श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 21

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 2 मिनट का पठन 117 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
बाह्यस्पर्शेषु
बाह्य विषय-सुखों में
असक्तात्मा
अनासक्त
विन्दति
प्राप्त करता है
आत्मनि
अपने में
यत्
जो
सुखम्
सुख
स
वह
ब्रह्मयोगयुक्तात्मा
ब्रह्मयोग में लगा हुआ
सुखम्
सुख
अक्षयम्
अक्षय (नाशरहित)
अश्नुते
भोगता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

बाह्य विषयों के सुखों में अनासक्त हुआ पुरुष अपने भीतर जो सुख पाता है, वह ब्रह्मयोग में लगा हुआ उस अक्षय सुख को भोगता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

बाह्य विषयों के सुख क्षणिक और दुःखदायी होते हैं। आत्मिक सुख नित्य और अक्षय है। जो व्यक्ति बाह्य सुखों में आसक्त नहीं होता, वह आत्म-सुख पाता है और ब्रह्मयोग में स्थित होकर उस अमृत सुख का अनुभव करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

बाहरी इन्द्रिय-विषयों से अनासक्त व्यक्ति अपने अन्तर में जो सुख पाता है, वह ब्रह्म से युक्त होकर अक्षय सुख को भोगता है। बाहरी सुख नाशवान हैं, आत्मिक सुख शाश्वत।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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