श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 10

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 3 मिनट का पठन 119 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
ब्रह्मणि
ब्रह्म (परमात्मा) में
आधाय
समर्पित करके
कर्माणि
कर्मों को
सङ्गम्
आसक्ति
त्यक्त्वा
छोड़कर
करोति
करता है
यः
जो
लिप्यते
लिप्त होता है
न
नहीं
स
वह
पापेन
पाप से
पद्मपत्रम्
कमल-पत्ता
इव
जैसे
अम्भसा
जल से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो पुरुष आसक्ति का त्याग करके कर्मों को ब्रह्म (परमात्मा) में अर्पित कर देता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल-पत्ता जल से नहीं भीगता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक कर्मयोग का सार है। कर्मों को ईश्वरार्पण करने और फल की आसक्ति छोड़ने से व्यक्ति कर्म के बन्धन से मुक्त रहता है। जैसे कमल-पत्ता पानी में रहते हुए भी नहीं भीगता, वैसे ही योगी संसार में रहते हुए भी पाप से अलिप्त रहता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो व्यक्ति सभी कर्मों को परमात्मा को समर्पित करके, आसक्ति छोड़कर करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता। जैसे कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी उससे अलग रहता है, वैसे ही वह संसार में रहते हुए भी उसके प्रभाव से बचा रहता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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