मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदब्रह्मणि
ब्रह्म (परमात्मा) में
आधाय
समर्पित करके
कर्माणि
कर्मों को
सङ्गम्
आसक्ति
त्यक्त्वा
छोड़कर
करोति
करता है
यः
जो
लिप्यते
लिप्त होता है
न
नहीं
स
वह
पापेन
पाप से
पद्मपत्रम्
कमल-पत्ता
इव
जैसे
अम्भसा
जल से।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो पुरुष आसक्ति का त्याग करके कर्मों को ब्रह्म (परमात्मा) में अर्पित कर देता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल-पत्ता जल से नहीं भीगता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक कर्मयोग का सार है। कर्मों को ईश्वरार्पण करने और फल की आसक्ति छोड़ने से व्यक्ति कर्म के बन्धन से मुक्त रहता है। जैसे कमल-पत्ता पानी में रहते हुए भी नहीं भीगता, वैसे ही योगी संसार में रहते हुए भी पाप से अलिप्त रहता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो व्यक्ति सभी कर्मों को परमात्मा को समर्पित करके, आसक्ति छोड़कर करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता। जैसे कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी उससे अलग रहता है, वैसे ही वह संसार में रहते हुए भी उसके प्रभाव से बचा रहता है।