श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 13

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 3 मिनट का पठन 153 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
सर्वकर्माणि
सब कर्मों को
मनसा
मन से
संन्यस्य
त्यागकर
आस्ते
स्थित रहता है
सुखम्
सुखपूर्वक
वशी
वशीभूत (आत्मसंयमी)
नवद्वारे
नौ द्वारों वाले
पुरे
नगर (शरीर) में
देही
जीवात्मा
न
नहीं
एव
ही
कुर्वन्
करता हुआ
न
नहीं
कारयन्
करवाता हुआ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वशीभूत (आत्मसंयमी) जीवात्मा मन से सम्पूर्ण कर्मों का संन्यास करके उस नौ-द्वारों वाले शरीर-रूपी नगर में सुखपूर्वक स्थित रहता है। वह न तो स्वयं कुछ करता है और न ही करवाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

जब व्यक्ति मन से ही सभी कर्मों का त्याग कर देता है – अर्थात् कर्तापन के अभिमान को त्याग देता है – तो वह शरीर में रहते हुए भी कर्मों से अलिप्त रहता है। वह देह के साथ तादात्म्य नहीं करता, इसलिए सुखी रहता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

शरीर को नौ द्वारों वाला नगर कहा गया है (दो नेत्र, दो नासिका, दो कान, मुख, गुदा, जननेन्द्रिय)। आत्मसंयमी जीव मन से ही सभी कर्मों का संन्यास करके इस नगर में सुखपूर्वक निवास करता है। वह जानता है कि वह कर्ता नहीं है, न ही वह किसी से कुछ करवाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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