श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 6

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 2 मिनट का पठन 122 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
संन्यासः
संन्यास (कर्मों का त्याग)
तु
तो
महाबाहो
हे महाबाहो
दुःखम्
कष्टपूर्वक
आप्तुम्
प्राप्त करने में
अयोगतः
कर्मयोग के बिना
योगयुक्तः
कर्मयोग में स्थित
मुनिः
मुनि
ब्रह्म
ब्रह्म को
नचिरेण
शीघ्र ही
अधिगच्छति
प्राप्त होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे महाबाहो! कर्मयोग के बिना (केवल) संन्यास (कर्मों का त्याग) प्राप्त करना कठिन है। किन्तु कर्मयोग में स्थित मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

बिना कर्मयोग के केवल कर्मों का त्याग करना कठिन है क्योंकि मन अभी भी आसक्तियों से भरा रहता है। कर्मयोगी धीरे-धीरे मन को शुद्ध करता है और शीघ्र ब्रह्म प्राप्ति कर लेता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

केवल कर्मों को त्याग देने से संन्यासी नहीं बना जा सकता। कर्मयोग द्वारा मन की शुद्धि आवश्यक है। कर्मयोगी ही सच्चे अर्थों में शीघ्र ब्रह्म को प्राप्त करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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श्लोक 6/29 21% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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