कर्म षटक (अध्याय १-६) अध्याय ५ · कुल २९ श्लोक 4 मिनट अध्ययन

कर्मसंन्यास योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय ५ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

पाँचवाँ अध्याय कर्मयोग और संन्यास के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि सच्चा संन्यासी वह है जो फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य-कर्म करता है, न कि केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला। यह अध्याय समदर्शिता, ज्ञान-विज्ञान और भक्ति के मार्ग का वर्णन करता है।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय ५ (कर्मसंन्यास योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

पाँचवाँ अध्याय कर्मयोग और संन्यास के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि सच्चा संन्यासी वह है जो फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य-कर्म करता है, न कि केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला। यह अध्याय समदर्शिता, ज्ञान-विज्ञान और भक्ति के मार्ग का वर्णन करता है।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ १ / २)

श्लोक १ - २५
अध्याय ५ · श्लोक १

अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १॥

हिंदी अर्थ

अर्जुन बोले: हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की भी प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से जो एक निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए।

अध्याय ५ · श्लोक २

श्रीभगवानुवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २॥

हिंदी अर्थ

श्रीभगवान् बोले: संन्यास और कर्मयोग – ये दोनों ही मोक्ष के साधक हैं। परन्तु उन दोनों में कर्म-संन्यास (कर्मों के त्याग) की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है।

अध्याय ५ · श्लोक ३

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३॥

हिंदी अर्थ

हे महाबाहो! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी की कामना करता है, वह नित्य-संन्यासी जानना चाहिए। क्योंकि द्वन्द्वों से रहित होकर वह सुखपूर्वक बन्धन से मुक्त हो जाता है।

अध्याय ५ · श्लोक ४

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४॥

हिंदी अर्थ

सांख्य (ज्ञानयोग) और कर्मयोग को अलग-अलग केवल अज्ञानी लोग कहते हैं, पण्डित नहीं। उनमें से किसी एक में भी यथार्थ रूप से स्थित पुरुष दोनों के ही फल को प्राप्त कर लेता है।

अध्याय ५ · श्लोक ५

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५॥

हिंदी अर्थ

सांख्ययोगियों (ज्ञानियों) द्वारा जो पद प्राप्त किया जाता है, वही कर्मयोगियों द्वारा भी प्राप्त होता है। जो सांख्य और योग को एक देखता है, वही यथार्थ देखता है।

अध्याय ५ · श्लोक ६

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६॥

हिंदी अर्थ

हे महाबाहो! कर्मयोग के बिना (केवल) संन्यास (कर्मों का त्याग) प्राप्त करना कठिन है। किन्तु कर्मयोग में स्थित मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

अध्याय ५ · श्लोक ७

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७॥

हिंदी अर्थ

जो कर्मयोग में स्थित है, जिसकी आत्मा (अन्तःकरण) शुद्ध है, जो मन को वश में किए हुए है और जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है, तथा जो सम्पूर्ण प्राणियों के आत्मा में स्थित आत्मा वाला है (अर्थात् सबमें समभाव रखता है), वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।

अध्याय ५ · श्लोक ८

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८॥

हिंदी अर्थ

तत्त्व को जानने वाला कर्मयोगी यह माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ। (वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, जाता हुआ, सोता हुआ, साँस लेता हुआ...)

अध्याय ५ · श्लोक ९

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९॥

हिंदी अर्थ

...बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँखें खोलता और बन्द करता हुआ – वह यही धारण करता है कि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।

अध्याय ५ · श्लोक १०

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १०॥

हिंदी अर्थ

जो पुरुष आसक्ति का त्याग करके कर्मों को ब्रह्म (परमात्मा) में अर्पित कर देता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल-पत्ता जल से नहीं भीगता।

अध्याय ५ · श्लोक ११

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ ११॥

हिंदी अर्थ

योगीजन आसक्ति का त्याग करके केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा भी (अर्थात् कर्तापन के अभिमान बिना) अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।

