मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदशक्नोति
समर्थ होता है
इह
इस (लोक) में
एव
ही
यः
जो
सोढुम्
सहन करने में
प्राक्
पहले
शरीरविमोक्षणात्
शरीर त्यागने से
कामक्रोधोद्भवम्
काम और क्रोध से उत्पन्न
वेगम्
वेग (आवेग)
स
वह
युक्तः
योगी
स
वह
सुखी
सुखी
नरः
मनुष्य।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो मनुष्य इस जीवन में शरीर त्यागने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न वेग को सहन करने में समर्थ है, वह योगी है और वह सुखी है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
योगी की कसौटी है कि वह शरीर में रहते हुए ही काम और क्रोध के आवेगों पर नियंत्रण रखता है। ऐसा व्यक्ति ही सच्चा सुखी है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इस जीवन में, शरीर त्यागने से पूर्व ही जो मनुष्य काम और क्रोध के वेग को सहन करने में समर्थ है, वह योगी है और सच्चे अर्थों में सुखी है।