मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदअर्जुन
अर्जुन
उवाच
बोले
संन्यासम्
त्याग
कर्मणाम्
कर्मों का
कृष्ण
हे कृष्ण
पुनः
फिर
योगम्
(कर्म)योग
च
और
शंससि
आप प्रशंसा करते हैं
यत्
जो
श्रेय
कल्याणकारी
एतयोः
इन दोनों में से
एकम्
एक
तत्
वह
मे
मुझे
ब्रूहि
कहिए
सुनिश्चितम्
निश्चयपूर्वक।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अर्जुन बोले: हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की भी प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से जो एक निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक अर्जुन की जिज्ञासा को दर्शाता है। पिछले अध्यायों में कृष्ण ने कर्मयोग और सांख्ययोग (ज्ञान) दोनों की चर्चा की थी। अब अर्जुन स्पष्टता चाहते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अर्जुन ने कृष्ण से स्पष्ट निर्देश माँगा है – दोनों मार्गों में से कौन-सा निश्चित रूप से कल्याणकारी है। This verse sets the stage for Krishna’s answer that both paths ultimately lead to the same goal, but one is easier to practice.