मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदविद्याविनयसम्पन्ने
विद्या और विनय से सम्पन्न
ब्राह्मणे
ब्राह्मण में
गवि
गाय में
हस्तिनि
हाथी में
शुनि
कुत्ते में
च
और
एव
भी
श्वपाके
चाण्डाल (नीच जाति वाले) में
च
और
पण्डिताः
ज्ञानी
समदर्शिनः
समदर्शी होते हैं।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल में भी ज्ञानीजन समान दर्शन करते हैं (अर्थात् सबमें एक ही परमात्मा देखते हैं)।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह गीता का प्रसिद्ध श्लोक है जो समदर्शिता का वर्णन करता है। ज्ञानी सभी प्राणियों में एक ही चेतन तत्त्व (ब्रह्म) को देखता है, चाहे वह किसी भी योनि में हो।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण हो, गाय हो, हाथी हो, कुत्ता हो या चाण्डाल – ऐसे सबमें ज्ञानीजन एक ही परमात्मा को देखते हैं। उनकी दृष्टि में कोई भेद नहीं है।