मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदयुक्तः
कर्मयोगी
कर्मफलम्
कर्म के फल को
त्यक्त्वा
त्यागकर
शान्तिम्
शांति
आप्नोति
प्राप्त करता है
नैष्ठिकीम्
परम (नैष्ठिक)
अयुक्तः
अयोगी (आसक्त)
कामकारेण
कामना से प्रेरित
फले
फल में
सक्तः
आसक्त
निबध्यते
बंधता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
कर्मयोगी कर्मफल का त्याग करके परम शांति को प्राप्त होता है, जबकि अयोगी (आसक्त पुरुष) कामना से प्रेरित होकर फल में आसक्त रहने के कारण बंधन में पड़ जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
फल की आसक्ति ही बंधन का कारण है। कर्मयोगी फल की इच्छा न रखते हुए शांति पाता है, जबकि आसक्त व्यक्ति कर्मों के फल से बंध जाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो व्यक्ति कर्मफल को त्याग कर कर्म करता है, वह नैष्ठिकी (परम) शांति को प्राप्त होता है। इसके विपरीत, जो कामना से प्रेरित होकर फल में आसक्त रहता है, वह बंधन में पड़ जाता है।