श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 15

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 2 मिनट का पठन 121 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
न
नहीं
आदत्ते
ग्रहण करता है
कस्यचित्
किसी का
पापम्
पाप
न
नहीं
च
और
एव
ही
सुकृतम्
पुण्य
विभुः
सर्वव्यापी (ईश्वर)
अज्ञानेन
अज्ञान से
आवृतम्
ढका हुआ
ज्ञानम्
ज्ञान
तेन
उससे
मुह्यन्ति
मोहित होते हैं
जन्तवः
प्राणी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

सर्वव्यापी प्रभु किसी के पाप या पुण्य को ग्रहण नहीं करते। ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, इसी कारण सब प्राणी मोहित हो रहे हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ईश्वर किसी के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा नहीं रखते – वह तो निर्लिप्त है। जीव अज्ञान के कारण मोहित होता है और कर्तृत्व का भ्रम पाल लेता है, जिससे पाप-पुण्य का बन्धन होता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

सर्वव्यापी परमेश्वर किसी जीव के पाप या पुण्य को अपने ऊपर नहीं लगाते। वे तो साक्षी मात्र हैं। जीवों का ज्ञान अज्ञान से ढका है, जिसके कारण वे मोहित होते हैं और पाप-पुण्य के बन्धन में पड़ते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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