श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 11

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 2 मिनट का पठन 120 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ ११॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
कायेन
शरीर से
मनसा
मन से
बुद्ध्या
बुद्धि से
केवलैः
केवल
इन्द्रियैः
इन्द्रियों से
अपि
भी
योगिनः
योगी
कर्म
कर्म
कुर्वन्ति
करते हैं
सङ्गम्
आसक्ति
त्यक्त्वा
छोड़कर
आत्मशुद्धये
अन्तःकरण की शुद्धि के लिए।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

योगीजन आसक्ति का त्याग करके केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा भी (अर्थात् कर्तापन के अभिमान बिना) अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

योगी लोग कर्तापन के अभिमान से रहित होकर, केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों को क्रियाशील रखते हुए कर्म करते हैं। उनका उद्देश्य फल नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

योगीजन शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों से कर्म तो करते हैं, परन्तु उनमें आसक्ति नहीं रखते। उनका एकमात्र उद्देश्य अपने अन्तःकरण को शुद्ध करना होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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श्लोक 11/29 38% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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