मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदबाह्यस्पर्शेषु
बाह्य विषय-सुखों में
असक्तात्मा
अनासक्त
विन्दति
प्राप्त करता है
आत्मनि
अपने में
यत्
जो
सुखम्
सुख
स
वह
ब्रह्मयोगयुक्तात्मा
ब्रह्मयोग में लगा हुआ
सुखम्
सुख
अक्षयम्
अक्षय (नाशरहित)
अश्नुते
भोगता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
बाह्य विषयों के सुखों में अनासक्त हुआ पुरुष अपने भीतर जो सुख पाता है, वह ब्रह्मयोग में लगा हुआ उस अक्षय सुख को भोगता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
बाह्य विषयों के सुख क्षणिक और दुःखदायी होते हैं। आत्मिक सुख नित्य और अक्षय है। जो व्यक्ति बाह्य सुखों में आसक्त नहीं होता, वह आत्म-सुख पाता है और ब्रह्मयोग में स्थित होकर उस अमृत सुख का अनुभव करता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
बाहरी इन्द्रिय-विषयों से अनासक्त व्यक्ति अपने अन्तर में जो सुख पाता है, वह ब्रह्म से युक्त होकर अक्षय सुख को भोगता है। बाहरी सुख नाशवान हैं, आत्मिक सुख शाश्वत।