श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 14

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 2 मिनट का पठन 135 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
न
नहीं
कर्तृत्वम्
कर्तापन
न
नहीं
कर्माणि
कर्म
लोकस्य
लोक (जीवों) के
सृजति
रचता है
प्रभुः
ईश्वर
न
नहीं
कर्मफलसंयोगम्
कर्मों के फलों का सम्बन्ध
स्वभावः
प्रकृति (स्वभाव)
तु
परन्तु
प्रवर्तते
प्रवृत्त होती है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

प्रभु (परमात्मा) न तो लोक (जीवों) के लिए कर्तृत्व रचते हैं, न कर्म, और न कर्मों के फलों का संयोग। परन्तु स्वभाव (प्रकृति) (इन सबमें) प्रवृत्त होती है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ईश्वर जीवों के कर्मों में हस्तक्षेप नहीं करता। कर्तापन का अभिमान, कर्म और उनके फल – यह सब प्रकृति के गुणों के कारण होता है। जीव अज्ञानवश स्वयं को कर्ता मान लेता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

परमात्मा किसी के लिए कर्तापन, कर्म या कर्मफल का सृजन नहीं करते। वास्तव में यह सब प्रकृति (स्वभाव) के गुणों द्वारा होता है। जीव अहंकारवश स्वयं को कर्ता मान लेता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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