकाष्ठा है, बल्कि यह समानता, प्रेम और समर्पण का एक ऐसा मार्ग प्रशस्त करती है, जो आज भी प्रासंगिक है।

सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती, जाकी ज्योति बरै दिन राती।
प्रभु जी तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा।

पदवार सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक संदेश

प्रथम पद: 'प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।' यहाँ संत रविदास कहते हैं कि हे प्रभु, यदि आप चंदन हैं, तो मैं वह जल हूँ जिसमें घिसकर आप अपनी सुगंध फैलाते हैं। जिस प्रकार चंदन का गुण जल में मिलकर उसे सुगंधित कर देता है, उसी प्रकार आपकी भक्ति मेरे रोम-रोम में समा गई है।

द्वितीय पद: 'प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।' यहाँ भक्त कहता है कि आप आकाश के काले बादल हैं और मैं वह मोर हूँ जो आपको देखकर नाचता है। जैसे चकोर पक्षी निरंतर चंद्रमा को निहारता रहता है, वैसे ही मेरी दृष्टि सदैव आपके चरणों में लगी रहती है।

तृतीय पद: 'प्रभु जी तुम दीपक हम बाती, जाकी ज्योति बरै दिन राती।' यहाँ समर्पण का भाव है। दीपक के बिना बाती का कोई अस्तित्व नहीं और बाती के बिना दीपक का प्रकाश व्यर्थ है। यह अटूट संबंध दिन-रात की निरंतर भक्ति को दर्शाता है।

चतुर्थ पद: 'प्रभु जी तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।' यहाँ भक्त स्वयं को धागा मानता है जो मोती (ईश्वर) को धारण करता है। सुहागा सोने की शुद्धता बढ़ाता है, वैसे ही आपकी कृपा से मेरा जीवन शुद्ध हो गया है।

भक्ति का संदेश

यह भजन सिखाता है कि ईश्वर से जुड़ने के लिए किसी आडंबर की आवश्यकता नहीं है, केवल शुद्ध हृदय और समर्पण ही पर्याप्त है।

दार्शनिक महत्व

यह पद अद्वैतवाद की ओर संकेत करता है, जहाँ भक्त और भगवान का भेद मिटकर एक हो जाता है।

गायन समय: इस भजन को किसी भी समय गाया जा सकता है, परंतु ब्रह्म मुहूर्त या संध्या काल में इसका गायन मन को असीम शांति प्रदान करता है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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