मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदन
नहीं
एव
ही
किञ्चित्
कुछ
करोमि
करता हूँ
इति
ऐसा
युक्तः
कर्मयोगी
मन्येत
माने
तत्त्ववित्
तत्त्व को जानने वाला
पश्यन्
देखता हुआ
शृण्वन्
सुनता हुआ
स्पृशन्
स्पर्श करता हुआ
जिघ्रन्
सूंघता हुआ
अश्नन्
खाता हुआ
गच्छन्
जाता हुआ
स्वपन्
सोता हुआ
श्वसन्
साँस लेता हुआ।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
तत्त्व को जानने वाला कर्मयोगी यह माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ। (वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, जाता हुआ, सोता हुआ, साँस लेता हुआ...)
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक अगले श्लोक के साथ मिलकर एक वाक्य है। यहाँ कर्मयोगी की दृष्टि बताई गई है कि वह सभी क्रियाओं को प्रकृति के गुणों पर छोड़कर स्वयं को अकर्ता मानता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो तत्त्व को जानने वाला कर्मयोगी है, वह सभी इन्द्रिय क्रियाओं में संलग्न रहते हुए भी यह मानता है कि मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूँ। वह जानता है कि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में प्रकृति के गुणों द्वारा प्रवृत्त हो रही हैं।