मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदयोगयुक्तः
कर्मयोग में स्थित
विशुद्धात्मा
शुद्ध अन्तःकरण वाला
विजितात्मा
वशीभूत अन्तःकरण वाला
जितेन्द्रियः
जीते हुए इन्द्रियों वाला
सर्वभूतात्मभूतात्मा
सब प्राणियों के आत्मा में स्थित आत्मा वाला (सबमें समभाव)
कुर्वन्
करता हुआ
अपि
भी
न
नहीं
लिप्यते
लिप्त होता।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो कर्मयोग में स्थित है, जिसकी आत्मा (अन्तःकरण) शुद्ध है, जो मन को वश में किए हुए है और जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है, तथा जो सम्पूर्ण प्राणियों के आत्मा में स्थित आत्मा वाला है (अर्थात् सबमें समभाव रखता है), वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक कर्मयोगी के लक्षण बताता है। ऐसा व्यक्ति शुद्ध अन्तःकरण वाला, आत्म-संयमी, जितेन्द्रिय और समदर्शी होता है। वह कर्म करते हुए भी पाप-पुण्य से लिप्त नहीं होता, क्योंकि वह फलासक्ति रहित होकर कर्तव्य-बुद्धि से कर्म करता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो व्यक्ति कर्मयोग में स्थित है, उसका अन्तःकरण शुद्ध है, उसने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है, और वह सभी प्राणियों में समभाव रखता है। ऐसा व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कर्म के बन्धन में नहीं बंधता।