श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 20

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 2 मिनट का पठन 129 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥ २०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
न
नहीं
प्रहृष्येत्
हर्षित होता है
प्रियम्
प्रिय
प्राप्य
प्राप्त करके
न
नहीं
उद्विजेत्
उद्विग्न होता है
प्राप्य
प्राप्त करके
च
और
अप्रियम्
अप्रिय
स्थिरबुद्धिः
स्थिरबुद्धि
असम्मूढः
मोहरहित
ब्रह्मवित्
ब्रह्मज्ञानी
ब्रह्मणि
ब्रह्म में
स्थितः
स्थित।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो प्रिय वस्तु पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय पाकर उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिरबुद्धि, मोहरहित, ब्रह्मज्ञानी और ब्रह्म में स्थित है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ब्रह्मज्ञानी की पहचान है कि वह सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय में समान रहता है। उसकी बुद्धि विचलित नहीं होती, क्योंकि वह जानता है कि ये सब इन्द्रियों के विषय हैं और आत्मा से परे हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो व्यक्ति प्रिय वस्तु पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय पाकर विचलित नहीं होता, वह स्थिरबुद्धि, असम्मूढ़ और ब्रह्म में स्थित ज्ञानी है। वह द्वन्द्वों से परे है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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श्लोक 20/29 69% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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