मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदसांख्ययोगौ
सांख्य (ज्ञान) और योग (कर्म) को
पृथक्
अलग
बालाः
अज्ञानी
प्रवदन्ति
कहते हैं
न
नहीं
पण्डिताः
ज्ञानी
एकम्
एक में
अपि
भी
आस्थितः
स्थित
सम्यक्
यथार्थ रूप से
उभयोः
दोनों का
विन्दते
प्राप्त करता है
फलम्
फल।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
सांख्य (ज्ञानयोग) और कर्मयोग को अलग-अलग केवल अज्ञानी लोग कहते हैं, पण्डित नहीं। उनमें से किसी एक में भी यथार्थ रूप से स्थित पुरुष दोनों के ही फल को प्राप्त कर लेता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ज्ञानी जन जानते हैं कि ज्ञान और कर्म का अंतिम लक्ष्य एक ही है – परमात्मा की प्राप्ति। अतः दोनों मार्गों में विरोध नहीं है। जो एक मार्ग पर दृढ़ है, वह दोनों का फल पा लेता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
बच्चे (अल्पबुद्धि) लोग सांख्य और योग को अलग-अलग समझते हैं, लेकिन विद्वान उन्हें एक ही लक्ष्य तक पहुँचाने वाला मानते हैं। यदि कोई एक मार्ग का ठीक से अनुसरण करता है, तो वह दोनों के फल (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है।