मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदसर्वकर्माणि
सब कर्मों को
मनसा
मन से
संन्यस्य
त्यागकर
आस्ते
स्थित रहता है
सुखम्
सुखपूर्वक
वशी
वशीभूत (आत्मसंयमी)
नवद्वारे
नौ द्वारों वाले
पुरे
नगर (शरीर) में
देही
जीवात्मा
न
नहीं
एव
ही
कुर्वन्
करता हुआ
न
नहीं
कारयन्
करवाता हुआ।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
वशीभूत (आत्मसंयमी) जीवात्मा मन से सम्पूर्ण कर्मों का संन्यास करके उस नौ-द्वारों वाले शरीर-रूपी नगर में सुखपूर्वक स्थित रहता है। वह न तो स्वयं कुछ करता है और न ही करवाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
जब व्यक्ति मन से ही सभी कर्मों का त्याग कर देता है – अर्थात् कर्तापन के अभिमान को त्याग देता है – तो वह शरीर में रहते हुए भी कर्मों से अलिप्त रहता है। वह देह के साथ तादात्म्य नहीं करता, इसलिए सुखी रहता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
शरीर को नौ द्वारों वाला नगर कहा गया है (दो नेत्र, दो नासिका, दो कान, मुख, गुदा, जननेन्द्रिय)। आत्मसंयमी जीव मन से ही सभी कर्मों का संन्यास करके इस नगर में सुखपूर्वक निवास करता है। वह जानता है कि वह कर्ता नहीं है, न ही वह किसी से कुछ करवाता है।