अध्याय ५ · श्लोक १२

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२॥

हिंदी अर्थ

कर्मयोगी कर्मफल का त्याग करके परम शांति को प्राप्त होता है, जबकि अयोगी (आसक्त पुरुष) कामना से प्रेरित होकर फल में आसक्त रहने के कारण बंधन में पड़ जाता है।

अध्याय ५ · श्लोक १३

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३॥

हिंदी अर्थ

वशीभूत (आत्मसंयमी) जीवात्मा मन से सम्पूर्ण कर्मों का संन्यास करके उस नौ-द्वारों वाले शरीर-रूपी नगर में सुखपूर्वक स्थित रहता है। वह न तो स्वयं कुछ करता है और न ही करवाता है।

अध्याय ५ · श्लोक १४

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४॥

हिंदी अर्थ

प्रभु (परमात्मा) न तो लोक (जीवों) के लिए कर्तृत्व रचते हैं, न कर्म, और न कर्मों के फलों का संयोग। परन्तु स्वभाव (प्रकृति) (इन सबमें) प्रवृत्त होती है।

अध्याय ५ · श्लोक १५

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५॥

हिंदी अर्थ

सर्वव्यापी प्रभु किसी के पाप या पुण्य को ग्रहण नहीं करते। ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, इसी कारण सब प्राणी मोहित हो रहे हैं।

अध्याय ५ · श्लोक १६

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६॥

हिंदी अर्थ

परन्तु जिन पुरुषों का वह अज्ञान आत्म-ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के समान उस परम तत्त्व (ब्रह्म) को प्रकाशित कर देता है।

अध्याय ५ · श्लोक १७

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७॥

हिंदी अर्थ

जिनकी बुद्धि उस (परमात्मा) में लगी है, जिनका चित्त उसी में है, जिनकी निष्ठा उसी में है और जो उसी को परम लक्ष्य मानते हैं, वे ज्ञान द्वारा सब पापों से रहित होकर पुनर्जन्म रहित पद (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।

अध्याय ५ · श्लोक १८

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८॥

हिंदी अर्थ

विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल में भी ज्ञानीजन समान दर्शन करते हैं (अर्थात् सबमें एक ही परमात्मा देखते हैं)।

अध्याय ५ · श्लोक १९

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९॥

हिंदी अर्थ

जिनका मन समता में स्थित है, उन्होंने इसी लोक में संसार (जन्म-मरण) को जीत लिया है। ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।

अध्याय ५ · श्लोक २०

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥ २०॥

हिंदी अर्थ

जो प्रिय वस्तु पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय पाकर उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिरबुद्धि, मोहरहित, ब्रह्मज्ञानी और ब्रह्म में स्थित है।

अध्याय ५ · श्लोक २१

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१॥

हिंदी अर्थ

बाह्य विषयों के सुखों में अनासक्त हुआ पुरुष अपने भीतर जो सुख पाता है, वह ब्रह्मयोग में लगा हुआ उस अक्षय सुख को भोगता है।

अध्याय ५ · श्लोक २२

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२॥

हिंदी अर्थ

हे कौन्तेय! इन्द्रियों के विषयों से उत्पन्न होने वाले जो भोग हैं, वे दुःख के कारण ही हैं, क्योंकि उनका आदि और अन्त है (वे नाशवान हैं)। इसलिए बुद्धिमान पुरुष उनमें नहीं रमते।

अध्याय ५ · श्लोक २३

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३॥

हिंदी अर्थ

जो मनुष्य इस जीवन में शरीर त्यागने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न वेग को सहन करने में समर्थ है, वह योगी है और वह सुखी है।

अध्याय ५ · श्लोक २४

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४॥

हिंदी अर्थ

जो पुरुष अन्तःकरण में ही सुख वाला है, अन्तर में ही रमण करने वाला है, और अन्तर में ही ज्योति वाला है, वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होता है।

अध्याय ५ · श्लोक २५

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५॥

हिंदी अर्थ

जिनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब सन्देह कट गए हैं, जो संयत चित्त वाले हैं और सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं – ऐसे ऋषिगण ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त करते हैं।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
कर्मसंन्यास योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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