श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 22

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 2 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
ये
जो
हि
निश्चय ही
संस्पर्शजा
इन्द्रिय-विषयों से उत्पन्न
भोगाः
भोग
दुःखयोनयः
दुःख के कारण
एव
ही
ते
वे
आद्यन्तवन्तः
आदि-अन्त वाले (नाशवान)
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
न
नहीं
तेषु
उनमें
रमते
रमता है
बुधः
बुद्धिमान।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कौन्तेय! इन्द्रियों के विषयों से उत्पन्न होने वाले जो भोग हैं, वे दुःख के कारण ही हैं, क्योंकि उनका आदि और अन्त है (वे नाशवान हैं)। इसलिए बुद्धिमान पुरुष उनमें नहीं रमते।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

इन्द्रिय-सुख क्षणिक होते हैं और उनकी प्राप्ति के बाद दुःख ही शेष रहता है – इच्छा, तृप्ति, फिर इच्छा। ज्ञानी इन नाशवान सुखों में आसक्त नहीं होता।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जितने भी इन्द्रिय-विषयों से उत्पन्न भोग हैं, वे सभी दुःख के स्रोत हैं, क्योंकि वे अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन, बुद्धिमान व्यक्ति उनमें रुचि नहीं लेता।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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