मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदप्रलपन्
बोलता हुआ
विसृजन्
त्यागता हुआ
गृह्णन्
ग्रहण करता हुआ
उन्मिषन्
खोलता हुआ
निमिषन्
बन्द करता हुआ
अपि
भी
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
इन्द्रियार्थेषु
इन्द्रियों के विषयों में
वर्तन्ते
बरतती हैं
इति
ऐसा
धारयन्
धारण करता हुआ (मानता हुआ)।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
...बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँखें खोलता और बन्द करता हुआ – वह यही धारण करता है कि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक पिछले श्लोक की निरंतरता है। कर्मयोगी की बुद्धि में यह स्थिति रहती है कि सभी क्रियाएँ इन्द्रियों द्वारा हो रही हैं, आत्मा न तो कर्ता है और न भोक्ता।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
ज्ञानी पुरुष सभी क्रियाओं – बोलना, त्यागना, ग्रहण करना, आँखें खोलना-बन्द करना – को केवल इन्द्रियों की क्रिया मानता है। वह जानता है कि आत्मा इन क्रियाओं से परे है और इनमें लिप्त नहीं होता।