मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदइह
इसी (लोक में)
एव
ही
तैः
उनके द्वारा
जितः
जीत लिया गया
सर्गः
संसार (जन्म-मरण)
येषाम्
जिनका
साम्ये
समता में
स्थितम्
स्थित
मनः
मन
निर्दोषम्
निर्दोष
हि
निश्चय ही
समम्
सम
ब्रह्म
ब्रह्म
तस्मात्
इसलिए
ब्रह्मणि
ब्रह्म में
ते
वे
स्थिताः
स्थित हैं।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जिनका मन समता में स्थित है, उन्होंने इसी लोक में संसार (जन्म-मरण) को जीत लिया है। ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
समदर्शी व्यक्ति इसी जीवन में मुक्त हो जाता है। ब्रह्म स्वयं सम और निर्दोष है, अतः जो समता में स्थित है, वह ब्रह्म में ही स्थित है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जिनका मन समभाव में स्थिर हो गया है, उन्होंने इसी जन्म में संसार-रूपी संग्राम को जीत लिया है। चूँकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए ऐसे व्यक्ति ब्रह्म में ही स्थित हैं।