मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदश्रीभगवान्
भगवान
उवाच
बोले
संन्यासः
संन्यास (कर्मों का त्याग)
कर्मयोगः
कर्मयोग
च
और
निःश्रेयसकरौ
मोक्ष के साधक
उभौ
दोनों
तयोः
उन दोनों में
तु
परन्तु
कर्मसंन्यासात्
कर्म-संन्यास से
कर्मयोगः
कर्मयोग
विशिष्यते
श्रेष्ठ है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रीभगवान् बोले: संन्यास और कर्मयोग – ये दोनों ही मोक्ष के साधक हैं। परन्तु उन दोनों में कर्म-संन्यास (कर्मों के त्याग) की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् स्पष्ट करते हैं कि हालाँकि दोनों मार्ग मोक्ष देने वाले हैं, फिर भी सक्रिय रहते हुए फलासक्ति रहित कर्म करना (कर्मयोग) केवल कर्मों को त्याग देने से बेहतर है, क्योंकि त्याग सबके लिए सम्भव नहीं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान् कहते हैं कि दोनों मार्ग मोक्षदायी हैं, लेकिन कर्मयोग को विशेष रूप से श्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि यह सबके लिए साध्य है। Karma yoga is easier and more practical for most people, as it channels natural human activity toward spiritual growth.