मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् | कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ||२१||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदवेद
जानता है
अविनाशिनम्
अविनाशी
नित्यम्
नित्य
यः
जो
एनम्
इस (आत्मा) को
अजम्
अजन्मा
अव्ययम्
अव्यय
कथम्
कैसे
सः
वह
पुरुषः
पुरुष
पार्थ
हे पार्थ
कम्
किसको
घातयति
मरवाता है
हन्ति
मारता है
कम्
किसको।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! जो इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष किसको मारता है और किससे मरवाता है?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ||२१|| - श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक २१)
सनातन धर्म में आत्मा की अमरता और ब्रह्मांडीय चेतना का महानतम श्लोक
सनातन भारतीय संस्कृति, वैदिक दर्शन और विशेष रूप से श्रीमद्भगवद्गीता के अमर संदेशों में 'आत्मा' (Atman) के स्वरूप को परिभाषित करने वाले श्लोकों का अद्वितीय स्थान है। श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का इक्कीसवां (21वां) श्लोक—“वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्...”—मानव चेतना, जन्म-मृत्यु के चक्र, और कर्म के आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करने वाला एक सर्वोच्च ग्रंथ है। यह श्लोक केवल एक दार्शनिक सूत्र नहीं है, बल्कि यह भौतिकता की अंधी दौड़ में फंसे हुए मानव मन के लिए आत्मज्ञान का वह दिव्य सूर्य है, जो अज्ञान और भय के अंधकार को पूरी तरह से छिन्न-भिन्न कर देता है। भगवान श्रीकृष्ण जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को कर्तव्य और मोह के संशय से बाहर निकालते हैं, तब वे अर्जुन को यह समझाते हैं कि मनुष्य का भौतिक शरीर नश्वर है, परंतु इसके भीतर निवास करने वाली शाश्वत आत्मा अमर, अजन्मी, अविनाशी और अव्यय (क्षय रहित) है।
सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक वेदों और उपनिषदों के उस अद्वैत और ब्रह्मज्ञान का सार है, जो कठोपनिषद में यमराज और नचिकेता के संवाद में भी देखने को मिलता है—“न जायते म्रियते वा विपश्चित्”। जो मनुष्य इस शाश्वत सत्य को अपने भीतर गहराई से आत्मसात कर लेता है, उसके लिए जीवन में न तो किसी को मारने का भाव शेष रहता है और न ही किसी के प्रति मृत्यु का भय रहता है। वह संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल एक ही चैतन्य शक्ति का विस्तार देखता है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत शोधपरक आलेख में हम इसी परम पवित्र श्लोक के शाब्दिक अर्थ, गूढ़ दार्शनिक निहितार्थ, पौराणिक पृष्ठभूमि, नियमित पाठ के लाभ और जीवन पर पड़ने वाले उसके सकारात्मक प्रभावों का संपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं सस्वर उच्चारण विधि
देवनागरी मूल श्लोक
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥२१॥
रोमन लिप्यंतरण (IAST Transliteration)
vedāvināśinaṁ nityaṁ ya enam ajam avyayam |
kathaṁ sa puruṣaḥ pārtha kaṁ ghātayati hanti kam ||21||
श्लोक गायन एवं सस्वर पाठ की विधि
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ
इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में अद्वैत वेदांत और सांख्य दर्शन का सार छिपा है। नीचे दी गई तालिका में इसके प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ और उसका विस्तृत दार्शनिक भावार्थ प्रस्तुत किया गया है:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (कुरुक्षेत्र का महान संवाद)
इस श्लोक की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के आरंभिक क्षणों से जुड़ी हुई है। जब कौरवों और पांडवों की सेनाएं कुरुक्षेत्र के खुले मैदान में आमने-सामने खड़ी थीं, तब धर्मराज युधिष्ठिर की सेना के मुख्य योद्धा अर्जुन ने अपने सारथि भगवान श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाने का अनुरोध किया। जैसे ही अर्जुन ने अपने परिजनों, गुरुओं (द्रोणाचार्य, कृपाचार्य) और प्रियजनों (पितामह भीष्म) को युद्धभूमि में खड़े देखा, उनका मोह जागृत हो गया। उनके हाथ से गांडीव धनुष छूटने लगा, हृदय में करुणा और विषाद का सागर उमड़ पड़ा और उन्होंने युद्ध करने से स्पष्ट इनकार कर दिया।
