मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदयः
जो
अन्तःसुखः
अन्तर में सुख वाला
अन्तरारामः
अन्तर में ही रमण करने वाला
तथा
तथा
अन्तर्ज्योतिः
अन्तर में ही ज्योति वाला
एव
ही
यः
जो
स
वह
योगी
योगी
ब्रह्मनिर्वाणम्
ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को
ब्रह्मभूतः
ब्रह्मरूप हुआ
अधिगच्छति
प्राप्त होता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो पुरुष अन्तःकरण में ही सुख वाला है, अन्तर में ही रमण करने वाला है, और अन्तर में ही ज्योति वाला है, वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
जिसने अपने ही भीतर सुख, आनंद और प्रकाश पा लिया है, वह बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं रहता। ऐसा योगी ब्रह्ममय होकर मोक्ष प्राप्त करता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जिसे अपने भीतर ही सुख मिलता है, जो अपने भीतर ही रमण करता है, और जिसे अपने भीतर ही प्रकाश दिखता है – वह योगी ब्रह्ममय होकर ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त करता है।