मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदये
जो
हि
निश्चय ही
संस्पर्शजा
इन्द्रिय-विषयों से उत्पन्न
भोगाः
भोग
दुःखयोनयः
दुःख के कारण
एव
ही
ते
वे
आद्यन्तवन्तः
आदि-अन्त वाले (नाशवान)
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
न
नहीं
तेषु
उनमें
रमते
रमता है
बुधः
बुद्धिमान।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे कौन्तेय! इन्द्रियों के विषयों से उत्पन्न होने वाले जो भोग हैं, वे दुःख के कारण ही हैं, क्योंकि उनका आदि और अन्त है (वे नाशवान हैं)। इसलिए बुद्धिमान पुरुष उनमें नहीं रमते।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इन्द्रिय-सुख क्षणिक होते हैं और उनकी प्राप्ति के बाद दुःख ही शेष रहता है – इच्छा, तृप्ति, फिर इच्छा। ज्ञानी इन नाशवान सुखों में आसक्त नहीं होता।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जितने भी इन्द्रिय-विषयों से उत्पन्न भोग हैं, वे सभी दुःख के स्रोत हैं, क्योंकि वे अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन, बुद्धिमान व्यक्ति उनमें रुचि नहीं लेता।