अर्जुन का तर्क था कि अपने स्वजनों का वध करके प्राप्त होने वाला राज्य या सुख रक्त रंजित और पापमय होगा। ऐसे समय में, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के उस विषाद को दूर करने के लिए जो ज्ञान दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता कहलाई। भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले अर्जुन को यह समझाया कि तू जिस जिसे मरने योग्य समझ रहा है, वह केवल नश्वर पंचतत्वों से बना शरीर है, आत्मा अमर है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के इस पर्व (भीष्म पर्व) में यह संवाद संपूर्ण मानवजाति के लिए एक शाश्वत मार्गदर्शिका बन गया। यह श्लोक विशेष रूप से उस भ्रम को तोड़ता है जहाँ मनुष्य शरीर को ही सब कुछ मान बैठता है। जब साधक यह समझ लेता है कि आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग जला सकती है, तब उसके भीतर से कर्तव्य पालन का भय समाप्त हो जाता है और वह पूर्ण निष्काम भाव से अपने कर्म का निर्वाह करता है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के इस इक्कीसवें श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को अनेकों आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:
1. मृत्यु के भय से मुक्ति (Freedom from Fear of Death)
आत्मा की अमरता का यह ज्ञान मनुष्य के मन से मृत्यु के अस्वाभाविक भय और असुरक्षा की भावना को हमेशा के लिए समाप्त कर देता है।
2. मानसिक शांति एवं स्थिरता (Mental Peace & Stability)
शोक, चिंता, और अत्यधिक मानसिक तनाव से घिरे व्यक्तियों के लिए इस श्लोक का चिंतन चित्त को शांत और स्थिर करने की अचूक औषधि है।
3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura Generation)
वैदिक श्लोकों के सस्वर उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें आसपास के वातावरण को शुद्ध करती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करती हैं।
4. कर्म योग की प्रेरणा (Inspiration for Karma Yoga)
यह श्लोक फल की चिंता से मुक्त होकर अपने कर्तव्यों का पालन करने की शक्ति देता है, जिससे व्यक्ति निष्काम कर्मयोगी बनता है।
5. अहंकार और ममत्व का नाश (Destruction of Ego & Attachment)
"मेरा-तेरा" और "यह शरीर मेरा है" का भ्रम टूटता है, जिससे साधक में विनम्रता, करुणा और सार्वभौमिक प्रेम का विकास होता है।
6. आत्म-साक्षात्कार की दिशा में प्रगति (Progress towards Self-Realization)
यह वेदांत दर्शन का मुख्य द्वार है, जो साधक को बाह्य प्रपंच से मोड़कर भीतर स्थित परमात्मा और आत्मा के मिलन की ओर अग्रसर करता है।
7. निर्णय क्षमता में वृद्धि (Enhancement of Decision Making)
संशय और भ्रम की स्थिति में जब व्यक्ति मानसिक रूप से कमजोर महसूस करता है, तब यह ज्ञान उसे सही और धर्मसंगत निर्णय लेने की शक्ति देता है।
8. दैवीय कृपा की प्राप्ति (Attainment of Divine Grace)
नियमित गीता अध्ययन करने वाले भक्त पर भगवान श्रीकृष्ण और गुरु परंपरा की असीम कृपा बनी रहती है, जिससे जीवन मंगलमय होता है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह आलेख वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य और रामानुज भाष्य सहित) और प्रामाणिक सनातन धर्म ग्रंथों के गहन अध्ययन के पश्चात हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और आध्यात्मिक शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किया गया है। हमारा मुख्य उद्देश्य सनातन संस्कृति के मूल सिद्धांतों को बिना किसी मिलावट या भ्रम के, अत्यंत सरल और सुबोध हिंदी में पाठकों तक पहुंचाना है। इस श्लोक की व्याख्या करते समय पारंपरिक गुरु-शिष्य परंपरा और आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण दोनों का संतुलन रखा गया है ताकि आज की युवा पीढ़ी भी गीता के इस शाश्वत संदेश को अपने दैनिक जीवन में आसानी से अपना सके।
विशेष संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २ (सांख्य योग), श्लोक २१; महाभारत, भीष्म पर्व; कठोपनिषद। सभी व्याख्याएं पारंपरिक आचार्यों के वचनों पर आधारित हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे अर्जुन! जो इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष किसको मारता है और किससे मरवाता है? O Arjuna, one who knows the Self as indestructible, eternal, unborn, and immutable – how can such a person kill anyone or cause anyone to be killed?
ज्ञान का प्रभाव / Effect of Knowledge
आत्मज्ञानी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक ही चेतना देखता है। उसके लिए हिंसा का कोई अर्थ नहीं रह जाता।