श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 18

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 2 मिनट का पठन 157 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
विद्याविनयसम्पन्ने
विद्या और विनय से सम्पन्न
ब्राह्मणे
ब्राह्मण में
गवि
गाय में
हस्तिनि
हाथी में
शुनि
कुत्ते में
च
और
एव
भी
श्वपाके
चाण्डाल (नीच जाति वाले) में
च
और
पण्डिताः
ज्ञानी
समदर्शिनः
समदर्शी होते हैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल में भी ज्ञानीजन समान दर्शन करते हैं (अर्थात् सबमें एक ही परमात्मा देखते हैं)।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह गीता का प्रसिद्ध श्लोक है जो समदर्शिता का वर्णन करता है। ज्ञानी सभी प्राणियों में एक ही चेतन तत्त्व (ब्रह्म) को देखता है, चाहे वह किसी भी योनि में हो।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण हो, गाय हो, हाथी हो, कुत्ता हो या चाण्डाल – ऐसे सबमें ज्ञानीजन एक ही परमात्मा को देखते हैं। उनकी दृष्टि में कोई भेद नहीं है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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श्लोक 18/29 62% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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