श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 23

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 2 मिनट का पठन 103 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
शक्नोति
समर्थ होता है
इह
इस (लोक) में
एव
ही
यः
जो
सोढुम्
सहन करने में
प्राक्
पहले
शरीरविमोक्षणात्
शरीर त्यागने से
कामक्रोधोद्भवम्
काम और क्रोध से उत्पन्न
वेगम्
वेग (आवेग)
स
वह
युक्तः
योगी
स
वह
सुखी
सुखी
नरः
मनुष्य।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो मनुष्य इस जीवन में शरीर त्यागने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न वेग को सहन करने में समर्थ है, वह योगी है और वह सुखी है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

योगी की कसौटी है कि वह शरीर में रहते हुए ही काम और क्रोध के आवेगों पर नियंत्रण रखता है। ऐसा व्यक्ति ही सच्चा सुखी है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस जीवन में, शरीर त्यागने से पूर्व ही जो मनुष्य काम और क्रोध के वेग को सहन करने में समर्थ है, वह योगी है और सच्चे अर्थों में सुखी है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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