श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 9

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 2 मिनट का पठन 119 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
प्रलपन्
बोलता हुआ
विसृजन्
त्यागता हुआ
गृह्णन्
ग्रहण करता हुआ
उन्मिषन्
खोलता हुआ
निमिषन्
बन्द करता हुआ
अपि
भी
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
इन्द्रियार्थेषु
इन्द्रियों के विषयों में
वर्तन्ते
बरतती हैं
इति
ऐसा
धारयन्
धारण करता हुआ (मानता हुआ)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

...बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँखें खोलता और बन्द करता हुआ – वह यही धारण करता है कि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक पिछले श्लोक की निरंतरता है। कर्मयोगी की बुद्धि में यह स्थिति रहती है कि सभी क्रियाएँ इन्द्रियों द्वारा हो रही हैं, आत्मा न तो कर्ता है और न भोक्ता।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

ज्ञानी पुरुष सभी क्रियाओं – बोलना, त्यागना, ग्रहण करना, आँखें खोलना-बन्द करना – को केवल इन्द्रियों की क्रिया मानता है। वह जानता है कि आत्मा इन क्रियाओं से परे है और इनमें लिप्त नहीं होता।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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श्लोक 9/29 31% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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