मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदज्ञेयः
जानना चाहिए
सः
वह
नित्यसंन्यासी
सदा संन्यासी
यः
जो
न
नहीं
द्वेष्टि
द्वेष करता है
न
नहीं
काङ्क्षति
इच्छा रखता है
निर्द्वन्द्वः
द्वन्द्वों से रहित
हि
निश्चय ही
महाबाहो
हे महाबाहो
सुखम्
सुखपूर्वक
बन्धात्
बन्धन से
प्रमुच्यते
मुक्त हो जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे महाबाहो! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी की कामना करता है, वह नित्य-संन्यासी जानना चाहिए। क्योंकि द्वन्द्वों से रहित होकर वह सुखपूर्वक बन्धन से मुक्त हो जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सच्चा संन्यासी वह नहीं जिसने बाहरी कर्म छोड़ दिए, बल्कि जिसने मन से आसक्ति और द्वेष का त्याग कर दिया है। द्वन्द्व (सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी आदि) से मुक्त व्यक्ति आसानी से मुक्त हो जाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
बाहरी त्याग से अधिक महत्वपूर्ण है आंतरिक त्याग। जो न तो किसी से द्वेष करता है और न ही किसी चीज़ की लालसा, वही सच्चा संन्यासी है। ऐसा व्यक्ति द्वन्द्वों से ऊपर उठकर सहज ही मुक्त हो जाता है।