मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदयत्
जो
सांख्यैः
सांख्ययोगियों (ज्ञानियों) द्वारा
प्राप्यते
प्राप्त किया जाता है
स्थानम्
पद
तत्
वही
योगैः
कर्मयोगियों द्वारा
अपि
भी
गम्यते
प्राप्त किया जाता है
एकम्
एक
सांख्यम्
सांख्य
च
और
योगम्
योग
च
और
यः
जो
पश्यति
देखता है
स
वह
पश्यति
(यथार्थ) देखता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
सांख्ययोगियों (ज्ञानियों) द्वारा जो पद प्राप्त किया जाता है, वही कर्मयोगियों द्वारा भी प्राप्त होता है। जो सांख्य और योग को एक देखता है, वही यथार्थ देखता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक पिछले श्लोक की पुष्टि करता है। दोनों मार्गों का लक्ष्य एक ही है – परब्रह्म की प्राप्ति। इस प्रकार ज्ञान और कर्म में कोई अंतर नहीं है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
ज्ञानी और कर्मयोगी दोनों एक ही परम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। इसलिए जो इन दोनों मार्गों को एक ही तत्त्व की ओर ले जाने वाला देखता है, वही यथार्थ द्रष्टा है।